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________________ पद्मपुराणे अथ वैभीषणिक्यं ख्यातो नाम्ना सुभूषणः । जगाद धैर्यसम्पमं निर्धान्तं मारुतायनम् ॥२६॥ भयासहं समुत्सृज्य क्षिप्रं लकां प्रविश्य ताम् । लोलयामि त्विमान् सर्वान् परित्यज्य कुलाङ्गमाः ॥३०॥ वचनं तस्य सम्पूज्य ते विद्याधरदारकाः । महाशौर्यसमुन्नद्धा दुर्दान्ताः कलहप्रियाः ॥३१॥ भाशीविषसमाश्चण्डा उद्धृताश्चपलाश्चलाः । भोगदुर्ललिता नानासङ्ग्रामोद्भूतकीतयः ॥३२॥ असमाना इवाशेषां नगरी तां समास्तृणन् । महासैन्यसमायुक्ताः शस्त्ररश्मिविराजिताः ॥३३॥ सिंहभादिरवोन्मिश्रभेरीदुन्दुभिनिस्वनम् ॥ श्रुत्वातिभीषणं लङ्का परमं कम्पमागता ॥३४॥ सहसा चकितवस्ता विलोलनयनाः स्त्रियः । स्वनद्गलदलङ्काराः प्रियाणामङ्कमाश्रिताः ॥३५॥ विद्याभृन्मिथुनान्युच्चैर्विह्वलानि नभोऽङ्गणे । बभ्रमुश्चक्रवद्रान्त्या चलद्वासांसि सस्वनम् ॥३६॥ भवने राक्षसेन्द्रस्य महारत्नांशुभासुरे । स्वनन्मङ्गलगम्भीरवीरतूर्यमृदङ्गके ॥३७॥ भव्युच्छिन्नसुसङ्गीतनृत्यनिष्णातयोषिति । जिनपूजासमुद्युक्तकन्याजनसमाकुले ॥३८॥ विलासैः परमस्त्रीणामप्युन्मादितमन्मथे । क्रूरतूर्यस्वनं श्रुत्वा क्षुब्धेऽन्तःपुरसागरे ।।३।। उद्ययौ निःस्वनो रम्यो भूषणस्वनसङ्गतः । समन्तादाकुलो मन्द्रो वल्लकीनामिवायतः ॥४०॥ विह्वलाऽचिन्तयत् काचित् कष्ट किमिदमागतम् । मतव्यमद्य किं करे कृते कर्मणि शत्रुभिः ॥४॥ भन्या दध्यौ भवेत्पापैः किं नु बन्दिग्रहो मम । किंवा विवसनीभूता क्षिप्ये लवणसागरे ॥४२॥ एवमाकुलता प्राप्त समस्ते नगरीजने। विह्वलेषु प्रवृत्तेषु निःस्वनेषु समन्ततः ॥४३।। तदनन्तर सुभूषण नामसे प्रसिद्ध विभीषणके पुत्रने, धैर्यशाली, भ्रान्तिरहित वातायनसे इस प्रकार कहा कि ॥२धा भय छोड़ शीघ्र ही लङ्कामें प्रवेश कर कुलाङ्गनाओंको छोड़ इस समस्त लोगोंको अभी हिलाता हूँ ॥३०॥ उसके वचन सुन विद्याधरोंके कुमार समस्त नगरीको असते हुए के समान सर्वत्र छा गये। वे कुमार महाशुरबीरतासे अत्यन्त उद्दण्ड थे, कठिनतासे वशमें करने योग्य थे, कलह-प्रिय थे, आशीविष-सपके समान थे, अत्यन्त क्रोधी थे, गर्वीले थे, बिजलीके समान चश्चल थे, भोगोंसे लालित हुए थे, अनेक संग्रामोंमें कीर्तिको उपार्जित करनेवाले थे, बहुत भारी सेनासे युक्त थे तथा शस्त्रोंकी किरणोंसे सुशोभित थे ॥३१-३३।। सिंह तथा हाथी आदिके शब्दोंसे मिश्रित भेरी एवं दुन्दुभी आदिके अत्यन्त भयङ्कर शब्दको सुन लङ्का परम कम्पनको प्राप्त हुई-सारी लङ्का काँप उठी ॥३४॥ जो आश्चर्यचकित हो भयभीत हो गई थी, जिनके नेत्र अत्यन्त चञ्चल थे और जिनके आभूषण गिर-गिरकर शब्द कर रहे थे ऐसी स्त्रियाँ सहसा पतियोंकी गोद में जा छिपी ॥३५॥ जो अत्यन्त विह्वल थे तथा जिनके वस्त्र वायुसे इधर-उधर उड़ रहे थे ऐसे विद्याधराके युगल आकाशमें बहुत ऊंचाई पर शब्द करते हुए चक्राकार भ्रमण करने लगे ॥३६॥ रावणका जो भवन महारत्नोंकी किरणोंसे देदीप्यमान था, जिसमें मङ्गलमय तुरही तथा मृदङ्गोंका गम्भीर शब्द हो रहा था, जिसमें रहनेवाली स्त्रियाँ अविरल उत्तम संगीत तथा नृत्यमें निपुण थीं, जो जिनपूजामें तत्सर कन्याजनोंसे व्याप्त थी और जिसमें उत्तम स्त्रियों के विलासोंसे भी काम उन्मादको प्राप्त नहीं हो रहा था ऐसे राबणके भवनमें जो अन्तःपुररूपी सागर विद्यमान था वह तुरहीके कठोर शब्दको सुन क्षोभको प्राप्त हो गया ॥३७-३।। सब ओरसे आकुलतासे भरा भूषणोंके शब्दसे मिश्रित ऐसा मनोहर एवं गम्भीर शब्द उठा जो मानो वीणाका ही विशाल शब्द था ॥४०॥ कोई स्त्री विह्वल होती हुई विचार करने लगी कि हाय हाय पह क्या कष्ट आ पड़ा। शत्रुओंके द्वारा किये हुए इस करतापूर्ण कार्यमें क्या आज मरना पड़ेगा ? ॥४१॥ कोई स्त्री सोचने लगी कि न जाने मुझे पापी लोग बन्दीगृहमें डालते हैं या वस्त्ररहित कर लवणसमुद्रमें फेंकते हैं ॥४२॥ इस प्रकार जब नगरीके समस्त लोग आकुलताको १. चपलाश्चलाः म० । २. पापः म०, ज०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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