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________________ एकादशोत्तरशतं पर्व गणी वीरजिनेन्द्रस्य प्रथमः प्रथमः सताम् । अवेदयन्मनोयातं प्रभामण्डलचेष्टितम् ॥१॥ 'विद्याधरमहाकान्तकामिनीवीरुदुद्भवे । सौख्यपुष्पासवे सक्तः प्रभामण्डलषट्पदः ॥२॥ अचिन्तयदहं दीक्षां यापैग्यपवाससाम् । तदैतदङ्गनापद्मखण्ड "पद्मत्यसंशयम् ॥३॥ एतासां मत्समासक्तचेतसां विरहे मम | वियोगो भविताऽवश्यं प्राणः सुखमपालितैः ॥४॥ दुस्त्यजानि दुरापानि कामसौख्यान्यवारितम् । भुक्त्वा श्रेयस्करं पश्चात् करिष्यामि ततः परम् ॥५॥ भोगैरूपार्जितं पापमत्यन्तमपि पुष्कलम् । सुध्यानवह्निनाऽवश्यं धच्यामि क्षणमात्रतः ॥६॥ अत्र सेना समावेश्य विमानक्रीडनं भजे । उद्वासयामि शत्रणां नगराणि समन्ततः ॥७॥ मानशृङ्गोमतेभङ्ग' करोमि रिपुखडिगनाम् । स्थापयाम्युभयश्रेण्योवंशे शासनकारिते ॥८॥ मेरोर्मरकतादीनां रत्नानां विमलेवलम् । शिलातलेषु रम्येषु क्रीडामि ललनान्वितः ॥६॥ एवमादीनि वस्तूनि ध्यायतस्तस्य जानकेः । समतीयुर्मुहर्तानि संवत्सरशतान्यलम् ॥१०॥ कृतमेतत्करोमीदं कटिष्यामीदमित्यसौ । चिन्तयमात्मनोऽवेदी चायुः संहारमागतम् ॥११॥ अन्यदा सप्तमस्कन्धं प्रासादस्याधितिष्ठतः । अपप्तदशनिमूनि तस्य कालं ततो गतः ॥१२॥ अशेषतो निजं वेत्ति जन्मान्तरविचेष्टितम् । दीर्घसूत्रस्तथाऽऽप्यात्मसमुद्धारे स नो स्थितः ॥१३॥ अथानन्तर वीर जिनेन्द्र के प्रथम गणधर सज्जनोत्तम श्री गौतमस्वामी मनमें आये हुए भामण्डलका चरित्र कहने लगे ॥१॥ विद्याधरोंकी अन्यन्त सुन्दर स्त्री रूपी लताओंसे उत्पन्न सुख रूपी फूलोंके आसवमें आसक्त भामण्डल रूपी भ्रमर इस प्रकार विचार करता रहता था कि यदि मैं दिगम्बर मुनियोंकी दीक्षा धारण करता हूँ तो यह स्त्रीरूपी कमलोंका समूह निःसन्देह कमलके समान आचरण करता है अर्थात् कमलके ही समान कोमल है ॥२-३।। जिनका चित्त मुझमें लग रहा है ऐसी ये स्त्रियाँ मेरे विरहमें अपने प्राणोंका सुखसे पालन नहीं कर सकेंगी अतः उनका वियोग अवश्य हो जायगा ॥४॥ अतएव जिनका छोड़ना तथा पाना दोनों ही कठिन हैं ऐसे इन काम सम्बन्धी सुखोंको पहले अच्छी तरह भोग लू बादमें कल्याणकारी कार्य करूँ ॥५॥ यद्यपि भोगोंके द्वारा उपार्जित किया हुआ पाप अत्यन्त पुष्कल होगा तथापि उसे सुध्यान रूपी अग्निके द्वारा एक क्षणमें जला डालूँगा ॥६॥ यहाँ सेना ठहराकर विमानोंसे क्रीड़ा करूँ और सब ओर शत्रुओंके नगर उजाड़ कर दूं ॥७॥ दोनों श्रेणियों में शत्रु रूपी गेंडा हाथियों के मान रूपी शिखरकी जो उन्नति हो रही है उसका भंग करूँ तथा उन्हें आज्ञाके द्वारा किये हुए अपने वशमें स्थापित करूँ।।८॥ और मेरु पर्वतके मरकत आदि मणियोंके निर्भल एवं मनोहर शिलातलोंपर स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा करूँ ॥६॥ इत्यादि वस्तुओंका विचार करते हुए उस भामण्डलके सैकड़ों वर्ष एक मुहूर्तके समान व्यतीत हो गये ॥१०॥ 'यह कर चुका, यह करता हूँ और यह करूंगा' वह यही विचार करता रहता था , पर अपनी आयुका अन्तिम अवसर आ चुका है यह नहीं विचारता था ॥११॥ एक दिन वह महलके सातवें खण्डमें बैठा था कि उसके मस्तक पर वज्र गिरा जिससे वह मृत्युको प्राप्त हो गया ॥१२।। यद्यपि वह अपने जन्मान्तरकी समस्त चेष्टाको जानता था ३. विद्याधरी -म०। ४. प्रेमखण्डं म०। ५. पद्ममिवाचरति । १. आद्यः । २ श्रेष्ठः। ६. जनकापत्यस्य भामण्डलस्य । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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