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________________ पनपुराने सम्भ्रान्ताश्वरथारूढा महाप्रेमवशीकृता । सौमित्रिमुपसम्पमा पौलोमीव विडोजसम्॥४॥ तो प्रसादनसंयुक्ता प्रसाद्यां प्राप्य लचमणः । प्रशान्तकलुषो जातो भ्रकुटीरहिताननः ॥१५॥ ततो रत्नरथः साकं सुतैर्मानविवर्जितः । प्रीत्या निर्गत्य नगरादुपायनसमन्वितः ॥४६॥ देशकालविधानज्ञो इष्टात्मपरपौरुषः । सङ्गत्य सुष्टु तुष्टाव मृगनागारिकेतनौ ॥७॥ अन्तरेऽत्र समागस्य सुमहाजनमध्यगम् । नारदोऽहेपयत्नरथं सस्मितभाषितैः ॥४८॥ का वार्ता तेऽधुना रत्नरथ पांशुरथोऽध वा। केचित्कुशलमुत्तभटगर्जितकारिणः ।।४।। नूनं रनरथो न स्वं स हि गर्वमहाचलः । नारायणांघ्रिसेवास्थो भवन् कोऽप्यपरो नृपः ॥५०॥ कृत्वा कहकहाशब्दं कराहतकरः पुनः। जगौ भो स्थीयते कञ्चित्सुखं रत्नरथाङ्गजाः ॥५१॥ सोऽयं नारायणो यस्य भयगिस्तादृशं तंदा । गदितं हृदयग्राहि स्वगृहोद्धतचेष्टितैः ॥५२।। एवं सत्यपि तैरुक्तं स्वयि नारद कोपिते । महापुरुषसम्पर्कः प्राप्तोऽस्माभिः सुदुर्लभः ॥५३॥ इति नर्मसमेताभिः कथाभिः क्षणमात्रकम् । अवस्थाय पुरं सर्वे विविशुः परमर्द्धयः ॥५४॥ इन्द्रवज्रा श्रीदामनामा रतितुल्यरूपा रामाय दत्ता सुमनोऽभिरामा । रामामिमां प्राप्य परं स रेमे मेहप्रभावः कृतपाणियोगः ॥५५॥ दत्ता तथा रत्नरथेन जाता स्वयं दशास्यक्षयकारणाय । मनोरमार्थप्रतिपमानामा तयोश्च वृत्ता परिणीतिरुया ॥५६॥ मनोरमा कन्या वहाँ लक्ष्मणके समीप उस प्रकार आई जिस प्रकार कि इन्द्राणी इन्द्रके पास जाती है ।।४३-४४॥ जो प्रसाद करनेवाले लोगोंसे सहित थी तथा जो स्वयं प्रसाद करानेके योग्य थी ऐसी उस कन्याको पाकर लक्ष्मणकी कलुषता शान्त हो गई तथा उसका मुख भृकुटियोंसे रहित हो गया ॥४५।। तत्पश्चात् जिसका मान नष्ट हो गया था, जो देशकालकी विधिको जाननेवाला था, जिसने अपना-पराया पौरुष देख लिया था और जो योग्य भेंटसे सहित था ऐसे राजा रत्नरथने प्रीतिपूर्वक पुत्रोंके साथ नगरसे बाहर निकल कर सिंह और गरुडको पताकाओंको धारण करनेवाले राम-लक्ष्मणकी अच्छी तरह स्तुति की ॥४६-४७|| इसी बीचमें नारदने आकर बहुत बड़ी भीड़के मध्यमें स्थित रत्नरथको मन्द हास्यपूर्ण वचनोंसे इस प्रकार लज्जित किया कि अहो ! अब तेरा क्या हाल है ? तू रत्नरथ था अथवा रजोरथ ? तू बहुत बड़े योद्धाओंके कारण गजेना कर रहा था सो अब तेरी कुशल तो है ? ॥४८-४६।। जान पड़ता है कि तू गर्वका महापर्वत स्वरूप वह रत्नरथ नहीं है किन्तु नारायणके चरणोंकी सेवामें स्थित रहनेवाला कोई दूसरा ही राजा है ॥५०॥ तदनन्तर कहकहा शब्द कर तथा एक हाथसे दूसरे हाथ की ताली पीटते हुए कहा कि अहो! रत्नरथके पुत्रो ! सुखसे तो हो ? ॥५१॥ यह वही नारायण है कि जिसके विषयमें उस समय अपने घरमें ही.उद्धत चेष्टा दिखानेवाले आप लोगोंने उस तरह हृदयको पकड़नेवाली बात कही थी ॥५२।। इस प्रकार यह होने पर भी उन सबने कहा कि हे नारद ! तुम्हें कुपित किया उसीका यह फल है कि हमलोगोंको जिसका मिलना अत्यन्त दुर्लभ था ऐसा महापुरुषोंका संपर्क प्राप्त हआ ॥५३॥ इस प्रकार विनोद पूर्ण कथाओंसे वहाँ क्षणभर ठहर कर सब बड़े वैभवके साथ नगरमें प्रवेश किया ॥५४॥ उसी समय जो रतिके समान रूपकी धारक थी तथा देवोंको भी आनन्दित करनेवाली थी ऐसी श्रीदामा नामकी कन्या रामके लिए दी गई। ऐसी स्त्रीको पाकर जिनका मेरुके समान प्रभाव था तथा जिन्होंने उसका पाणिग्रहण किया था ऐसे श्रीराम अत्यधिक प्रसन्न हुए ॥५५॥ तदनन्तर राजा रत्नरथने रावणका क्षय करनेवाले लक्ष्मणके १. इन्द्रम् । २. सारं म० । ३. केचित् म०। ४. महाबलः ज० । ५. दशास्यक्षणकरणाय म०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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