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________________ अनुवाद १९७ २९५/७. शिष्य बोला-महाराष्ट्र तथा कौशलक देश में उत्पन्न मनुष्य सौवीर कूर का भोजन करते हुए जीवन-यापन करते हैं तो भला मुनिजन उस भोजन से अपना जीवन-यापन क्यों नहीं कर सकते? २९५/८. आचार्य ने कहा-श्रमणों का त्रिक' शीत होता है और गृहस्थों का वही त्रिक उष्ण होता है। (यदि श्रमण प्रतिदिन आचाम्ल करे और तक न ले तो अजीर्ण आदि दोष होते हैं।) अतः मुनि के लिए तक्र आदि का ग्रहण अनुज्ञात है। कट्टर-घृतवटिका से मिश्रित तीमन द्रव्य के ग्रहण की भजना है-(ग्लानत्व आदि की स्थिति में लिया जा सकता है, अन्यथा नहीं।) २९५/९. शीतकाल में भी गृहस्थों का यह त्रिक-आहार, उपधि और शय्या-उष्ण होता है इसलिए उनका भोजन (बिना तक्रादि ग्रहण किए भी) बाहर और आभ्यन्तर ताप से जीर्ण हो जाता है। २९५/१०. यही त्रिक (आहार, उपधि और शय्या) मुनियों के लिए ग्रीष्मकाल में भी शीत होता है। उससे जठराग्नि मंद होने से अजीर्ण आदि दोष होते हैं। २९६. शुष्क अलेपकृद् द्रव्य • ओदन-तण्डुल आदि। • सत्तु-जौ आदि का चूर्ण। • कुल्माष-उड़द। • राजमाष-श्वेत चवला। • गोल चना। • वल्ल-निष्पाव। • तुवरी-अरहर की दाल। • मसूर। • मूंग • माष–काली उड़द आदि। २९७. अल्पलेपकृद् द्रव्य ये हैं, इनके ग्रहण में पश्चात्कर्म की भजना है • उद्भेद्य-बथुआ आदि शाक। • पेया-यवागू। • कंगू-कोद्रव धान्य। • तक्र-छाछ। • उल्लण-जिससे ओदन गीला किया जाता है। • सूप-रांधा हुआ मूंग आदि का सूप। • कांजिक-कांजी। • क्वथित-कढ़ी आदि। १. त्रिक-आहार, उपधि और शय्या। २. मुनि भिक्षा के लिए अनेक घरों में घूमता है अत: प्राप्त उष्ण आहार उपाश्रय में पहुंचते-पहुंचते ठंडा हो जाता है। वर्ष में एक बार वर्षा काल से पूर्व वस्त्र-प्रक्षालन के कारण कपड़े तथा वसति के निकट अग्नि न होने से शय्या भी शीतल होती है इसलिए तक्र आदि का ग्रहण साधु के लिए अनुज्ञात है। तक्र से जठराग्नि प्रदीप्त होती है (मवृ प. १६८)। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001945
Book TitleAgam 41 Mool 02 Pind Niryukti Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2008
Total Pages492
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, & agam_pindniryukti
File Size9 MB
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