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________________ १०२ पद्मपुराणे प्रणम्य स्थीयतामत्र भगवनिति शब्दवान् । संशोध्य भूतलं चक्रे कमलादिभिरर्चितम् ॥११॥ सुगन्धिजलसम्पूर्ण पात्रमुद्धृत्य भामिनी । देवी वारि ददौ राजा पादावशालयन्मुनेः ॥१५॥ शुचिश्चामोदसर्वाङ्गस्ततो राजा महादरः । रेयादिकमाहारं सदन्धरसदर्शनम् ॥१६॥ हेमपात्रगतं कृत्वा श्रद्धया परयान्वितः । श्राद्धं स्म परिवेवेष्टि पारे परममुत्तमे ॥१७॥ ततोऽहं दीयमानं तवृद्धिमेत्यभिभाजनम् । सुदानकारणादामनोरथगुणोपमम् ॥१८॥ तुष्टयादिभिगुणयुक्तं ज्ञात्वा दातारमुत्तमम् । प्रहृष्टमनसो देवा विहायस्यभ्यनन्दयन् ॥१६॥ अनुकूलो ववौ वायुः पञ्चवर्णा सुसौरभाम् । पुष्पवृष्टिममुश्चन्त प्रमथाः प्रमदान्विताः ॥२०॥ चित्रश्रोत्रहरो जज्ञे पुष्करे दुन्दुभिस्वनः । अप्सरोगणसङ्गीतप्रवरध्वनिसङ्गतः ॥२१॥ तुष्टाः कन्दर्पणो देवाः कृतानेकविधस्वनाः । चकार बहुलं व्योम्नि ननृतुश्च समाकुलम् ॥२२॥ अहो दानमहो दानमहो पात्रमहो विधिः । अहो देयमहो दाता साधु साधु परं कृतम् ॥२३॥ वर्द्धस्व जय नन्देतिप्रभृतिः परमाकुलः । विहायोमण्डपब्यापी निःस्वनस्पैदशोऽभवत् ॥२४॥ नानारत्नसुवर्णादिपरमद्रविणास्मिका । पपात वसुधारा च द्योतयन्ती दिशो दश ॥२५॥ पूजामवाप्य देवेभ्यो सुनेर्देशव्रतानि च । विशुद्धदर्शनो राजा पृथिव्यामाप गौरवम् ॥२६।। एवं सुदान विनियोज्य पात्रे भक्तिप्रणम्रो नृपतिः सजानिः । वहनितान्तं परमं प्रमोदं मनुष्यजन्माऽऽप्तफलं विवेद ॥२७॥ खड़ा होगया ॥१३॥ उसने प्रणाम कर कहा कि हे भगवन् ! खड़े रहिए, तदनन्तर पृथिवीतलको शुद्ध कर उसे कमल आदिसे पूजित किया ॥१४॥ रानीने सुगन्धित जलसे भरा पात्र उठाकर जल दिया और राजाने मुनिके पैर धोये ॥१५॥ तदनन्तर जिसका समस्त शरीर हर्षसे युक्त था ऐसे उज्ज्वल राजाने बड़े आदरके साथ उत्तम गन्ध रस और रूपसे युक्त खीर आदि आहार सुवर्ण पात्रमें रक्खा और उसके बाद उत्कृष्ट श्रद्धा सहित हो वह उत्तम आहार उत्तम पात्र अर्थात् मुनिराजको समर्पित किया ॥१६-१७।। तदनन्तर जिस प्रकार दयालु मनुष्यका दान देनेका मनोरथ बढ़ता जाता है उसी प्रकार मुनिके लिए दिया जाने वाला अन्न उत्तम दानके कारण बर्तनमें वृद्धिको प्राप्त होगया था। भावार्थ-श्री राम मुनि अक्षीणऋद्धिके धारक थे इसलिए उन्हें जो अन्न दिया गया था वह अपने बर्तन में अक्षीण हो गया था ॥१८।। दाताको श्रद्धा तुष्टि भक्ति आदि गुणोंसे युक्त उत्तम दाता जानकर देवोंने प्रसन्नचित्त हो आकाशमें उसका अभिनन्दन किया अर्थात पञ्चाश्चर्य किये ॥१६॥ अनुकूल-शीतल मन्द सुगन्धित वायु चली, देवोंने हर्षित हो पाँच वर्णकी सुगन्धित पुष्पवृष्टि की, आकाश में कानोंको हरने वाला नाना प्रकारका दुन्दुभि नाद हुआ, अप्सराओंके संगीतकी उत्तम ध्वनि उस दुन्दुभिनादके साथ मिली हुई थी, संतोषसे युक्त कन्दर्प जातिके देवाने अनेक प्रकारके शब्द किये तथा आकाशमें नानारस पूर्ण अनेक प्रकारका नृत्य किया ।।२०-२२॥ अहो दान, अहो पात्र, अहो विधि, अहो देव, अहो दाता तथा धन्य धन्य आदि शब्द आकाशमें किये गये ।।२३।। बढ़ते रहो, जय हो, तथा समृद्धिमान होओ आदि देवोंके विशाल शब्द आकाश-रूपी मण्डपमें व्याप्त होगये ॥२४॥ इनके सिवाय नाना प्रकारके रत्न तथा सुवर्णादि उत्तम द्रव्योंसे युक्त धनकी वृष्टि दशों दिशाओंको प्रकाशित करती हई पडी ॥२॥ विशद सम्यग्दर्शनका धारक रा प्रतिनन्दी देवोंसे पूजा तथा मुनिसे देशव्रत प्राप्त कर पृथिवीमें गौरवको प्राप्त हुआ ॥२६॥ इस प्रकार भक्तिसे नम्रीमूत भार्या सहित राजाने सुपात्रके लिए दान देकर अत्यधिक हर्षका १. अाकाशे । २. जायासहितः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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