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________________ २८ पद्मपुराणे प्रभ्रष्टदुध आकृष्य दारपाणिभ्यां निष्ठुरं कुञ्चितेक्षणः । तापनीयानि पद्मानि चकार जिन पूजनम् ॥५६॥ पुनरागम्य दुःखाभिर्वाग्भिः सञ्चोदयन्मुहुः । अक्षमालां करादस्य गृहीत्वा चपलोऽच्छिनत् ॥५७॥ विकीणां तां पुरस्तस्य पुनरादाय सर्वतः । शनैरघटयद् भूयः करे चास्य समर्पयत् ॥५॥ करे चाकृष्य चिच्छेद पुनश्चाघट्टयञ्चलः । चकार गलके भूयो निदधे मस्तके पुनः ॥५६॥ ततोऽन्तःपुरराजीवखण्डमध्यमुपागतः । चक्रे ग्रीष्माभितप्तस्य क्रीडा वन्यस्य दन्तिनः ॥६॥ तस्थूरी पृष्ठकचञ्चलः । प्रवृत्तः शङ्कया मुक्तः सोऽन्तःपुरविलोलने ॥६॥ कृतग्रन्थिकमाधाय कण्ठे कस्याश्चिदंशुकम् । गुर्वारोपयति द्रव्यं किञ्चिस्मितपरायणः ॥६॥ उत्तरीयेण कण्ठेऽन्यां संयम्यालम्बयत्पुरः । स्तम्भेऽमुञ्च पुनः शीघ्रं कृतदुःखविचेष्टिताम् ।।६३।। दीनारैः पञ्चभिः काञ्चित् काचीगुणसमन्विताम् । हस्ते निजमनुष्यस्य व्यक्रोणात्क्रीडनोद्यतः ॥६॥ नूपुरौ कर्णयोश्चके केशपाशे च मेखलाम् । कस्याश्चिन्मूनि रत्नं च चकार चरणस्थितम् ॥६५।। अन्योन्यं मृर्द्धजैरन्या बबन्ध कृतवेपना । चकार मस्तकेऽन्यस्याश्छेकं कूजन्मयूरकम् ॥६६॥ एवं महावृषेणेव गोकुलं परमाकुलम् । कृतमन्तःपुरं तेन सनिधी रक्षसां विभोः ॥६७॥ अभागीद्रावणं ऋद्धस्त्वया रे राक्षसाधम । मायया सत्त्वहीनेन राजपुत्री तदा हृता ॥६॥ अधुना पश्यतस्तेऽहं सर्वमेव प्रियाजनम् । हरामि यदि शक्नोषि प्रतीकारं ततः कुरु ॥६६॥ के मुख पर कठोर प्रहार करने लगा ॥५५॥ उसने नेत्रोंको कुछ संकुचित कर दुष्टतापूर्वक स्त्रीके दोनों हाथोंसे स्वर्णमय कमल छीन लिये तथा उनसे जिनेन्द्र भगवानकी पूजा की ॥५६।। फिर आकर दुःखदायी वचनोंसे उसे बार-बार खिझाकर उस चपल अंगदने रावणके हाथसे अक्षमाला लेकर तोड़ डाली ॥५७॥ जिससे वह माला उसके सामने बिखर गई। थोड़ी देर बाद सब जगह से बिखरी हुई उसी मालाकी उठा धीरे-धीरे पिरोया और फिर उसके हाथमें दे दी ॥५८।। तर उस चपल अंगदने रावणका हाथ खींच वह माला पुनः तोड़ डाली और फिर पिरो कर उसके गले में डाली। फिर निकाल कर मस्तक पर रक्खी ॥५६॥ तत्पश्चात् वह अन्तःपुर रूपी कमल वनके वीचमें जाकर गरमीके कारण संतप्त जंगली हाथीकी क्रीड़ा करने लगा अर्थात् जिस प्रकार गरमीसे संतप्त हाथी कमलवनमें जाकर उपद्रव करता है उसी प्रकार अंगद भी अन्तःपुरमें जाकर उपद्रव करने लगा ॥६०॥ वन्धनसे छुटे दुष्ट दुर्दान्त घोड़ेके समान चश्चल अङ्गद निःशङ्क हो अन्तःपुरके विलोड़न करनेमें प्रवृत्त हुआ ॥६१।। उसने किसी स्त्रीका वस्त्र छीन उसकी रस्सी बना उसीके कण्ठमें बांधी और उस पर बहुत वजनदार पदार्थ रखवाये । यह सब करता हुआ वह कुछ-कुछ हँसता जाता था ।।६२|| किसी स्त्रीके कण्ठमें उत्तरीय वस्त्र बाँधकर उसे खम्भेसे लटका दिया फिर जब वह दुःखसे छटपटाने लगी तब उसे शीघ्र ही छोड़ दिया ॥६३।। क्रीड़ा करनेमें उद्यत अङ्गदने मेखला सूत्रसे सहित किसी स्त्रीको अपने ही आदमीके हाथमें पाँच दीनार में बेच दिया ॥६४॥ उसने किसी स्त्रीके नूपुर कानोंमें, और मेखला केशपाशमें पहिना दी तथा मस्तकका मणि चरणों में बाँध दिया ॥६५।। उसने भयसे काँपती हुई कितनी ही अन्य स्त्रियोंको परस्पर एक दूसरेके शिरके बालोंसे बाँध दिया तथा किसी अन्य स्त्रीके मस्तक पर शब्द करता हुआ चतुर मयूर बैठा दिया ।।६६।इस प्रकार जिस तरह कोई सांड़ गायोंके समूहको अत्यन्त व्याकुल कर देता है। उसी तरह उसने रावणके समीप ही उसके अन्तःपुरको अत्यन्त व्याकुल कर दिया था ॥६७|| उसने क्रुद्ध होकर रावणसे कहा कि अरे नीच राक्षस ! तूने उस समय पराक्रमसे रहित होनेके कारण मायासे राजपुत्रीका अपहरण किया था परन्तु इस समय मैं तेरे देखते देखते तेरी सब स्त्रियोंको अपहरण करता हूँ। यदि तेरी शक्ति हो तो १. दुर्दान्तः म० । २. विक्रीणात् म०, ज० । ३. कृतवेपना म० । ४. क्रुद्धिसत्वया म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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