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________________ (४३७) चटाचट कराश्चापि पताकातिपतातिकाः। सर्वे ते मत्स्य जातीया ये चान्येऽपि तथा विधाः ।।६७॥ इसमें भी मत्स्य-मछली के अनेक भेद होते हैं । वह इस प्रकार- श्लक्षण, तिमि, तिमिंगल, नक्र, तंडुल, रोहित, कणिक, पीठ, पीठन, शकुल, सहस्रदंष्ट्र, नलमीन, उलूपी, प्रोष्टी, मुद्गर, चट, चटकर, पताका और अतिपतातिका- ये सर्व तथा ऐसे अन्य भी होते हैं, वे सब मत्स्य की जातियां होती हैं। (६५-६७) कच्छपा द्विविधा अस्थिकच्छपा मांसकच्छपाः । ज्ञेया संज्ञाभिरेताभिः ग्राहा: पंचविधा पुनः ॥६॥ ॥ दिली, वेढला, सुद्धला, पुलगा, सीसागारा इति ॥ कच्छप- कछुआ के दो भेद हैं - १. अस्थिकच्छप और २. मांसकच्छप। ग्राह पांच प्रकार के हैं । उनके नाम इस प्रकार हैं- 'दिली, वेढला, सुद्धला, पुगला और सीसागारा ।' (६८) . द्विविधा मकरा शोंडा मट्टा इति विभेदतः । एकाकाराः शिशुमाराः सर्वेऽमी जलचारिणः ॥६६॥ .... इति जलचराः ॥ ..: मकर-मगर या घड़ियाल दो जाति के होते हैं- शोड और मट्ट। शिशुमारसूंस नामक जल जन्तु कहलाता है । इसकी एक ही जाति होती है। (६६) ये सब जलचर जीव होते हैं। - चतुष्पदाः परिसा इति स्थलचरा द्विधा । चतुष्पदाश्चतुर्भे दैस्तत्र प्रोक्ता विशारदैः ॥७०॥ ... केचिदेक खुराः केचिद् द्विखुरा अपरे पुनः । गंडीपदाश्च सनखपदा अन्ये प्रकीर्तिताः ॥७१॥ अब स्थलचर-भूमि पर चलने वाले जीव के विषय में कहते हैं- स्थलचर के दो भेद हैं- १. चौपैर और २. परिसर्पक। उसमें भी चार पैर वाले के चार प्रकार हैं- १. एक खुर (नख) वाला, २. दो खुर वाला, ३. गंदी पद और ४. नखुर वाले होते हैं। (७०-७१) ... अभिन्नाः स्यु खुरा येषां ते स्युरेक खुराभिधाः । गर्दभाश्वादयस्ते तु रोमन्थं रचयन्ति न ॥७२॥
SR No.002271
Book TitleLokprakash Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmachandrasuri
PublisherNirgranth Sahitya Prakashan Sangh
Publication Year2003
Total Pages634
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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