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________________ ८३ प्रथम अध्ययन, उद्देशक ६ अथवा रुचिंसु बा ३- शिला आदि पर पीसा, पीसता है या पीसेगा ऐसे। बिलं वा लोणं-खान के लवण को । उब्भियं वा लोणं समुद्र से उत्पन्न होने वाले लवण को । अफासुयं अप्रासुक जानकर साधु । नो पडिग्गाहिज्जाग्रहण न करे। - मूलार्थ - गृहस्थ के घर मे भिक्षार्थ प्रविष्ट साधु को यदि यह ज्ञात हो जाए कि खदान एवं लवण समुद्रादि के जल से उत्पन्न लवण को किसी गृहस्थ ने सचित्त एवं जालों से युक्त शिला पर भेदन करके या पीस कर रखा है, या भेदन करके पीस कर रख रहा है या भेदन करके पीस कर रखेगा तो साधु को ऐसे अप्रासुक नमक को ग्रहण नहीं करना चाहिए । हिन्दी विवेचन - प्रस्तुत सूत्र में बताया गया है कि खान से एवं समुद्र से उत्पन्न लवण (नमक) को साधु ग्रहण न करे। इसके साथ सैन्धव, सौवर्चल आदि सभी प्रकार का सचित्त नमक साधु को ग्रहण नहीं करना चाहिए। यदि कोई गृहस्थ सचित्त नमक को सचित्त शिला पर उसके टुकड़े-टुकड़े करके दे या उसका बारीक चूर्ण बनाकर दे तो उसे अप्रासुक समझकर ग्रहण न करे । 'बिल' शब्द खान एवं 'उब्भियं ' शब्द समुद्र का बोधक है। और 'भिंदिसु' एवं 'रुचिंसु' इन उभय क्रियाओं से क्रमश: खंड-खंड करने एवं बारीक पीसने का निर्देश किया गया है। इसके अतिरिक्त लवण शब्द से यहां उपलक्षण से समस्त सचित्त पृथ्वीकाय का ग्रहण किया गया है। अतः संयमशील साधु को पृथ्वीकायिक जीवों की यत्ना करनी चाहिए, उसे किसी भी तरह से उक्त जीवों की विराधना नहीं करनी चाहिए । 'अप्रासुक' शब्द से यह भी सूचित किया गया है कि यदि सचित्त नमक अन्य पदार्थ या शस्त्र के संयोग से अचित्त हो गया है, तो फिर वह साधु के लिए अप्रासुक एवं अग्राह्य नहीं रह जाता है। अब अग्निकाय के आरम्भ का निषेध करते हुए सूत्रकार कहते हैं मूलम् - से भिक्खू वा० से जं० असणं वा ४ अगणिनिक्खित्तं तहप्पगारं असणं वा ४ अफासुयं नो०, केवली बूया आयाणमेयं, अस्संजए भिक्खुपडियाए उस्सिंचमाणे वा निस्सिंचमाणे वा आमज्जमाणे वा पमज्जमाणे वा ओयारेमाणे वा उव्वत्तमाणे वा अगणिजीवे हिंसिज्जा, अह भिक्खूणं पुव्वोवइट्ठा एस पइन्ना एस हेऊ एस कारणे एसुवएसे जं तहप्पगारं असणं वा ४ अगणिनिक्खित्तं अफासुयं नो० पडि० एयं॰ सामग्गियं ॥३६॥ छाया - स भिक्षुर्वा अथ यत् अशनं वा ४ अग्निनिक्षिप्तं तथाप्रकारं अशनं वा ४ अप्रासुकं न प्रतिगृण्हीयात् । केवली ब्रूयात् आदानमेतत्, असंयतः भिक्षुप्रतिज्ञया उत्सिंचन् वा निसिंचन् वा आमर्जयन् वा प्रमर्जयन् वा अवतारयन् वा अपवर्तयन् वा अग्निजीवान् हिंस्यात् । अथ भिक्षूणां पूर्वोपदिष्टा एषा प्रतिज्ञा एष हेतुः एतत् कारणं, अयमुपदेशः यत् तथा प्रकारं अशनं
SR No.002207
Book TitleAcharang Sutram Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmaramji Maharaj, Shiv Muni
PublisherAatm Gyan Shraman Shiv Agam Prakashan Samiti
Publication Year2003
Total Pages562
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_acharang
File Size13 MB
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