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________________ सप्तसप्ततितमं पर्व उदपाद्येष यस्त्वत्तः कल्पलोकात् परिच्युतः । बन्धने मेघवाहोऽसौ दुःखमास्ते तथेन्द्रजित् ॥३०॥ विधाय सुकृतज्ञेन वीरेण गुणशालिना । पद्माभेन सह प्रीतिं भ्रातृपुत्रौ विमोचय ॥३१॥ जीवितेश समुत्तिष्ठ प्रयच्छ वचनं प्रियम् । सुचिरं देव किं शेषे विधत्स्व नृपतेः क्रियाम् ॥ ३२ ॥ विरहाग्निप्रदीप्तानि भृशं सुन्दरविभ्रम । कान्त विध्यापयाङ्गानि प्रसीद प्रणयिप्रिय ॥ ३३ ॥ अवस्थामेतकां प्राप्तमिदं वदनपङ्कजम्। प्रियस्य हृदयालोक्य दीर्यते शतधा न किम् ॥ ३४ ॥ वज्रसारमिदं नूनं हृदयं दुःखभाजनम् । ज्ञात्वापि यत्तवावस्थामिमां तिष्ठति निर्दयम् ॥ ३५॥ विधे किं कृतमस्माभिर्भवतः सुन्दरेतरम् । विहितं येन कर्मेदं स्वया निर्दयदुष्करम् ॥ ३६ ॥ समालिङ्गनमात्रेण दूरं निर्धूय मानकम् । परस्परार्पणस्वादु नाथ यन्मधुसेवितम् ॥ ३७॥ यच्चान्यत्प्रमदागोत्रग्रहणस्खलिते सति । काचीगुणेन नीतोऽसि बहुशो बन्धनं प्रिये ॥ ३८ ॥ वतंसेन्दीवराघातात् कोपप्रस्फुरिताधरम् । प्रापितोऽसि प्रभो यच्च किञ्जल्कोच्छु सितालिकम् ॥ ३६ ॥ प्रेमको पविनाशाय यच्चातिप्रियवादिना । कृतं पदार्पणं मूर्ध्नि हृदयद्रवकारणम् ॥४०॥ यानि चात्यन्तरम्याणि रतानि परमेश्वर । कान्त चाटुसमेतानि सेवितानि यथेप्सितम् ॥४१॥ परमानन्दकारीणि तदेतानि मनोहर । अधुना स्मर्यमागानि दहन्ति हृदये भृशम् ॥४२॥ कुरु प्रसादमुत्तिष्ट पादावेषा नमामि ते । न हि प्रियजने कोपः सुचिरं नाथ शोभते ॥ ४३ ॥ एवं रावणपत्नीनां श्रुत्वापि परिदेवनम् । कस्य न प्राणिनः प्राप्तं हृदयं द्रवतामलम् ३ ॥४४॥ क्रोध नहीं किया अपितु हम लोगोंको तुम पहले सान्त्वना देते रहे हो ||२६|| जिसने स्वर्ग लोकसे च्युत हो कर आपसे जन्म ग्रहण किया था ऐसा वह मेघवाहन और इन्द्रजित् शत्रुके बन्धनमें दुःख भोग रहा है ॥ ३० ॥ सो सुकृतको जानने वाले गुणशाली वीर रामके साथ प्रीति कर अपने भाई कुम्भकर्ण तथा पुत्रोंको बन्धन से छुड़ाओ ||३१|| हे प्राणनाथ ! उठो, प्रिय वचन प्रदान करो । हे देव ! चिरकाल तक क्यों सो रहे हो ? उठो राजकार्य करो ||३२|| हे सुन्दर चेष्टाओंके धारक ! हे कान्त ! हे प्रेमियोंसे प्रेम करने वाले ! प्रसन्न होओ और विरह रूपी अग्निसे जलते हुए हमारे अंगों को शान्त करो ||३३|| रे हृदय ! इस अवस्थाको प्राप्त हुए पतिके मुख कमलको देखकर तू सौ टूक क्यों नहीं हो जाता है ? ||३४|| जान पड़ता है कि हमारा यह दुःखका भाजन हृदय का बना हुआ है इसीलिए तो तुम्हारी इस अवस्थाको जानकर भी निर्दय हुआ स्थित है ॥३५॥ हे विधातः ! हम लोगोंने तुम्हारा कौन सा अशोभनीक कार्य किया था जिससे तुमने यह ऐसा कार्य किया जो निर्दय मनुष्योंके लिए भी दुष्कर है -कठिन है ॥२६|| हे नाथ ! आलिङ्गन मात्रसे मानको दूरकर परस्पर - एक दूसरे के आदान-प्रदानसे मनोहर जो मधुका पान किया था ॥३७॥ हे प्रिय ! अन्य स्त्रीका नाम लेनेरूप अपराध होने पर जो मैंने तुम्हें अनेकों बार मेखलासूत्र से बन्धन में डाला था ||३८|| हे प्रभो ! मैंने क्रोधसे ओंठको कम्पित करते हुए जो उस समय तुम्हें कर्णाभरणके नील कमलसे ताड़ित किया था और उस कमलकी केशर तुम्हारे ललाट में जा लगी थी ॥ ३६ ॥ प्रणय कोपको नष्ट करनेके लिए मधुर वचन कहते हुए जो तुमने हमारे पैर उठा कर अपने मस्तक पर रख लिये थे और उससे हमारा हृदय तत्काल द्रवीभूत हो गया था, और हे परमेश्वर ! हे कान्त ! मधुर वचनोंसे सहित अत्यन्त रमणीय जो रत इच्छानुसार आपके साथ सेवन किये गये थे । हे मनोहर ! परम आनन्दको करने वाले वे सब कार्य इस समय एक-एककर स्मृति-पथ में आते हुए हृदयमें तीव्र दाह उत्पन्न कर रहे हैं ||४०-४२ ॥ हे नाथ ! प्रसन्न होओ, उठो, मैं आपके चरणों में नमस्कार करती हूँ। क्योंकि प्रियजनों पर चिरकालतक रहने वाला क्रोध शोभा नहीं देता ||४३|| गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! इस तरह रावणकी स्त्रियोंका विलाप सुनकर किस प्राणीका हृदय अत्यन्त द्रवताको प्राप्त नहीं हुआ था ? ॥४६॥ १. प्रियम् म० । २ विलाप । ३ द्रवताम् + अलम् । १०-३ Jain Education International * For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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