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________________ २४५ एकाधिकशतं पर्व इत्युक्त विनिवृत्यासौ पृथुराह कृताञ्जलिः । अज्ञानजनितं दोषं वीरौ मे क्षन्तुमर्हथ ॥५॥ माहात्म्यं भवदीयं मे नाऽऽयात मतिगोचरम् । भास्करीयं यथा तेजः कुमुदप्रयोदरम् ॥५६॥ ईरगेव हि धीराणां कुलशीलनिवेदनम् । शस्यते न तु भारत्या तद्धि सन्देहसङ्गतम् ॥६०॥ अरण्यदाहशक्तस्य पावकस्य न को जनः । ज्वलनादेव सम्भूतिं मूढोऽपि प्रतिपद्यते ॥६॥ भवन्तौ परमो धीरौ महाकुलसमुद्भवौ । अस्माकं स्वामिनी प्राप्तौ यथेष्टसुखदायिनी ॥६२॥ एवं प्रशस्यमानौ तौ कुमारौ नतमस्तकौ । जातौ निर्वासिताशेषकोपौ शान्तमनोमुखौ ॥६॥ वज्रजप्रधानेषु ततः प्राप्तेषु राजसु । ससाक्षिकाऽभवत्प्रीतिः पृथुना सह वीरयोः ॥६॥ प्रणाममात्रतः प्रीता जायन्ते मानशालिनः । नोन्मूलयन्ति नद्योधा वेतसान् प्रणतात्मकान् ॥६५॥ ततस्तौ सुमहाभूत्या पृथुना पृथिवीपुरम् । प्रवेशितौ समस्तस्य जनस्यानन्दकारिणी ॥६६॥ मदनाक्यावीरस्यपृथुना परिकल्पिता । कन्या कनकमालाऽसी महाविभवसङ्गता ॥६७॥ भन्न नीत्वा निशामेकां करणीयविचक्षणी । निर्गतौ 'नगराज्जेतुं समस्तां पृथिवीमिमाम् ॥६८।। सुमाङ्गमगधैङ्गः पोदनेशादिभिस्तथा । वृतौ लोकाक्षनगरं गन्तुमेतो समुद्यतौ ।।६।। आक्रामन्ती सुखं तस्य सम्बद्धवान् विषयान् बहून् । अभ्यर्णत्वं परिप्राप्तौ तौ महासाधनान्वितौ ॥७॥ कुबेरकान्त मानं राजानं तत्र मानिनम् । समक्षोभयतां नाग पक्षाविव गरुन्मतः ॥७१॥ देते हैं, सावधान होकर खड़े हो जाओ अथवा बलात् खड़े किये जाते हो ॥५७।। इस प्रकार कहने पर पृथुने लौटकर तथा हाथ जोड़कर कहा कि हे वीरो! मेरा अज्ञात जनित दोष क्षमा करनेके योग्य हो ॥५८।। जिस प्रकार सूर्यका तेज कुमुद-समूहके मध्य नहीं आता उसी प्रकार आप लोगों का माहात्म्य मेरी बुद्धिमें नहीं आया ॥५६।। धीर, वीर मनुष्योंका अपने कुल, शीलका परिचय देना ऐसा ही होता है । वचनों द्वारा जो परिचय दिया जाता है वह ठीक नहीं है क्योंकि उसमें सन्देह हो सकता है ।।६०। ऐसा कौन मूढ़ मनुष्य है जो जलने मात्रसे, वनके जलाने में समर्थ अग्निकी उत्पत्तिको नहीं जान लेता है ? । भावार्थ-अग्नि प्रज्वलित होती है इतने मात्रसे ही उसकी वनदाहक शक्तिका अस्तित्व मूर्खसे मूर्ख व्यक्ति भी स्वीकृत कर लेता है ॥६१।। आप दोनों परम धीर, महाकुलमें उत्पन्न एवं यथेष्ट सुख देनेवाले हमारे स्वामी हो ॥६२॥ इस प्रकार जिनकी प्रशंसाकी जा रही थी ऐसे दोनों कुमार नतमस्तक, शान्तचित्त तथा शान्त मुख हो गये और उनका सब क्रोध दर हो गया ॥३३॥ तदनन्तर जब वज्रजंघ आदि प्रधान राजा आ गये तब उनकी साक्षी पूर्वक दोनों वीरोंकी पृथुके साथ मित्रता हो गई ।।६४|| आचार्य कहते हैं कि मानशाली मनुष्य प्रणाममात्रसे प्रसन्न हो जाते हैं, सो ठीक ही है क्योंकि नदियोंके प्रवाह नम्रीभूत वेतसके पौधोंको नहीं उखाड़ते ॥६५॥ तदनन्तर राजा पृथुने, सब लोगोंको आनन्द उत्पन्न करनेवाले दोनों वीरोंको बड़े वैभवके साथ नगरमें प्रविष्ट कराया ॥६६॥। वहाँ पृथुने महाविभवसे सहित अपनी कनकमाला कन्या वीर मदनाङ्कशके लिए देना निश्चित किया ॥६७।। तदनन्तर कार्य करने में निपुण दोनों वीर वहाँ एक रात्रि व्यतीतकर इस समस्त प्रथिवीको जीतने के लिए नगरसे बाहर निकल पड़े ॥६॥ सुह्म, अङ्ग, मगध, वङ्ग तथा पोदनपुर आदिके राजाओंसे घिरे हुए दोनों कुमार कोकाक्षनगरको जानेके लिए उद्यत हुए ॥६६॥ बहुत बड़ी सेनासे सहित दोनों वीर उससे सम्बन्ध रखनेवाले अनेक देशोंपर सुखसे आक्रमण करते हुए लोकाक्ष नगरके समीप पहुँचे ॥७०।। वहाँ जिस प्रकार गरुड़के पङ्ख नागको क्षोभित करते हैं उसी प्रकार उन दोनोंने वहाँ के कुबेरकान्त नामक अभि १. नगरी जेतुं म० । २. कृतौ म० । ३. मेतैः ज० । ४. समवक्षोभतां म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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