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________________ अनुवाद १२९ ६९/३. राजा के अन्तःपुर में अपराध करने पर जिन आभूषणों को पहनकर व्यक्ति अन्तःपुर में गया, उन आभूषणों सहित वह नगर के मध्य में मारा गया। राजा ने कार्पटिक वेशधारी राजपुरुषों को नियुक्त किया। धन्य कहने वालों का वध तथा अधन्य कहने वालों का वध नहीं हुआ। ६९/४. ये मुनि ऋतु के अनुकूल, स्निग्ध, स्वादिष्ट और पर्याप्त आहार सम्मानपुरस्सर समय पर प्राप्त करते हैं, इसलिए ये धन्य हैं। इस प्रकार उन गुणों की प्रशंसा करने वाला मुनि आधाकर्म का उपभोग न करने पर भी उसकी अनुमोदना के दोष से युक्त होता है। ७०. आधाकर्म, अध:कर्म, आत्मघ्न तथा आत्मकर्म-इनमें जैसे व्यञ्जनों का नानात्व है, वैसे ही अर्थ में भी नानात्व है? ऐसा पूछने पर आचार्य कहते हैं७०/१. व्यञ्जन और अर्थ की चतुर्भंगी होती है १. एक अर्थ एक व्यंजन। २. एक अर्थ नाना व्यंजन। ३. नाना अर्थ एक व्यंजन। ४. नाना अर्थ नाना व्यंजन। ७०/२. लोक में एक अर्थ और एक व्यंजन वाले शब्द प्रचलित हैं-जैसे-क्षीर-क्षीर। एक अर्थ और बहु व्यंजन वाले शब्द-जैसे दूध के अर्थ में दुग्ध, पयः, पीलु, क्षीर आदि। ७०/३. एक व्यंजन और नाना अर्थ वाला शब्द, जैसे-गाय, भैंस और बकरी आदि के दूध के लिए क्षीर शब्द का प्रयोग । नाना अर्थ और नाना व्यंजन जैसे-घट, पट, कट, शकट, रथ आदि नाम।' ७०/४,५. एक वस्तु के लिए दो, तीन या अधिक बार अनेक व्यक्तियों के द्वारा आधाकर्म, आधाकर्म शब्द का प्रयोग, यह प्रथम भंग है (एक अर्थ और एक व्यञ्जन); आधाकर्म, अध:कर्म आत्मघ्न-ये नाना व्यंजन वाले एकार्थक शब्द हैं, यह दूसरा भंग है, जैसे-शक्र, इन्द्र आदि एकार्थक शब्द नाना व्यंजन वाले १. कथा के विस्तार हेतु देखें परि.-३, कथा सं. ७। २. टीकाकार के अनुसार अनुमोदना जनित दोष कार्य में कारण का उपचार करने से मान्य है (मवृ प. ५०)। ३. व्यवहारभाष्य में व्यञ्जन और अर्थ की चतुर्भंगी एवं उसके उदाहरण में निम्न दो गाथाओं का उल्लेख मिलता है। इन गाथाओं में शब्दभेद तथा उदाहरण में भिन्नता है लेकिन वाच्यार्थ एक ही है नाणतं दिस्सए अत्थे, अभिन्ने वंजणम्मि वि। वंजणस्स य भेदम्मि, कोइ अत्थो न भिज्जति ॥ पढमो त्ति इंद-इंदो, बितीयओ होइ इंद-सक्को त्ति। ततिओ गो-भूप-पसू, रस्सी चरमो घड-पडो त्ति ॥ (व्यभा १५५, १५६) ७०/१-३-ये तीनों गाथाएं भाषाविज्ञान की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। आधाकर्म के अध:कर्म, आत्मघ्न तथा आत्मकर्म आदि शब्द द्वितीय भंग एक अर्थ और नाना व्यञ्जन के अंतर्गत समाविष्ट होते हैं। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001945
Book TitleAgam 41 Mool 02 Pind Niryukti Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2008
Total Pages492
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, & agam_pindniryukti
File Size9 MB
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