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________________ प्रता छठा उद्देशक २६१ राजा के प्रद्वेष से, सार्थ से बिछुड़ जाने पर अथवा चोरों द्वारा २८२४. भण्णति पवत्तिणी वा, अपहृत हो जाने पर एकाकी हो जाती है। तेसऽसति विसज्ज वतिणिमेतं ति। २८१८. अन्नत्थ दिक्खिया थेरी, तीसे धूता य अन्नहिं। विसज्जिए य नयंती, वारिज्जंती य सा एज्जा, धूयानेहेण तं गणं॥ अविसज्जंतीय मासलहू॥ स्थविरा मां अन्य गण में दीक्षित हुई और उसकी पुत्री प्रव्राजक आचार्य, उपाध्याय के अभाव में वे प्रवर्तिनी को अन्य गण में। वह मां अपनी बेटी से मिलने के लिए आचार्य आदि कहते हैं-इस व्रतिनी का विसर्जन कर दो। इतना कहने पर यदि को पूछती है। उनके द्वारा प्रतिषेध करने पर वह पुत्री के स्नेह से वह प्रवर्तिनी उसका विसर्जन करती है तो उसे अपने साथ ले एकाकी होकर उस गण में आती है। जाते हैं और यदि विसर्जन नहीं करती है तो प्रवर्तिनी को मासलघु २८१९. परचक्केण रट्ठम्मि, विद्दुते बोहिकादिणा। प्रायश्चित्त आता है। जहो सिग्घे पणट्ठासु, एज्ज एगाऽसहायिका॥ २८२५. वसभे य उवज्झाए, आयरियकुलेण वावि थेरेण। शत्रु सेना अथवा बोधिक-म्लेच्छ विशेष—इनके द्वारा राष्ट्र गणथेरेण गणेण वा, संघथेरेण संघेण ॥ अभिद्रुत हो जाने पर वहां से आर्यिकाएं शीघ्र पलायन कर जाती २८२६. भणिया न विसज्जेती, लहुगादी सोहि जाव मूलं तु। हैं। उनमें से कोई एक आर्यिका असहाय होकर एकाकी हो जाती तीसे हरिऊण ततो, अण्णीसे दिज्जते उ गणो।। यदि संयती के कहने पर भी प्रवर्तिनी उसको विसर्जित नहीं २८२०. सोऊण काइ धम्म, उवसंता परिणया य पव्वज्जं करती है तो क्रमशः कोई वृषभ मुनि, उपाध्याय, आचार्य, निक्खंत मंदपुण्णा, सो चेव जहिं तु आरंभो॥ कुलस्थविर, गणस्थविर और संघस्थविर जाकर समझाते हैं। कोई स्त्री धर्म सुनकर उपशांत हुई और प्रव्रज्या लेने के इतने पर भी वह विसर्जित नहीं करती है तो क्रमशः उसको भाव से परिणत होकर वहां से निष्क्रमण कर पार्श्वस्थ मुनियों के चतुर्लघु, चतुर्गुरु, षइलघु, षड्गुरु, छेद और मूल प्रायश्चित्त पास दीक्षित हो गई। उसने सोचा-मैं मंदपुण्या हूं। जिस असंयम प्राप्त होता है। इतने पर भी यदि समस्या नहीं सुलझती है तो उस से मैं डरती थी, वही आरंभ-असंयम मेरे पर आ गिरा है। प्रवर्तिनी के पास से उसका हरण कर अन्य गण में उसको २८२१. आभीरी पण्णवेत्ताण, गता ते आयतट्ठिया। समर्पित कर दिया जाता है, अन्य प्रवर्तिनी की निश्रा में उसे दे अह तत्थेतरे पत्ता, निक्खमंति तमुज्जतिं॥ दिया जाता है। आयतार्थिक-संविग्न मुनि एक आभीरी को प्रज्ञापित २८२७. एमेव उवज्झाए, अविसज्जते हवंति लहुगा उ। कर-दीक्षा के लिए तैयार कर अन्यत्र चले गए। वहां पार्श्वस्थ भण्णंते गुरुगादी, वसभा वा जाव नवमं तु॥ आदि इतर मुनि आ गए। वे उस उद्यत आभीरी को प्रव्रजित कर २८२८. एमेव य आयरिए, अविसज्जंते हवंति गुरुगा उ। देते हैं। वह पूर्ववत् असंयम से भीत होकर वहां समाधि को प्रास वसभादिएहि भणिए, छल्लहुगादी उ जा चरिमे ।। नहीं होती। यदि उस प्रवर्तिनी का उपाध्याय उस व्रतिनी के विसर्जन २८२२. दटुं वा सोउं वा, मग्गती तओ पडिच्छिया विहिणा। के लिए नहीं कहता तो उसे चतुर्लघु का प्रायश्चित्त प्रास होता है। संविग्गसिक्ख मग्गति, पवत्तिणी आयरि-उवज्झं। इसी प्रकार वृषभ आदि के क्रम से गुरु प्रायश्चित्त से वृद्धिंगत तब वह मूलधर्मग्राहक आचार्य को खोजती हुई, उनको होता हुआ यावत् नौवें अनवस्थाप्य प्रायश्चित्त तक पहुंच जाता देखने या सुनने के लिए प्रयत्नशील रहती है। वह संविग्नशिक्षा है। इसी प्रकार आचार्य यदि उस व्रतिनी का विसर्जन नहीं करा ग्रहण करने की मार्गणा करती है। वह अन्य प्रवर्तिनी, आचार्य पाता तो चतुर्गुरु प्रायश्चित्त आता है और वृषभ आदि के कहने अथवा उपाध्याय की मार्गणा करती है। उसे विधिपूर्वक स्वीकार पर भी यदि विसर्जन नहीं होता है तो षड्लघु से वृद्धिंगत होते. कर लेना चाहिए। होते यावत् चरम प्रायश्चित्त-पारांचित प्राप्त होता है। २८२३. ण्हाणादिएसु मिलिया, पव्वावेंते भणंति ते तीसे। २८२९. साहत्थमुंडियं गच्छवासिणी बंधवे विमग्गंती। ___होह व उज्जुयचरणा, इमं च वइणिं वयं णेमो॥ अण्णस्स देति संघो, णाण-चरणरक्खणा जत्थ। वे मूल आचार्य उसको जिनस्नान आदि समवसरण में पार्श्वस्थों द्वारा स्वहस्तमुंडित वह गच्छवासिनी श्रमणी मिल जाते हैं। वे उसके प्रव्राजक आचार्य को कहते हैं-या तो तुम बांधव अर्थात् उद्यतविहारी आचार्य की अन्वेषणा करती है, उसे उद्यतचरण वाले हो जाओ अन्यथा हम इस व्रतिनी को अपने संघ अन्य आचार्य अथवा प्रवर्तिनी को दे देता है-सौंप देता है साथ ले जाएंगे। जहां उसके ज्ञान, चरण की रक्षा होती है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001944
Book TitleSanuwad Vyavharbhasya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2004
Total Pages492
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, G000, & G005
File Size14 MB
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