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________________ ८० पहले निस्तारण कर देना चाहिए। शेष पूर्ववत्। ७३७. भिक्खुणि खुड्डी थेरी, अभिसेग पवत्तिणि संजमे पडुपण्णे। करणं तासिं इणमो, संजोगगमं तु वोच्छामि।। ७३८. तरुणी निप्फन्त्रपरिवारा सलद्धिया जा य होति अब्भासे। अभिसेगाए चउरो, सेसाणं पंच चेव गमा॥ संयम में वर्तमान भिक्षुणी, क्षुल्लिका, स्थविरा, अभिषेका तथा प्रवर्तिनी-इनके निस्तारणकरण का यह संयोगगम कहूंगा। तरुणी, निष्पन्ना, सपरिवारा, सलब्धिका, तथा जो निकट हो-ये भिक्षुणी के पांच गम हैं। अभिषेका के चार और शेष सबके पांच-पांच गम हैं। ७३९. खुड्डे थेरे भिक्खू, अभिसेगायरिय भत्तपाणं तु। करणं तेसिं इणमो, संजोगगमं तु वोच्छामि।। ७४०. तरुणे निप्फन्नपरिवारे, सलद्धिए जे य होति अब्भासे। अभिसेयम्मि य चउरो, सेसाणं पंच चेव गमा।। राजा द्वारा निरुद्ध भक्तपान के प्रसंग में क्षुल्लक, स्थविर, भिक्षुक, अभिषेक और आचार्य-इनका भक्तपान राजा द्वारा निरुद्ध कर देने पर इनके निस्तारणकरण के संयोगगम को मैं कहूंगा। तरुण, निष्पन्न, सपरिवार, सलब्धिक तथा निकट-ये क्षुल्लक के पांच गम हैं। अभिषेक में चार और शेष सभी में पांचपांच गम हैं। ७४१. खुड्डिय थेरी भिक्खुणि, अभिसेग पवत्तिणी भत्तपाणं तु। करणं तासिं इणमो, संजोगगमं तु वोच्छामि। ७४२. तरुणी निप्फन्नपरिवारा, सलद्धिया जा य होति अब्भासे। अभिसेगाए चउरो, सेसाणं पंच चेव गमा।। साध्वी का निस्तारण क्रम-क्षुल्लिका, स्थविरा, भिक्षुणी, अभिषेका तथा प्रवर्तिनी-इनके भक्तपान संबंधी निस्तारणकरण का यह संयोगगम मैं कहूंगा। तरुणी, निष्पन्ना, सपरिवारा, सलब्धिका, जो निकट हो-ये क्षुल्लिका के पांच गम हैं। अभिषेका के चार तथा शेष के पांचपांच गम हैं। ७४३. अणुकंपा जणगरिहा, तिक्खखुधो तेण खड्डओ पढम। इति भत्तपाणरोहे, दुल्लभभत्ते वि एमेव ।। प्रश्न होता है कि भक्त-पाननिरोध के प्रसंग में क्षुल्लक आदि के क्रम का प्रयोजन क्या है? सानुवाद व्यवहारभाष्य क्षुल्लक का प्रथम निस्तारण करने से उसके प्रति अनुकंपा प्रदर्शित होती है। यदि पहले आचार्य आदि का निस्तारण किया जाता है तो जनगीं होती है। क्षुल्लक की भूख तीक्ष्ण होती है, इसलिए उसका निस्तारण पहले, फिर स्थविर, फिर भिक्षुक, फिर अभिषेक और फिर आचार्य, क्योंकि भूख सहने में ये उत्तरोत्तर सक्षम होते हैं। दुर्लभभक्त के प्रसंग में भी यही क्रम है। ७४४. खुड्डे थेरे भिक्खू, अभिसेगायरिय दुल्लभं भत्तं। करणं तेसिं इणमो, संजोगगमं तु वोच्छामि।। ७४५. तरुणे निप्फन्नपरिवारे, सलद्धिए जे य होति अब्भासे। अभिसेयम्मि य चउरो, सेसाणं पंच चेव गमा।। ७४६. खुड्डिय थेरी भिक्खुणि, अभिसेयपवित्ति दुल्लभं भत्तं । करणं तासिं इणमो, संजोगगमं तु वोच्छामि ।। ७४७. तरुणी निप्फन्नपरिवारा, सलद्धिया जा य होति अब्भासे। अभिसेयाए चउरो, सेसाणं पंच चेव गमा।। दुर्भिक्ष के समय निस्तारण विधि-क्षुल्लक, स्थविर, भिक्षु, अभिषेक तथा आचार्य। दुर्लभभक्त (दुर्भिक्ष) के प्रसंग में इनके निस्तारणकरण में यह संयोगगम मैं कहूंगा। तरुण, निष्पन्न, सपरिवार, सलब्धिक, जो पास हो, ये क्षुल्लक के पांच गम है। अभिषेक में चार तथा शेष में पांच-पांच गम हैं। क्षुल्लिका, स्थाविरा, भिक्षुणी, अभिषेका तथा प्रवर्तिनीइनके दुर्लभभक्त के प्रसंग में निस्तारण कारण में यह संयोगगम में कहूंगा। तरुणी, निष्पन्न, सपरिवारा, सलब्धिका तथा जो निकट हो-ये क्षुल्लिका के पांच गम हैं। अभिषेका के चार और शेष सभी के पांच-पांच गम हैं। ७४८. परिणाय गिलाणस्स य, दोण्ह वि कतरस्स होति कायव्वं । असतीय गिलाणस्स य, दोण्ह वि संते परिणाए।। दो मुनि हैं-एक भक्तप्रत्याख्यात है और एक ग्लान है। दोनों में किसका वैयावृत्त्य करना चाहिए। शक्ति हो तो दोनों का, शक्ति न हो तो ग्लान का वैयावृत्त्य करना चाहिए। दोनों का वैयावृत्त्य करते हुए भक्तप्रत्याख्यात का विशेष वैयावृत्त्य करना चाहिए। ७४९. सावेक्खो उ गिलाणो, निरवेक्खो जीवितम्मि उ परिणी। इति दोण्ह वि कायव्वे, उक्कमकरणे करे असहू॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001944
Book TitleSanuwad Vyavharbhasya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2004
Total Pages492
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, G000, & G005
File Size14 MB
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