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________________ अष्टादशोत्तरशतं पर्व दध्यावुहिग्नचित्तः स कृतावधिनियोजनः । अहोऽमी 'प्रतिबोधाब्याः संवृत्ताः परमर्षयः ॥६६॥ दोषांस्तदास्मिन्दासित्वा साधूनां विमलात्मनाम् । महादुःखं परिप्राप्तं तिर्यक्षु नरकेषु च ॥७॥ यस्यानुबन्धमद्यापि सहे शत्रोर्दुरात्मनः । येन स्तोकेन न भ्रान्तः पुनर्दीघं भवार्णवम् ॥७॥ इति सञ्चित्य शान्तात्मा स्वं निवेद्य यथाविधि । प्रणम्य भक्तिसम्पमाः सुधीः साधूनमर्षयत् ॥७२॥ तथा कृत्वा च साकेतामगाद् यत्र विमोहितः । भ्रातृशोकेन काकुत्स्थः शिशुवत्परिचेष्टते ॥७३॥ आकल्पान्तरमापनं सिञ्चन्तं शुष्कपादपम् । पद्मनाभप्रबोधार्थ कृतान्तं वीच्य सादरम् ॥७४।। जटायुः शीरमासाथ गोकलेवरयुग्मके । बीजं शिलातले वस्तुमुद्यतः प्राजनं दधत् ।।५।। "कृपीटपूरितां कुम्भी कृतान्तस्तरपुरोऽमथत् । जटायुश्चक्रमारोप्य सिकतां पयपीडयत् ।।७६॥ अन्यानि चार्थहीनानि कार्याणि त्रिदशाविमौ । चक्रतुः स ततो गत्वा पप्रच्छति क्रमान्वितम् ॥७७॥ परेते सिञ्चसे मूढ कस्मादेनमनोकहम् । कलेवरे हलं प्राणि बीजं हारयसे कुतः ॥७॥ नीरनिर्मथने लब्धिनवनीतस्य किं कृता । बालुकापीडनाबाल स्नेहः सजायतेऽथ किम् ॥७॥ केवलं श्रम एवात्र फलं नाण्वपि काक्षितम् । लभ्यते किमिदं व्यर्थ समारब्धं विचेष्टितम् ॥८॥ उचतुस्तौ क्रमेणेतं पृच्छावश्वापि सत्यतः । जीवेन रहितामेतां तनु वहसि किं वृथा ॥८ जीव देव, विद्युत्प्रहार नामक शस्त्र लेकर उन सबको दक्षिणकी ओर खदेड़ रहा था सो उन सब राजाओंको नग्न तथा क्रोधरहित देख उसने अपना विद्युत्प्रहार नामक शस्त्र संकुचित कर लिया ॥६८।। उद्विग्न चित्तका धारी वह देव अवधिज्ञानका प्रयोगकर विचार करने लगा कि अहो! ये सब तो प्रतिबोधको प्राप्त हो परम ऋषि हो गये हैं ॥६|| उस समय (राजा दण्डककी पर्यायमें ) मैंने निर्दोष आत्माके धारी साधुओंको दोष दिया था-घानीमें पिलवाया था सो उसके फल स्वरूप तिर्यञ्चों और नरकोंमें मैंने बहुत भारी दुःख उठाया है। तथा अब भी उसी दुष्ट शत्रुका संस्कार भोग रहा हूँ परन्तु वह संस्कार इतना थोड़ा रह गया है कि उसके निमित्तसे पुनः दीर्घ संसारमें भ्रमण नहीं करना पड़ेगा ॥७०-७१॥ ऐसा विचारकर उस बुद्धिमान्ने शान्त हो अपने आपका परिचय दिया और भक्तिपूर्वक प्रणामकर उन मुनियोंसे क्षमा माँगी ॥७२॥ तदनन्तर इतना सब कर, वह अयोध्यामें वहाँ पहुँचा जहाँ भाईके शोकसे मोहित हो राम बालकके समान चेष्टा कर रहे थे ॥७३॥ वहाँ उसने बड़े ओदरसे देखा कि कृतान्तवक्त्रका जीव रामको समझानेके लिए वेष बदलकर एक सूखे वृक्षको सींच रहा है ॥७४।। यह देख जटायुका जीव भी दो मृतक बैलोंके शरीरपर हल रखकर परेना हाथमें लिये शिलातलपर बीज बोनेका उद्यम करने लगा ॥७५।। कुछ समय बाद कृतान्तवक्त्रका जीव रामके आगे जलसे भरी मटकीको मथने लगा और जटायुका जीव घानीमें बालू डाल पेलने लगा ॥७६।। इस प्रकार इन्हें आदि लेकर और भी दूसरे-दूसरे निरर्थक कार्य इन दोनों देवोंने रामके आगे किये । तदनन्तर रामने यथाक्रमसे उनके पास जाकर पूछा कि अरे मूर्ख ! इस मृत वृक्षको क्यों सींच रहा है ? मृतक कलेवरपर हल क्यों रक्खे हुए हैं ?, पत्थरपर बीज क्यों बरबाद करता है ? पानीके मथनेमें मक्खनकी प्राप्ति कैसे होगी ? और रे बालक ! बालूके पेलनेसे क्या कहीं तेल उत्पन्न होता है ? इन सब कार्यों में केवल परिश्रम ही हाथ रहता है इच्छित फल तो परमाणु बराबर भी नहीं मिलता फिर यह व्यर्थकी चेष्टा क्यों प्रारम्भ कर रक्खी है॥७७-८०॥ तदनन्तर क्रमसे उन दोनों देवोंने कहा कि हम भी एक यथार्थ बात आपसे पूछते हैं १. प्रीतिरोधाढयाः म०। २. दापित्वा म० । ३. मोह-म० । ४. 'प्राजनं तोदनं तोन्त्रम्' इत्यमरः । ५. कृमीढ म०। ६. कलेवरं म०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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