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________________ ( १९२) कल्याणकारके . भावार्थ:-वातप्रबल वातरक्तमें जामुन, कंदवृक्ष, दोनों [छोटी बडी] कटेली, नीम, केला, कुंदरु, कमल, नील कमल, पिप्पली मूल, पृस्नपर्णी, इन सवको घी, इक्षुरस, दूध में पीसकर इस कल्कको ठण्डा ही लेपन करना चाहिए।। ३९ ॥ मुस्तादिलेप । ... मुस्ताप्रियालुमधुकाम्रविदारिगंधा । दूर्वोवुजासितपयोजशतावरीभिः ॥ भूनिंबचंदनकशेरुककुष्ठकाष्टा-। पुष्पः प्रलेप इह सर्वजशोणितेषु ॥ ४० ॥ भावार्थ:--सन्निपातज वातरक्तमें नागरमोथा, चिरौंजी, मुलैठी, आमकी छाल, शातपर्णी, प्रियंगु, दूब, कगल, श्वेतकमल, शतावरी, चिरायता, लालचंदन, कशेरु, कूट, दारु हलदी, इनका लेपन करना चाहिये ॥ ४० ॥ . विम्ब्यादिघृत बिंबीकशेरुकबलातिबलाटरूष-। जीवंनिकामधुकचंदनसारिवाणाम् ॥ कल्केन तत्क्वथिततोयपयोविपक्क- । माज्यं पिवेदनिलशोणितपित्तरोगी ॥४१॥ .. . भावार्थ:-पित्ताधिक वात रोगीको कुंदरु, कशेरु, बला, अतिबला, अडूस , जीवंति, मुलैठी, चंदन, सारिव, इनके कल्कको, उन्ही औषधियोंके काढा और दूधके द्वारा पकाये हुए घीको पिलाना चाहिये ॥ ४१ ॥ अजपयःपान । यष्टीकपायपरिपकमजापया वा। शीतीकृतं मधुककल्कसिताज्ययुक्तम् । पीत्वानिलामचिरादुपहन्त्यजम ॥ मम्रान्वितातिवहपिनविकारजातान् ॥ ४२ ॥ भावार्थ:----मुलेठी का कषाय द्वारा पकाये गये बकरीके ठण्डे दूधम, मुलेठी का ही कल्क, खांड और घी मिलाकर पीनेसे, शील ही वातरक्त, रक्तपित्त आदि समस्त पित्तविकार नाश हो जाते हैं ॥ ४२ ॥ खंडकादि दुग्ध । टुंटकपीलुबृहतीद्वयपाटलाग्नि- । मंथाश्वगंधसुषवीमधुकांबुपकम् ।। : Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001938
Book TitleKalyankarak
Original Sutra AuthorUgradityacharya
AuthorVardhaman Parshwanath Shastri
PublisherGovind Raoji Doshi Solapur
Publication Year1940
Total Pages908
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Ayurveda, L000, & L030
File Size18 MB
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