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________________ द्वयुत्तरशतं पर्व एवं तो परमैश्वर्य प्राप्तावुत्तममानवौ । स्थितावाज्ञां प्रयच्छन्तावुन्नतानां महीभृताम् ॥१॥ तदा कृतान्तवक्त्रं तु नारदः परिपृष्ठवान् । जानकीत्यजनोद्देशं दुःखी भ्राम्यन् गवेषकः ॥२॥ दर्शनेऽवस्थितौ वीरौ प्राप ताभ्यां च पूजितः । आसनादिप्रदानेन गृहस्थमुनिवेषभृत् ॥३॥ ततः सुखं समासीनः परमं तोषमुद्वहन् । अब्रवीत्ताववद्वारः कृतस्निग्धनिरीक्षणः ॥४॥ रामलचमणयोलक्ष्मीर्याशी नरनाथयोः । तादृशी सर्वथा भयादचिराद्भवतोरपि ॥५॥ ततस्तावूचतुः कौ तौ भगवन् रामलचमणौ । कीदृग्गुणसमाचारौ कस्य वा कुलसम्भवौ ॥६॥ ततो जगाववद्वारः कृत्वा विस्मितमाननम् । स्थिरमूर्तिः क्षणं स्थित्वा भ्रमयन् करपल्लवम् ॥७॥ भुजाभ्यामुत्क्षिपेन्मेरुं प्रतरनिम्नगापतिम् । नरो न तद्गुणान् वक्तुं समर्थः कश्चिदेतयोः ॥८॥ अनन्तेनाऽपि कालेन वदनैरन्तवर्जितैः । सकलोऽपि न लोकोऽयं तयोर्वक्तुं गुणान् क्षमः ॥६॥ इदं तद्गुणसम्प्रश्नप्रतीकार समाकुलम् । हृदयं कम्पमानं मे पश्यतां जातकौतुकौ ॥१०॥ तथापि भवतोर्वाक्यात् स्थूलोञ्चयसमाश्रयात् । वदामि तद्गुणं किञ्चिच्छणुतं पुण्यवर्द्धनम् ॥११॥ अस्तीचवाकुकुलव्योमसकलामलचन्द्रमाः । नाम्ना दशरथो राजा दुवृत्तेन्धनपावकः ॥१२॥ अधितिष्ठन् महातेजोमूर्तिरुत्तरकोसलम् । सवितेव प्रकाशत्वं धत्ते यः सर्वविष्टपे ॥१३॥ पुरुषाद्रीन्द्रतो यस्मानिःसृताः कीर्तिसिन्धवः । उदन्वत् सङ्गता वीध्रा हादयन्त्यखिलं जगत् ॥१४॥ तस्य राज्यमहाभारवहनक्षमचेष्टिताः । चत्वारौ गुणसम्पन्नास्तनया सुनया इव ॥१५॥ अथानन्तर परम ऐश्वर्यको प्राप्त हुए वे दोनों पुरुषोत्तम बड़े-बड़े राजाओंको आज्ञा प्रदान करते हुए स्थित थे।।१।। उसी समय कृतान्तवक्त्र सेनापतिसे सीताके छोड़नेका स्थान पूछकर उसकी खोज करनेवाले दुखी नारद भ्रमण करते हुए वहाँ पहुँचे । सो दोनों ही वीर उनकी दृष्टि में पड़े । गृहस्थमुनि अर्थात् दुल्लकका वेष धारण करनेवाले उन नारदजीका दोनों ही कुमारांने आसनादि देकर सम्मान किया।।२-३॥तदनन्तर सुखसे बैठे परम सन्तोषको धारण करते एवं स्नेहपूर्ण दृष्टिसे देखते हुए नारदने उन कुमारोंसे कहा कि राजा राम लक्ष्मणकी जैसी विभूति है सर्वथा वैसी ही विभूति शीघ्र ही आप दोनोंकी भी हो ॥४-५॥ इसके उत्तरमें उन्होंने कहा कि हे भगवन् ! वे राम लक्षण कौन हैं ? कैसे उनके गुण और समाचार हैं तथा किस कुलमें उत्पन्न हुए हैं ? ॥६॥ तदनन्तर क्षणभरके लिए निश्चल शरीर बैठकर मुखको आश्चर्यसे चकित करते एवं करपल्लवको हिलाते हुए नारद बोले ॥७॥ कि मनुष्य भुजाओंसे मेरुको उठा सकता है और समुद्रको तैर सकता है परन्तु इन दोनोंके गुण कहनेके लिए कोई समर्थ नहीं है ।।८।। यह सबका सब संसार, अनन्तकाल तक और अनन्त जिह्वाओं के द्वारा भी उनके गुण कहनेके लिए समर्थ नहीं है॥६॥ आपने उनके गुणोंका प्रश्न किया सो इनके उत्तर स्वरूप प्रतिकारसे आकुल हआ हमारा हृदय काँपने लगा है। आप कौतुकके साथ देखिये ॥१०॥ फिर भी आपलोगोंके कहनेसे स्थूलरूपमें उनके कुछ पुण्यवर्धक गुण कहता हूँ सो सुनो ॥११॥ इक्ष्वाकुवंशरूपी आकाशके पूर्णचन्द्रमा तथा दुराचाररूपी ईन्धनके लिए अग्निस्वरूप एक दशरथ नामके राजा थे ॥१२॥ जो महातेजस्वरूप थे । उत्तर कोसल देशपर शासन करते थे तथा सूर्य के समान समस्त संसार में प्रकाश करते थे ॥१३॥ जिस पुरुषरूपी पर्वतराजसे निकली और समुद्र में गिरी हुई कीर्तिरूपी उज्वल नदियाँ समस्त संसारको आनन्दित करती हैं ॥१४॥ राज्यका १.विस्मितमानसम्म ० । २. भ्रामयन् म०। ३२-३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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