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________________ एकाधिकशतं पर्व ३१७ प्रसाथ पृथिवीमेतामथ तो पुरुषोत्तमौ । नानाराजसहस्राणां महतामुपरि स्थितौ ॥८॥ रक्षन्तौ विषयान् सम्यक नानाचारुकथारतौ । पौण्डरीकपुरं () तेन प्रस्थितौ पुरुसम्मदौ ॥८६॥ राष्ट्रावधिकृतैः पूजां प्राप्यमाणौ च भूयसीम् । समीपीभावतां प्राप्तौ पुण्डरीकस्य पार्थिवैः ॥३०॥ ततः सप्तमभूपृष्ठं प्रासादस्य समाश्रिता । वृता परमनारीभिः सुखासनपरिग्रहा ॥११॥ तरलच्छातजीमूतपरिधूसरमुत्थितम् । रजःपटलमद्राक्षीदप्राक्षीच सखीजनम् ॥१२॥ किमिदं दृश्यते सख्यो दिगाक्रमणचञ्चलम् । ऊचुस्ता देवि सैन्यस्य रजश्चक्रमिदं भवेत् ॥१३॥ तथा हि पश्य मध्येऽस्य ज्ञायते स्वच्छवारिणः । अश्वीयं मकराणां वा प्लवमानकदम्बकम् ॥१४॥ नूनं स्वामिनि सिद्धार्थी कुमारावागताविमौ । तथा तिौ प्रहश्येते तावेव भुवनोत्तमौ ॥५॥ आसीदेवं कथा यावरसीतादेव्या मनोहरा । तावदनेसराः प्राप्ता नरा इष्टनिवेदिनः ।।६।। उपशोभा ततः पृथ्वी समस्ता नगरे कृता । लोकेनादरयुक्तेन बिभ्रता तोषमुत्तमम् ॥१७॥ प्राकारशिखरावल्पामुच्छ्रिता विमलध्वजाः । मार्गदेशाः कृता दिव्यतोरणासङ्गसुन्दराः ॥८॥ भागुल्फं पूरितो राजमार्गः पुष्पैः सुगन्धिभिः । चारुवन्दनमालाभिः शोभमानः पदे पदे ।।६।। स्थापिता द्वारदेशेषु कलशाः पल्लवाननाः । पट्टवस्त्रादिभिः शोभा कृता चापणवर्मनि ॥१०॥ विद्याधरैः कृतं देवैराहोस्वित्पनया स्वयम् । पौण्डरीकपुरं जातमयोध्यासमदर्शनम् ॥१०॥ रष्ट्वा सम्प्रविशन्तौ तौ महाविभवसङ्गतौ । आसीनगरनारीणां लोको दुःशक्यवर्णनः ॥१०॥ करते हुए पृथिवीमें भ्रमण करते थे ।।८।। इस प्रकर इस पृथिवीको प्रसन्न कर वे दोनों पुरुषोत्तम, अनेक हजार बड़े-बड़े राजाओंके ऊपर स्थित थे ।।८॥ नाना प्रकारकी सुन्दर कथाओंमें तत्पर तथा अत्यधिक षेको धारण करनेवाले वे दोनों कुमार देशोंकी अच्छी तरह रक्षा करते हुए पौण्डरीकपुरको ओर चले ॥८॥ राष्ट्रोंके प्रथम अधिकारी राजाओंके द्वारा अत्यधिक सन्मानको प्राप्त कराये गये दोनों भाई क्रम-क्रमसे पौण्डरीकपुरकी समीपताको प्राप्त हुए ॥६॥ तदनन्तर महलकी सातवीं भूमिपर सुखसे बैठी एवं उत्तम स्त्रियोंसे घिरी सीताने चञ्चल पतले मेघके समान धूसर वर्ण धूलिपटलको उठते देखा तथा सखीजनोंसे पूछा कि हे सखियो ! दिशाओंपर आक्रमण करनेमें चञ्चल अर्थात् सब ओर फैलनेवाली यह क्या वस्तु दिखाई देती है ? इसके उत्तरमें उन्होंने कहा कि यह सेनाका धूलिपटल होना चाहिये ॥६१-६३।। इसीलिए तो देखो स्वच्छ जलके समान इस धूलिपटलके बीच में मगरमच्छोंके तैरते हुए समूहके समान घोड़ोंका समूह दिखाई दे रहा है ॥६४॥ हे स्वामिनि ! जान पड़ता है कि ये दोनों कुमार कृतकृत्य होकर आये हैं, हाँ देखो, वे ही लोकोत्तम कुमार दिखाई दे रहे हैं ।।५।। इस तरह जब तक सीता देवीकी मनोहर कथा चल रही थी कि तब तक इष्ट समाचारको सूचना देनेवाले अग्रगामी पुरुष आ पहुँचे ॥६६॥ तदनन्तर उत्तम सन्तोषको धारण करनेवाले आदरयुक्त मनुष्यों ने नगरमें सब प्रकारकी विशाल शोभा की ॥१७॥ कोटके शिखरोंके ऊपर निर्मल ध्वजाएँ फहराई गई, मार्ग दिव्यतोरणोंसे सुन्दर किये गये ॥८॥ राजमार्ग घुटनों तक सुगन्धित फूलोंसे भरा गया एवं पद-पद पर सुन्दर वन्दनमालाओंसे युक्त किया गया ॥६६॥ द्वारों पर पल्लवोंसे युक्त कलश रक्खे गये और बाजारकी गलियों में रेशमी वस्त्रादिसे शोभा की गई ॥१००। उस समय पौण्डरीकपुर अयोध्याके समान दिखाई देता था, सो ऐसा जान पड़ता था मानो विद्याधरों .ने, देवोंने अथवा लक्ष्मीने ही स्वयं उसकी वैसी रचना की हो ॥१०१॥ महा वैभवके साथ प्रवेश करते हुए उन दोनों कुमारोंको देखकर नगरको स्त्रियोंमें जो चेष्टा हुई उसका वर्णन करना १. समस्तां नगरे म० । २. पदवस्त्रादिभिः म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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