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________________ पद्मपुराणे कन्यामदर्शयश्चित्रे चित्रां इक्चित्तहारिणीम् । त्रैलोक्यसुन्दरीशोभामेकीकृत्येव निर्मिताम् ॥१६॥ तां समालोक्य सौमित्रिः पुस्तनिष्कम्पलोचनः । अनन्यजस्य वीरोऽपि परिप्राप्तोऽतिवश्यताम् ॥१७॥ अचिन्तयच्च यद्येतत्स्त्रीरत्नं न लभे ततः । इदं मे निष्फलं राज्यं शून्यं जीवितमेव वा ॥१८|| उवाच चादरं बिभ्रद् भगवन् गुणकीर्तनन् । कुर्वन् मम कुमारैस्तैः कथं वा त्वं खलीकृतः ॥१६॥ प्रचण्डत्वमिदं तेषां पापानां विक्षिपाम्यहम् । असमीक्षितकार्याणां क्षुद्राणां निहतात्मनाम् ॥२०॥ ब्रज स्वास्थ्यं रजः शुद्धं तब मूर्द्धानमाश्रितम् । पादस्तु शिरसि न्यस्तो मदीयेऽसौ महामुने ॥२१॥ इत्युक्त्वाऽऽह्वाय संरब्धो विरावितखगेश्वरम् । जगाद लक्ष्मणो रत्नपुरं गम्यं रतरान्वितम् ॥२२॥ तस्माद्देशय पन्थानमित्युक्तः स रणोत्कटः । लेखैरावाय यत् सर्वान् तीव्राज्ञः खेचराधिपान् ॥२३॥ महेन्द्रविन्ध्य किष्किन्धमलयादिपुराधिपाः। विमानाच्छादिताऽऽकाशाः साकेतामागतास्ततः ॥२४॥ वृतस्तैः सुमहासैन्यैर्लचमणो विजयोन्मुखः । लोकपालैयथा लेखो ययौ पमपुरःसरः ॥२५॥ नानाशस्त्रदलग्रस्तदिवाकरमरीचयः । प्राप्ता रत्नपुरं भूपाः सितच्छनोपशोभिताः ॥२६॥ ततः परबलं प्राप्तं ज्ञात्वा रस्नपुरो नृपः । साकं समस्तसामन्तैः सङ्ख्यचुञ्चुर्विनिर्ययौ ॥२७॥ तेन निष्क्रान्तमात्रेण महारभसधारिणा । विस्तीर्णदक्षिणं सैन्यं क्षणं प्रस्तमिवाभवत् ॥२८॥ चक्रक्रकचवाणासिकुन्तपाशगदादिभिः । बभूव गहनं तेषां युद्धमुदतयोद्भवम् ॥२६॥ मनोरमा कन्याकी वार्ता विशेष रूपसे बतलाई। उसी समय कौतुकके चिह्न प्रकट करते हुए नारदने चित्रपटमें अङ्कित वह अद्भुत कन्या दिखाई। वह कन्या नेत्र तथा हृदयको हरनेवाली थी और ऐसी जान पड़ती थी मानो तीन लोकको सुन्दरियोंकी शोभाको एकत्रित कर ही बनाई गई हो ॥१५-१६॥ उस कन्याको देखकर जिसके नेत्र मृण्मय पुतलेके समान निश्चल हो गये थे ऐसा लक्ष्मण वीर होने पर भी कामके वशीभूत हो गया ॥१७॥ वह विचार करने लगा कि यदि यह स्त्रीरत्न मुझे नहीं प्राप्त होता है तो मेरा यह राज्य निष्फल है तथा यह जीवन भी सूना है ॥१८॥ आदरको धारण करते हुए लक्ष्मणने नारदसे कहा कि हे भगवन् ! मेरे गुणों का निरूपण करते हुए आपको उन कुमारोंने दुःखी क्यों किया ? ॥१६॥ कार्यका विचार नहीं करनेवाले उन हृदयहीन पापी क्षुद्र पुरुषोंकी इस प्रचण्डताको मैं अभी हाल नष्ट करता हूँ ॥२०॥ हे महामुने ! उन कुमारोंने जो पादप्रहार किया है सो उसकी धूलि आपके मस्तकका आश्रय पाकर शुद्ध हो गई है और उस पादप्रहारको मैं समझता हूँ कि वह मेरे मस्तक पर ही किया गया है अतः आप स्वस्थताको प्राप्त हों ॥२१॥ इतना कहकर क्रोधसे भरे लक्ष्मणने विराधित नामक विद्याधरीके राजाको बुलाकर कहा कि मुझे शीघ्र ही रत्नपुर पर चढ़ाई करनी है ॥२२।। इसलिए मार्ग दिखाओ। इस प्रकार कहने पर कठिन आज्ञाको धारण करनेवाले उस रणवीर विराधितने पत्र लिखकर समस्त विद्याधर राजाओंको बुला लिया ॥२३॥ तदनन्तर महेन्द्र, विन्ध्य, किष्किन्ध और मलय आदि पर्वतोपर बसे नगरोंके अधिपति, विमानोंके द्वारा आकाशको आच्छादित करते हुए अयोध्या आ पहुँचे ।।२४।। बहुत भारी सेनासे सहित उन विद्याधर राजाओंके द्वारा घिरा हुआ लक्ष्मण विजयके सम्नुख हो रामचन्द्रजीको आगे कर उस प्रकार चला जिस प्रकार कि लोकपालोंसे घिरा हुआ देव चलता है ॥२५॥ जिन्होंने नाना शस्त्रोंके समूहसे सूर्यकी किरणें आच्छादित कर ली थीं तथा जो सफेद छत्रोंसे सुशोभित थे ऐसे राजा रत्नपुर पहुँचे ॥२६।। तदनन्तर परचक्रको आया जान, रत्नपुरका युद्धनिपुण राजा समस्त सामन्तोंके साथ बाहर निकला ॥२७।। महावेगको धारण करनेवाले उस राजाने निकलते ही दक्षिणकी समस्त सेनाको क्षण भरमें ग्रस्त जैसा कर लिया ॥२८।। तदनन्तर चक्र, क्रकच, बाण, खड्ग, कुन्त, पाश, गदा आदि शस्त्रोंके द्वारा उन सबका उद्दण्डताके कारण गहन युद्ध हुआ ॥२६॥ १. कामस्य । २. शरणोत्कट: म० । ३. -राह्वाय तत्सर्वान्-म० । ४. धारिणाम। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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