SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 32
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ भावार्थ : जन्म-जरा-मरण का विनाश करने वाली अर्हत् के स्नात्र के विनियोग में उपयोग में आए वह रूप, वय, परिकर-परिवार, प्रभुता, पटुत्व, चतुराई-दक्षता, पान्डित्य, गीत-नृत्य इत्यादि कला समूह का विशिष्ठ अभ्यास तथा वह जन्म-द्रव्य सार्थक कहलाते हैं। छत्रं चामरमुज्जवलाः सुमनसो गन्धाः सतीर्थोदका, नानालंकृतयों वलिद्धि पयः सप्पी पि भद्रासनम्। नान्दी-मंगलगीत-नृत्यविधयः सत्स्तोत्रमन्त्रध्वनिः, पक्कवान्नानि फलानि पूर्णकलशाः स्नात्रांगमित्यादि सत्। भावार्थः छत्र, चामर, उज्ज्वल पुष्प, सुगंधी पदार्थ, कुंकुम, चंदन इत्यादि पदार्थ, दही, दूध, घी, भद्रासन (स्नात्रपीठ), नांदी (भंभा इत्यादि मंगलवाजिंत्र), मंगल गीत-मंगल पंचक-मंगलमय पंचकाव्य इत्यादि, विविध प्रकार के फल, जल-दूध गन्ने का रस आदि से भरे हुए कलश जो भी उत्तम है वह स्नात्र के अंगरूप ग्रहण करना चाहिये। सुरासुर-नरोरग-त्रिदशवर्मचारिप्रभु-प्रभूतसुखसंपदः समनुभूय भूयो जनाः। जितस्मरपराक्रमाः क्रमकृताभिषेका विभो-र्विलंध्य यमशासनं शिवमनन्तमध्यासते।। भावार्थः कामदेव के पराक्रम को जीतने वाले जो कोई विभु तीर्थंकर परमात्मा का क्रम से अभिषेक करते हैं वह यम के शासन को परोजित करते हैं तथा सुर, असुर, मनुष्य, नागलोक और आकाशमार्ग से गमन करने वाले विद्याधरों के स्वामियों की विशाल श्रेष्ठ समृद्धियों का उपयोग करके अनन्त सुखमय अनन्त शिव में निवास करते हैं। अशेषभुवनान्तराश्रितसमाजग्वेदक्षमौ, न चापि रमणीयता मतिशयीत तस्यापरः। प्रदेश इह मानतो निखिललोक-साधारणः, सुमेरूरिति तायिनः स्नपनपीठभा गतः।। भावार्थः इस जगत के मान प्रमाण में समस्त लोक में साधारण ऐसा कोई दूसरा प्रदेश नहीं है। तीनों भुवन के समूह के खेद को दूर करने में समर्थ अन्य प्रदेश नहीं है, और सुन्दरता में अधिक ऐसा कोई प्रदेश नहीं है। इसलिये सकल लोक
SR No.002355
Book TitleParmatma ka Abhishek Ek Vigyan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJineshratnasagar
PublisherAdinath Prakashan
Publication Year
Total Pages106
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size4 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy