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________________ २५४ पद्मपुराणे अहो सोऽसौ पिताऽस्माकं सुधन्वा लोकपुङ्गवः । श्रीमान् विशालसत्कीर्तिः कृतानेकमहाद्भुतः ॥७७॥ विषादं मा गमः मातर्बने २त्यक्ताहमित्यतः । भग्नां मानोन्नतिं पश्य रामलचर ॥७८॥ सीताध्यवीदलमलं विरोधु गुरुणा सुतौ। न वर्तत इदं कतु बजतां सौम्यचित्तताम् ।।७।। महाधिनययोगेन समागत्य कृतानती। पितरं पश्यतं वत्सौ मार्गोऽयं नयसङ्गतः ॥८॥ उचतुस्तौ रिपुस्थानप्राप्तं मातः कथं नु तम् । ब्रवो गत्वा वचः क्लोबमावा ते तनयाविति ॥८॥ वरं मरणमावाभ्यां प्राप्त सङग्राममूर्द्धनि । न तु भावितमीहक्ष प्रवीरजननिन्दितम् ॥२॥ स्थितायामथ वैदेयां जोषं चिन्तार्तचेतसि । अभिषेकादिकं कृत्यं भेजाते लवणाङ्कुशौ ॥३॥ श्रितमालसङ्घौ च कृतसिद्धनमस्कृती। प्रसान्रव्य मातरं किञ्चित् प्रणम्य च मुमङ्गली ॥४॥ भारूढौ द्विरदौ चन्द्रसूयौँ वा नगमस्तकम् । प्रस्थितावभिसाकेतं लङ्का वा रामलक्ष्मणौ ॥५॥ ततः सन्नाहशब्देन ज्ञात्वा निर्गमनं तयोः । क्षिप्रं योधसहस्राणि निर्जग्मुः पौण्डरीकतः ॥८६॥ परस्परप्रतिस्प समुत्कर्षितचेतसाम् । सैन्यं दर्शयतां राज्ञां संघट्टः परमोऽभवत् ॥७॥ स्वैरं योजनमात्र ती महाकटकसङ्गतौ । पालयन्तौ महीं सम्यङ्नाशस्योपशोभिताम् ॥८॥ अग्रतः महतोदारप्रतापी परमेश्वरौ। प्रयातौ विषयन्यस्तैः पूज्यमानौ नरेश्वरैः ॥८६॥ महाकुठारहस्तानां तथा कुद्दालधारिणाम् । पुंसां दशसहस्राणि संप्रयांति तदग्रतः ॥१०॥ छिन्दन्तः पादपादीस्ते जनयन्ति समन्ततः । उच्चावचनिनिर्मुक्कां महीं दर्पणसन्निभाम् ॥६॥ धारक तथा अनेक महान आश्चर्यके करनेवाले श्री राम हमारे पिता हैं ॥७६-७७॥ हे मातः ! 'मैं वनमें छोड़ी गई हूँ' इस बातका विषाद मत करो। तुम शीघ्र ही राम-लक्ष्मणका अहंकार खण्डित देखो ॥७॥ तब सीताने कहा कि हे पुत्रो ! पिताके साथ विरोध करना रहने दो । यह करना उचित नहीं है। तुम लोग शान्तचित्तताको प्राप्त करो ॥७६।। हे वत्सो ! बड़ी विनयके साथ जाओ और नमस्कार कर पिताके दर्शन करो यही मार्ग न्यायसंगत है ।।८०॥ यह सुन लवणाङ्कशने कहा कि वे हमारे शत्रुके स्थानको प्राप्त हैं अतः हे मातः ! हम लोग जाकर यह दीन वचन उनसे किस प्रकार कहें कि हम तुम्हारे लड़के हैं ॥८१।। संग्रामके अग्रभाग में यदि हम लोगोंको मरण प्राप्त होता है तो अच्छा है परन्तु वीर मनुष्योंके द्वारा निन्दित ऐसा विचार रखना अच्छा नहीं है ॥५२॥ अथानन्तर जिसका चित्त चिन्तासे दुःखी हो रहा था ऐसी सीता चुप हो रही और लवणांकुशने स्नान आदि कार्य सम्पन्न किये ॥३॥ तत्पश्चात जिन्होंने मङ्गलमय मुनिसंघकी सेवा की थी, सिद्ध भगवान्को नमस्कार किया था तथा माताको सान्त्वना देकर प्रणाम किया था ऐसे मङ्गलमय वेषको धारण करनेवाले दोनों कुमार दो हाथियों पर उस प्रकार आरूढ़ हुए जिस प्रकार कि चन्द्रमा और सूर्य पर्वतके शिखर पर आरूढ़ होते हैं । तदनन्तर दोनोंने अयोध्याकी ओर उस तरह प्रयाण किया जिस तरह कि राम-लक्ष्मणने लङ्काकी ओर किया था ॥८४-८५।। तत्पश्चात् तैयारीके शब्दसे उन दोनोंका निर्गमन जानकर हजारों योधा शीघ्र ही पौण्डरीकपुरसे बाहर निकल पड़े ॥८६॥ परस्परको प्रतिस्पर्धासे जिनका चित्त बढ़ रहा था ऐसे अपनी-अपनी सेनाएँ दिखलानेवाले राजाओंमें बड़ी धकम-धक्का हो रही थी ॥८॥ तदनन्तर जो एक योजन तक फैली हुई बड़ी भारी सेनासे सहित थे जो नाना प्रकारके धान्यसे सुशोभित पृथिवीका अच्छी तरह पालत करते थे, जिनका उत्कृष्ट प्रताप आगेआगे चल रहा था और जो उन-उन देशोंमें स्थापित राजाओंके द्वारा पूजा प्राप्त कर रहे थे, ऐसे दोनों भाई प्रजाकी रक्षा करते हुए चले जा रहे थे ॥८८-८६॥ बड़े-बड़े कुल्हाड़े और कदालें धारण करनेवाले दश हजार पुरुष उनके आगे-आगे चलते थे ॥१०|| वे वृक्षों आदिको १. सुधन्वी म० । २. त्यक्त्वाह-म० । ३. पश्यत म० । ४. प्रशान्त्य म०। ५. नाशस्योप -म० । For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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