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________________ परिशिष्ट-३ कथाएं १. गवेषणा : कुरंग-दृष्टांत क्षितिप्रतिष्ठित नामक नगर में जितशत्रु राजा राज्य करता था। उसकी पटरानी का नाम सुदर्शना था। एक बार गर्भिणी रानी ने राजा के साथ चित्रसभा में प्रवेश किया। वहां उसे चित्रलिखित सुनहरे पीठ वाले मृगों को देखकर उनका मांस खाने का दोहद पैदा हो गया। दोहद पूरा न होने पर क्रमश: उसका शरीर दुर्बल होने लगा। उसको देखकर राजा ने खेदपूर्वक पूछा-'प्रिये! तुम्हारा शरीर प्रतिदिन इतना दुर्बल क्यों हो रहा है?' रानी ने राजा को अपने दोहद की अवगति दी। राजा ने तत्काल कनक पृष्ठ वाले मृगों को लाने के लिए राजपुरुषों को भेजा। राजपुरुषों ने अपने मन में सोचा कि जिस व्यक्ति को जो प्रिय होता है, वह उसमें आसक्त होकर प्रमादपूर्वक उस सुख में लीन हो जाता है। कनकपृष्ठ मृगों को श्रीपर्णी फल प्रिय होते हैं। यद्यपि वे इस समय नहीं मिलते हैं लेकिन श्रीपर्णी फल के समान मोदकों को बनाकर श्रीपर्णी वृक्ष के नीचे अधिक मात्रा में रखकर जाल को बिछाने से वे आकृष्ट हो जाएंगे। उन्होंने वैसा ही किया। कनकपृष्ठ वाले मृग घूमते हुए अपने यूथपति के साथ वहां आ गए। यूथपति ने श्रीपर्णी फल के आकार वाले ढ़ेर सारे मोदकों को देखकर मृगों से कहा-'तुम लोगों को जाल में बद्ध करने के लिए किसी धूर्त ने यहां जाल बिछाया है। इस मौसम में श्रीपर्णी फल नहीं फलते हैं। यदि फलते हैं तो भी इतनी मात्रा में नहीं होते। यदि ऐसा माने कि वायु के कारण इतने फल नीचे गिरे हैं, यह भी संभव नहीं है क्योंकि पहले भी वायु चलती थी लेकिन इतने सारे फल कभी नहीं गिरे अतः ऐसा प्रतीत होता है कि यह जाल हम लोगों के बंधन हेतु डाला गया है। तुम लोग इन फलों के पास मत जाना।' जिन मृगों ने यूथपति की बात को स्वीकार किया, वे दीर्घजीवी और सुखी हुए। आहार की लोलुपता के कारण जिन मृगों ने उसकी बात को स्वीकार नहीं किया, वे जाल में फंसकर दुःखी हो गए। २. गवेषणा : गज-दृष्टांत आनंदपुर नामक नगर में रिपुमर्दन राजा राज्य करता था। उसकी पटरानी का नाम धारिणी था। उसकी नगरी के पास सैकड़ों हाथियों से युक्त विन्ध्य पर्वत की उपत्यका में एक अरण्य था। एक बार राजा ने चिन्तन किया कि गज-बल राजा का सबसे बड़ा बल होता है अतः उसने हाथियों को पकड़ने के लिए अपने व्यक्तियों को प्रेरित किया। राजपुरुषों ने सोचा कि हाथियों को नलचारी अच्छी लगती है लेकिन वह वर्षाकाल में होती है। अभी ग्रीष्मकाल में संभव नहीं है। इस समय अरघट्ट-पानी निकालने के चरखे से सरोवर को भर दिया जाए, जिससे नलवण वनस्पति अधिक मात्रा में उग जाएगी। उन्होंने वैसा ही किया। नलवण के पास चारों ओर जाल बिछा दिए गए। इधर-उधर घूमते हुए हाथी अपने यूथपति के साथ वहां आए। उन नलवणों को देखकर यूथाधिपति ने हाथियों को सावधान किया-'यह नलवण वनस्पति १. गा. ५३/१-५४ वृ प. ३०, ३१ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001945
Book TitleAgam 41 Mool 02 Pind Niryukti Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2008
Total Pages492
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, & agam_pindniryukti
File Size9 MB
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