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________________ द्वाविंशत्युत्तरशतं पर्व ४०७ सद्विद्याधरकन्याभिस्ततश्चास्मि हृता सती । अवोचे संविपश्चिद्भिरिदं विविधदर्शनैः ॥४३॥ अलं प्रव्रज्यया तावद् वयस्येवं विरुद्धया । इयमत्यन्तबद्धानां पूज्यते ननु नैष्ठिकी ॥४४॥ यौवनोद्या तनुः क्वेयं क्व चेदं दुष्करं व्रतम् । शशलक्षणदीधित्या भिद्यते किं महीधरः ॥४५॥ गच्छामस्त्वां पुरस्कृत्य वयं सर्वाः समाहिताः । बलदेवं वरिष्यामस्तव देवि समाश्रयात् ॥४६॥ अस्माकमपि सर्वासां त्वमग्रमहिषी भव । क्रीडामः सह रामेण जम्बूद्वीपतले सुखम् ॥४७॥ अत्रान्तरे समं प्राप्ता नानालङ्कारभूषिताः । भूयःसहस्रसंख्यानाः कन्या दिव्यश्रियान्विताः ॥४८॥ राजहंसवधूलीला मनोज्ञगतिविभ्रमाः। सीतेन्द्र विक्रियाजन्या जग्मुः पद्मसमीपताम् ॥४६॥ वदन्त्यो मधुरं काश्वित्परपुष्टस्वनादपि । विरेजिरेतरां कन्याः साक्षाल्लदम्य इव स्थिताः ॥५०॥ मनःप्रह्लादनकरं परं श्रोत्ररसायनम् । दिव्यं गेयामृतं चक्रवंशवीणास्वनानुगम् ॥५॥ भ्रमरासितकेश्यस्ताः क्षणांशुसमतेजसः । सुकुमारास्तलोदयः पीनोमतपयोधराः ॥५२॥ चारुशृङ्गारहासिन्यो नानावर्णसुवाससः । विचित्रविभ्रमालापाः कान्तिपूरितपुष्कराः ॥५३॥ कामयाञ्चक्रिरे मोहं सर्वतोऽवस्थिता मुनेः । श्रीबाहुबलिनः पूर्व यथा त्रिदशकन्यकाः ॥५४॥ आकृष्य बकुलं काचिच्छायाऽप्तौ चिन्वती क्वचित् । उद्वेजितालिचक्रण श्रमणं शरणं स्थिता ॥५५॥ काश्चिस्किल विवादेन कृतपक्षपरिग्रहाः । पप्रच्छुनिर्णयं देव किंनामाऽयं वनस्पतिः॥५६॥ पण्डिता माननेवाली मैं उस समय बिना बिचारे ही आपको छोड़कर दीक्षिता हो गई और तपस्विनी बनकर इधर-उधर विहार करने लगी ॥४०-४२।। तदनन्तर विद्याधरोंकी उत्तम कन्याएँ मुझे हरकर ले गई। वहाँ उन विदुषी कन्याओंने नाना उदाहरण देते हुए मुझसे कहा कि ऐसी अवस्थामें यह विरुद्ध दीक्षा धारण करना व्यर्थ है क्योंकि यथार्थमें यह दीक्षा अत्यन्त वृद्धा स्त्रियों के लिए ही शोभा देती है ॥४३-४४|| कहाँ तो यह यौवनपूर्ण शरीर और कहाँ यह कठिन व्रत ? क्या चन्द्रमाकी किरणसे पर्वत भेदा जा सकता है ? ॥४।। हम सब तुम्हें आगे कर चलती हैं और हे देवि! तुम्हारे आश्रयसे बलदेवको वरेंगी-उन्हें अपना भर्ता बनावेंगी ॥४६ हम सभी कन्याओंके बीच तुम प्रधान रानी होओ। इस तरह रामके साथ हम सब जम्बूद्वीपमें सुखसे क्रीड़ा करेंगी ॥४७। इसी बीचमें नाना अलंकारोंसे भूषित तथा दिव्य लक्ष्मीसे युक्त हजारों कन्याएँ वहाँ आ पहुँचीं ॥४८॥ राजहंसीके समान जिनकी सुन्दर चाल थी ऐसी सीतेन्द्रकी विक्रियासे उत्पन्न हुई वे सब कन्याएँ रामके समीप गई ॥४६॥ कोयलसे भी अधिक मधुर बोलनेवाली कितनी ही कन्याएँ ऐसी जान पड़ती थीं मानो साक्षात् लक्ष्मी ही स्थित हों ॥५०॥ कितनी ही कन्याएँ मनको आह्लादित करनेवाले, कानोंके लिए उत्तम रसायन स्वरूप तथा बाँसुरी और वीणाके शब्दसे अनुगत दिव्य संगीतरूपी अमृतको प्रकट कर रही थीं। जिनके केश भ्रमरोंके समान काले थे, जिनकी कान्ति बिजलीके समान थी, जो अत्यन्त सुकुमार और कृशोदरी थीं, स्थूल और उन्नत स्तनोंको धारण करनेवाली थीं, सुन्दर श्रृंगार पूर्ण हास्य करनेवालीं थी, रङ्गविरङ्गे वस्त्र पहने हुई थीं, नाना प्रकारके हाव-भाव तथा आलाप करनेवाली थीं और कान्तिसे जिन्होंने आकाशको भर दिया था ऐसी वे सब कन्याएँ मुनिके चारों ओर स्थित हो उस तरह मोह उत्पन्न कर रही थीं, जिस तरह कि पहले बाहुबली के आसपास खड़ी देव-कन्याएँ ।।५१-५४॥ कोई एक कन्या छायाकी खोज करती हुई वकुल वृक्षके नीचे पहुँची। वहाँ पहुँचकर उसने उस वृक्षको खींच दिया जिससे उसपर बैठे भ्रमरोंके समूह उड़कर उस कन्याकी ओर झपटे और उनसे भयभीत हो वह कन्या मुनिकी शरणमें जा खड़ी हुई ॥५५॥ कितनी ही कन्याएँ किसी १. वयस्येव म०, ज.। २. न तु म । ३. बललक्ष्मणदीधित्वा म०, शललक्ष्मण दीर्घित्वा ज०, क०, ख०। ४. छायासौ। ५. विषादेन म०, ज० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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