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________________ पञ्चनवतितमं पर्व एवं दिनेषु गच्छत्सु भोगसम्भारयोगिषु । धर्मार्थकाम सम्बन्धनितान्तरतिकारिषु ॥१॥ विमानाभेऽन्यदा सुप्ता भवने जानकी सुखम् । शयनीये शरन्मेघमालासम्मितमार्दवे ॥२॥ अपश्यत् पश्चिमे यामे स्वप्नमम्भोजलोचना । दिव्यतूर्यनिनादैश्च मङ्गलैर्बोधमागता ॥३॥ ततोऽतिविमले जाते प्रभाते संशयान्विता । कृतदेहस्थितिः कान्तमियाय सुसखीवृता ॥ ४॥ अपृच्छच्च मया नाथ स्वप्नो योऽय निरीक्षितः । अर्थ कथयितुं तस्य 'लब्धवर्ण स्वमर्हसि ॥५॥ शरदिन्दुसमच्छायौ क्षुब्धसागर निःस्वनौ । कैलासशिखराकारौ सर्वालङ्कारभूषितौ ॥ ६ ॥ कान्तिमस्तिष्ट्रौ प्रवरौ शरभोत्तमौ । प्रविष्टौ मे मुखं मन्ये विलसप्सितकेसरी ॥७॥ शिखरात् पुष्पकस्याथ सम्भ्रमेणोरुणान्विता । वातनुन्ना पताकेवापतितास्मि किल क्षितौ ॥८॥ पद्मनाभस्ततोऽवोचच्छर भद्वयदर्शनात् । प्रवरोर्वचिरेणैव पुत्रयुग्ममवाप्स्यसि ॥३॥ पतनं पुष्पकस्याग्राद्दयिते न प्रशस्यते । अथवा शमदानस्थाः प्रयान्तुं प्रशमं ग्रहाः ॥१०॥ वसन्तोऽथ परिप्राप्तस्तिलका मुक्तकङ्कटः । नीपनागेश्वरारूढः सहकारशरासनः ॥ ११ ॥ पद्मनाराचसंयुक्तः केसरापूरितेषुधिः । गीयमानोऽमलश्लोकैर्मधुत्रतकदम्बकैः ॥ १२ ॥ कदम्बधनवातेन हारिणा निःश्वसन्निव । मल्लिका कुसुमोद्योतैः शत्रूनन्यान् हसन्निव ॥१३॥ अथानन्तर इस प्रकार भोगोंके समूहसे युक्त तथा धर्म अर्थ और कामके सम्बन्धसे अत्यन्त प्रीति उत्पन्न करनेवाले दिनोंके व्यतीत होने पर किसी दिन सीता विमान तुल्य भवनमें शरद् ऋतुकी मेघमाला के समान कोमल शय्या पर सुखसे सो रही थी कि उस कमललोचनाने रात्रि free प्रहर में स्वप्न देखा और देखते ही दिव्य वादित्रोंके मङ्गलमय शब्दसे वह जागृत गई ||१-३|| तदनन्तर अत्यन्त निर्मल प्रभातके होने पर संशयको प्राप्त सीता, शरीर सम्बन्धी क्रियाएँ करके सखियों सहित पति पास गई ||४|| और पूछने लगी कि हे नाथ! आज मैंने जो स्वप्न देखा है है विद्वन् ! आप उसका फल कहनेके लिए योग्य हैं ||५|| मुझे ऐसा जान पड़ता है कि शरऋतु के चन्द्रमाके समान जिनकी कान्ति थी, क्षोभको प्राप्त हुए सागरके समान जिनका शब्द था, कैलाशके शिखरके समान जिनका आकार था, जो सब प्रकारके अलङ्कारोंसे अलंकृत थे, जिनकी उत्तम दाढें कान्तिमान् एवं सफेद थीं और जिनकी गरदनकी उत्तम जटाएँ सुशोभित हो रही थीं ऐसे अत्यन्त श्रेष्ठ दो अष्टापद मेरे मुखमें प्रविष्ट हुए हैं ॥ ६-७॥ यह देखनेके बाद दूसरे स्वप्नमें मैंने देखा है कि मैं वायसे प्रेरित पताका के समान अत्यधिक सम्भ्रमसे युक्त हो पुष्पकविमानके शिखर से गिरकर नीचे पृथिवीपर आ पड़ी हूँ ||८|| तदनन्तर रामने कहा कि हे वरोरू ! अष्टापदों का युगल देखनेसे तू शीघ्र ही दो पुत्र प्राप्त करेगी ॥६॥ हे प्रिये ! यद्यपि पुष्पक विमानके अग्रभाग से गिरना अच्छा नहीं है तथापि चिन्ताकी बात नहीं है क्योंकि शान्तिकर्म तथा दान करने से पापग्रह शान्तिको प्राप्त हो जायेंगे ॥१०॥ अथानन्तर जो तिलकपुष्परूपी कवचको धारण किये हुए था । कदम्बरूपी गजराजपर आरूढ था, आम्ररूपी धनुष साथ लिये था, कमलरूपी बाणोंसे युक्त था, बकुल रूपी भरे हुए तरकसोंसे सहित था, निर्मल गुञ्जार करनेवाले भ्रमरोंके समूह जिसका सुयश गा रहे थे, जो कदम्बसे सुवासित सघन सुन्दर वायुसे मानो सांस ही ले रहा था, मालती के फूलों के प्रकाशसे जो मानो दूसरे शत्रुओं की हँसी कर रहा था जौर कोकिलाओंके मधुर आलापसे जो मानो अपने १. हे विद्वन् । 'लब्धवर्णो विचक्षणः' इत्यमरः । २. हे प्रवरोद + अचिरेण । ३. -मवाप्स्यति म० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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