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________________ ६ ७३ ७३/१-२२ 18 8 8 8 8 8 8 8 ७४ ७५ ७६ ७६/१-५. ७७ ७८ ७९ ८० ८०/१-५ ८१, ८१/१ ८२-८२/३ ८३ ८३/१ ८३/२ ८३/३, ४ ८३/५ ८४-८४/१ ८५-८६/१ ८६/२ ८७ ८८ ८९ ८९/१-३ ८९/४-७ ८९/८ ८९/९ ९०, ९० / १ ९०/२-४ ९१-९१/४ ९२ ९३ Jain Education International साधर्मिक के बारह निक्षेप । साधर्मिक के भेदों का स्वरूप - कथन । आधाकर्म के संदर्भ में किं द्वार का कथन । अशन आदि की कृत और निष्ठित के आधार पर चतुर्भंगी । अशन से संबंधित आधाकर्म विषयक दृष्टान्त । उपर्युक्त दृष्टान्त का विस्तार । पानक से संबंधित आधाकर्म का दृष्टान्त । खादिम और स्वादिम से संबंधित आधाकर्म । निष्ठित और कृत की परिभाषा । चावल आदि से संबंधित निष्ठित और कृत में दुगुना आधाकर्म । आधाकर्मिक वृक्ष की छाया से संबंधित मतान्तर । निष्ठित और कृत से उत्पन्न चतुर्भंगी । आधाकर्म से संबंधित अतिक्रम, व्यतिक्रम आदि का विवेचन । आधाकर्म ग्रहण में आज्ञाभंग आदि चार दोष । आज्ञाभंग दोष का विवेचन । अनवस्था दोष की व्याख्या । मिथ्यात्व दोष का विवेचन । विराधना दोष का स्पष्टीकरण । आधाकर्म की अकल्प्य विधि । आधाकर्म की अभोज्यता से संबंधित कथा । अभोज्य और अपेय पदार्थ । आधाकर्म से स्पृष्ट की अकल्प्यता । आधाकर्म अवयव से स्पृष्ट भाजन का कल्पत्रय करने का विधान । वमन और उच्चार के समान आधाकर्म के परिहार का निर्देश । अविधि-परिहरण से संबंधित कथानक । द्रव्य, कुल आदि की अपेक्षा से विधि- परिहरण तथा उसकी सार्थकता । आधाकर्म भोजन के ज्ञान की प्रविधि | पिंड नियुक्ति आधाकर्म से संबंधित शिष्य की जिज्ञासा एवं गुरु का समाधान । शुद्ध भोजन करते हुए भी परिणाम के आधार पर कर्म-बंधन एवं उसका दृष्टान्त । आधाकर्म युक्त अशुद्ध भोजन करने पर भी मुनि को कैवल्य - प्राप्ति । आज्ञाभंग को स्पष्ट करने वाला कथानक । आधाकर्मभोजी की निन्दा | औदेशिक द्वार के कथन की प्रतिज्ञा । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001945
Book TitleAgam 41 Mool 02 Pind Niryukti Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2008
Total Pages492
LanguagePrakrit, Sanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, & agam_pindniryukti
File Size9 MB
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