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________________ अष्टनवतितम पर्व यस्याष्टगुणमैश्वयं नानातिशयशोभितम् । अजस्रपरमाश्चर्य सुरासुरमनोहरम् ॥११॥ जीवप्रभृतितत्त्वानि विशुद्धानि प्रदयं यः । भव्यानां कृतकर्तव्यो निर्वाणं परमं गतः ॥१२॥ सर्वरत्नमयं दिव्यमालयं चक्रवर्तिना । निर्माप्य यस्य कैलासे प्रतिमा स्थापिता प्रभोः ॥६३॥ सा भास्करप्रतीकाशा पञ्चचापशतोच्छ्रिता । प्रतिमाप्रतिरूपस्य दिग्या यस्य विराजते ॥६॥ यस्याद्यापि महापूजा गन्धर्वामरकिन्नरैः । अप्सरोनागदैत्यायैः क्रियते यत्नतः सदा ॥६५॥ अनन्तः परमः सिद्धः शिवः सर्वगतोऽमलः । अहंलोक्यपूजाहः यः स्वयम्भूः स्वयंप्रभुः ॥६६॥ तं कदा नु प्रभुं गत्वा कैलासे परमाचले । ऋषभं देवमभ्यय॑ स्तोष्यामि सहितस्त्वया ॥६॥ प्रस्थितस्य मया साकमेवं धृत्याऽतितुङ्गया। प्राप्ता जनपरीवादवार्ता दावाग्निदुःसहा ॥६॥ चिन्तितं मे ततो भर्ना प्रेक्षापूर्वविधायिना । लोकः स्वभाववकोऽयं नान्यथा याति वश्यताम् ॥६॥ वरं प्रियजने त्यक्ते मृत्युरप्यनुसेवितः । यशसो नोपघातोऽयं कल्पान्तमवस्थितः ॥७॥ साहं जनपरीवादाद्विदुषा तेन बिभ्यता । संत्यक्ता परमेऽरण्ये दोषेण परिवर्जिता ॥७॥ विशुद्धकुलजातस्य क्षत्रियस्य सुचेतसः । विज्ञातसर्वशास्त्रस्य भवत्येवेदमीहितम् ॥७२॥ एवं निर्वाससम्बन्धं वृत्तान्तं स्वं निवेद्य सा । दीना रोदितुमारब्धा शोकज्वलनतापिता ॥७३॥ तामश्रुजलपूर्णास्यां तितिरेणुसमुच्छ्रिताम् । दृष्टा कुलिशजवोऽपि चुक्षोभोत्तमसत्वभृत् ॥७४॥ ततो जनकराजस्य तनयामधिगम्य ताम् । समीपीभूय राजाऽसौ समाश्वासयदाहतः ॥७५॥ के लिए मोक्षमार्गका उपदेश देनेवाले थे ॥६०॥ जिनका अष्ट प्रातिहार्य रूपी ऐश्वर्य नाना प्रकारके अतिशयोंसे सुशोभित था, निरन्तर परम आश्चर्यसे युक्त था और सुरासुरोंके मनको हरनेवाला था॥६॥ जो भव्य जीवोंके लिए जीवादि निर्दोष तत्त्वोंका स्वरूप दिखाकर अन्तमें कृतकृत्य हो निर्वाण पदको प्राप्त हुए थे ॥६२॥ चक्रवर्ती भरतने कैलास पर्वत पर सर्वरत्नमय दिव्य मन्दिर बनवा कर उन भगवान्की जो प्रतिमा विराजमान कराई थी वह सूर्यके समान देदीप्यमान है, पाँच सौ धनुष ऊँची है, दिव्य है, तथा आज भी उसकी महापूजा गन्धर्व, देव, किन्नर, अप्सरा, नाग तथा दैत्य आदि सदा यत्नपूर्वक करने हैं ॥६३-६५ जो ऋषभदेव भगवान् अनन्त हैं-परम पारिणामिक भावकी अपेक्षा अन्त रहित हैं, परम हैं-अनन्त चतुष्टयरूप उत्कृष्ट लक्ष्मी से युक्त हैं, सिद्ध हैं-कृतकृत्य हैं, शिव हैं-आनन्दरूप हैं, ज्ञानकी अपेक्षा सर्वगत हैं, कर्ममलसे रहित होने के कारण अमल हैं, प्रशस्तरूप होनेसे अन्त हैं. त्रैलोक्यकी पजाके योग्य हैं, स्वयंभ हैं और स्वयं प्रभु हैं। मैं उन भगवान् ऋषभदेवकी कैलास नामक उत्तम पर्वत पर जा कर तुम्हारे साथ कब पूजा करूँगा और कब स्तुति करूँगा ? ॥६६-६७। इस प्रकार निश्चय कर बहुत भारी धैर्य से उन्होंने मेरे साथ प्रस्थान कर दिया था परन्तु बीचमें ही दावानलके समान दुःसह लोकापवादको वार्ता आ गई ॥६८॥ तदनन्तर विचारपूर्वक कार्य करनेवाले मेरे स्वामीने विचार किया कि यह स्वभावसे कुटिल लोक अन्य प्रकारसे वश नहीं हो सकते ॥६६॥ इसलिए प्रिय जनका परित्याग करने पर यदि मृत्युका भी सेवन करना पड़े तो अच्छा है परन्तु कल्पान्त काल तक स्थिर रहनेवाला यह यशका उपघात श्रेष्ठ नहीं है ॥७०। इस तरह यद्यपि मैं निर्दोष हूँ तथापि लोकापवादसे डरनेवाले उन बुद्धिमान स्वामीने मुझे इस बीहड़ वनमें छुड़वा दिया है ॥७१।। सो जो विशुद्ध कुलमें उत्पन्न है, उत्तम हृदयका धारक है और सर्वशास्त्रोंका ज्ञाता है ऐसे क्षत्रियकी यह चेष्टा होती ही है ।।७२।। इस तरह वह दीन सीता अपने निर्वाससे सम्बन्ध रखनेवाला अपना सब समाचार कह कर शोकाग्निसे संतप्त होती हुई पुनः रोने लगी ॥७३॥ तदनन्तर जिसका मुख आँसुओंके जलसे पूर्ण था तथा जो पृथिवीकी धूलिसे सेवित थी ऐसी उस सीताको देखकर उत्तम सत्त्वगुणका धारक राजा वनजङ्घ भी क्षोभको प्राप्त हो गया ॥७४।। तत्पश्चात् उसे राजा जनककी पुत्री जान राजा वनजंघने पास जाकर बड़े आदरसे उसे Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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