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________________ २६४ - श्री आचाराङ्ग सूत्रम्, द्वितीय श्रुतस्कन्ध द्रविकानि वा निम्नानि वा बलानि वा गहनानि वा गहनविदुर्गानि वा वनानि वा वनवि० वा पर्वता वा पर्वतवि० वा अवटा वा तड़ागा वा ह्रदा वा नद्यो वा वाप्यो वा पुष्करिण्यो वा दीर्घिका वा गुञ्जालिका वा सरांसि वा सरः-पंक्तयः वा सरःसर:पंक्तयः वा नो बाहु प्रगृह्य २ यावत् निध्यायेत्, केवली ब्रूयात् आदानमेतत्। ये तत्र मृगा वा पशवो वा पक्षिणो वा सरिसृपा वा सिंहा वा जलचरा वा स्थलचरा वा खेचरा वा सत्त्वास्ते उत्रसेयुः वा वित्रसेयुः वा वाटं वा शरणं वा कांक्षेयुः वारयतीति मे अयं श्रमणः अथ भिक्षूणां पूर्वोपदिष्टं यत् नो बाहू प्रगृह्य २ निध्यायेत् ततः संयतमेव आचार्योपाध्यायैः सार्धं ग्रामानुग्रामं गच्छेत्। पदार्थ- से भिक्खू वा-वह साधु या साध्वी। गामा०-ग्रामानुग्राम। दूइजमाणे-विहार करता हुआ। अंतरा-मध्य में। से-उसके अर्थात् उसके मार्ग में यदि। वप्पाणि वा-खेत की क्यारिएं। जाव-यावत्। दरीओ वा-पर्वत की गुफाएं। जाव-यावत्।कूडागाराणि-पर्वत के ऊपर के घर अथवा। पासायाणि-प्रासादमहल। नूमगिहाणि वा-भूमि घर-तहखाने आदि।रुक्खगिहाणि वा-वृक्ष के आश्रित घर अथवा वृक्ष के ऊपर का निवास स्थान। पव्वयाणि-पर्वत की गुफा आदि। रुक्खं वा-वृक्ष अथवा। चेइयकडं-वृक्ष के नीचे का व्यन्तर स्थान। थूभं वा-व्यन्तर का स्तूप। चेइयकडं-चैत्यकृत अर्थात् व्यन्तर-आदि के आकार युक्त स्तूप। आएसणाणि वा-लोहकार शाला आदि। जाव-यावत्। भवणगिहाणि वा-भवन गृह आदि आ जाए तो वह इनको। बाहाओ-भुजाओं को। पगिज्झिय २-उठा-उठा कर। अंगुलियाए-अंगुलियों को। उद्दिसिय २फैला-फैला कर।ओणमिय २-शरीर को नीचा करके। उन्नमिय २-शरीर को ऊंचा करके। नो निज्झाइज्जान देखे। तओ-तदनन्तर। सं०-साधु। गामा०-ग्रामानुग्राम विहार करे। से भिक्खू वा-वह साधु या साध्वी। गामा०-ग्रामानुग्राम। दूइज्जमाणे-विहार करता हुआ।अंतरा-मध्य में। से-वह।कच्छाणिवा-नदी के समीपवर्ती निम्नप्रदेश तथा खरबूजे आदि के खेत, या। दवियाणि वा-जंगल में घास आदि के लिए राजा के द्वारा रोकी हुई भूमि। नूमाणि वा-खड्ड आदि। वलयाणि वा-अथवा नदी आदि से वेष्टित भूमि भाग।गहणाणि वा-जल से रहित प्रदेश अरण्यक्षेत्र तथा। गहणविदुग्गाणि वा-अरण्य में विषम स्थान। वणाणि वा-अथवा वन। वणविदग्गाणि वा-वन में विषम स्थान पव्वयाणि वा-पर्वत। पव्वयविदग्गाणि वा-पर्वत में विषम स्थान। अगडाणि वा-अथवा कूप। तलागाणि वा-तालाब अथवा। दहाणि वा-झील। नईओ वा-नदियें अथवा। वावीओ वा-कमल रहित बावड़ी।पुक्खरिणीओ वा-पुष्करणी-कमल युक्त बावड़ी।दीहियाओवा-दीर्घिकालम्बी बावड़ी जिसमें जनता जल-क्रीड़ा करती है।गुजालियाओ वा-अथवा दीर्घ गम्भीर और कुटिल जलाशय। सराणि वा-अथवा बिना खोदा हुआ तालाब। सरपंतियाणि वा-परस्पर मिले हुए बहुत से सरोवर। सरसरपंतियाणि वा-बहुत से सरोवरों की पंक्तिएं आदि रास्ते में हों तो वह साधु। बाहाओ-भुजाओं को। पगिज्झिय २-ऊंची कर के। जाव-यावत्। नो निज्झाइजा-उन्हें न देखे क्योंकि। केवली-केवली भगवान कहते हैं कि ये कर्म बन्धन के कारण हैं जैसे कि जे-जो। तत्थ-वहां पर। मिगा वा-मृग-हरिण हैं। पसूवा-पशु अर्थात् अन्य पशु हैं। पक्खी वा-पक्षी हैं। सरीसिवा-अथवा सांप हैं। सीहा वा-सिंह-शेर हैं अथवा। जलचराजलचर जीव हैं। थलचरा वा-स्थलचर जीव हैं। खहचरा वा-खेचर-अकाश में विचरने वाले जीव हैं, इस प्रकार
SR No.002207
Book TitleAcharang Sutram Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmaramji Maharaj, Shiv Muni
PublisherAatm Gyan Shraman Shiv Agam Prakashan Samiti
Publication Year2003
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_acharang
File Size13 MB
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