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________________ ४०५ द्वाविंशत्युत्तरशतं पर्व अथासावच्युतेन्द्रेण प्रयुक्तावधिचक्षुषा । उदारस्नेहयुक्तेन सीतापूर्वेण वीक्षितः ॥१३॥ आत्मनो भवसंवत्त संस्मृत्य च यथाक्रमम् । जिनशासनमार्गस्य प्रभवं च महोत्तमम् ॥१४॥ दध्यौ सोऽयं नराधीशो रामो भुवनभूषणः । योऽभवन्मानुषे लोके स्त्रीभूतायाः पतिर्मम ।।१५।। पश्य कर्मविचित्रत्वान्मानसस्य विचेष्टितम् । अन्यथाकाक्षितं पूर्वमन्यथा काच्यतेऽधुना ॥१६॥ कर्मणः पश्यताधानं ही शुभाशुभयोः पृथक । विचित्रं जन्म लोकस्य यत्साक्षादिदमीच्यते ॥१०॥ जगतो विस्मयकरौ सीरिचक्रायुधाविमौ । जातावूधिरस्थानभाजावुचितकर्मतः ॥१८॥ एकः प्रक्षीणसंसारो ज्येष्ठश्वरमदेहथक् । द्वितीयः पूर्णसंसारो निरये दुःखितोऽभवत् ॥१६॥ विषयैर वितृप्तारमा लचमणो दिव्यमानुषैः । अधोलोकमनुप्राप्तः कृतपापोऽभिमानतः ॥२०॥ राजीवलोचनः श्रीमानेषोऽसौ लागलायुधः । विप्रयोगेन सौमित्ररुपेतः शरणं जिने ॥२१॥ बहिः शत्रून् पराजित्य हलररनेन सुन्दरः । इन्द्रियाण्यधुना जेतुमुद्यतो ध्यानशक्तितः ॥२२॥ तदस्थ पपकश्रेणिमारूढस्य करोमि यत् । इह येन वयस्यो मे ध्यानभ्रष्टोऽभिजायते ॥२३॥ ततोऽनेन सह प्रीत्या महामैत्रीसमुत्थया। मेरुं नन्दीश्वरं वाऽपि सुखं यास्यामि शोभया ॥२४॥ विमानशिखरारूढौ विभूत्या परयाऽन्वितौ । भन्योन्यं वेदयिष्यावो दुःखानि च सुखानि च ॥२५॥ सौमित्रिमधरप्राप्तमानेतुं प्रतिबुद्धताम् । सह तेनागमिष्यामि रामेणाक्लिष्टकर्मणा ॥२६॥ इदमन्यव सन्नित्य सीतादेवः स्वयंप्रभः। सौधर्मकल्पमन्येन समागादारुणाच्युतात् ॥२७॥ अथानन्तर जिसने अवधिज्ञान रूपी नेत्रका प्रयोग किया था तथा जो अत्यधिक स्नेहसे युक्त था ऐसे सीताके पूर्व जीव अच्युत स्वर्गके प्रतीन्द्रने उन्हें देखा ॥१३॥ उसी समय उसने अपने पूर्व भव तथा जिन शासनके महोत्तम माहात्म्यको क्रमसे स्मरण किया ॥१४॥ स्मरण करते हो उसे ध्यान आ गया कि ये संसारके आभूषण स्वरूप वे राजा राम हैं जो मनुष्य लोकमें जब मैं सीता थी तब मेरे पति थे ॥१५॥ वह प्रतीन्द्र विचार करने लगा कि अहो कोको विचित्रतासे होनेवाली मनकी विविध चेष्टाको देखो जो पहले अन्य प्रकारकी इच्छा थी और अब अन्य प्रकारकी इच्छा हो रही है ॥१६।। अहो! कार्योंकी शुभ अशुभ कर्मों में जो पृथक् पृथक् प्रवृत्ति है उसे देखो । लोगोंका जन्म विचित्र है जो कि यह साक्षात् ही दिखाई देता है ॥१७॥ ये बलभद्र और नारायण जगत्को आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले थे पर अपने-अपने योग्य कर्मों के प्रभावसे ऊर्ध्व तथा अधःस्थान प्राप्त करनेवाले हुए अर्थात् एक लोकके ऊर्ध्व भागमें विराजमान होंगे और एक अधोलोकमें उत्पन्न हुआ ॥१८॥ इनमें एक बड़ा तो क्षीण संसारी तथा चरम शरीरी है और दूसरा छोटा-लक्ष्मण, पूर्ण संसारी नरकमें दुःखी हो रहा है ॥१६॥ दिव्य तथा मनुष्य सम्बन्धी भोगोंसे जिसकी आत्मा तृप्त नहीं हुई ऐसा लक्ष्मण पापकर अभिमानके कारण नरकमें दुःखी हो रहा है ॥२०॥ यह कमललोचन श्रीमान् बलभद्र, लक्ष्मणके वियोगसे जिनेन्द्र भगवान्की शरणमें आया है ॥२१॥ यह सुन्दर, पहले हलरत्नसे बाह्य शत्रुओंको पराजित कर अब ध्यानकी शक्तिसे इन्द्रियोंको जीतनेके लिए उद्यत हुआ है ॥२२॥ इस समय यह क्षपक श्रेणीमें आरूढ़ है इसलिए मैं ऐसा काम करता हूँ कि जिससे यह मेरा मित्र ध्यानसे भ्रष्ट हो जाय ॥२३॥ [ और मोक्ष न जाकर स्वर्गमें ही उत्पन्न हो ] तब महामित्रतासे उत्पन्न प्रीतिके कारण इसके साथ सुखपूर्वक मेरुपर्वत और नन्दीश्वर द्वीपको जाऊँगा उस समयकी शोभा ही निराली होगी। विमानके शिखरपर आरूढ़ तथा परम विभूतिके सहित हम दोनों एक दूसरेके लिए अपने दुःख और सुख बतलावेंगे ॥२४-२५॥ फिर अधोलोकमें पहुँचे हुए लक्ष्मणको प्रतिबुद्धता प्राप्त करानेके लिए शुभकार्यके करनेवाले उन्हीं रामके साथ जाऊँगा ॥२६|| यह तथा इसी Jain Education internatio... प्रत्युक्का-म०। २. सौमित्रिमथ सम्प्राप्त-म०। For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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