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________________ पद्मपुराणे इत्युक्त्वा प्रणता वृद्धाः शिरःस्थकरकुड्मलाः । उत्थोप्य सम्भ्रमाच्चैतांस्तथेत्यूचे दशाननः ॥११॥ मन्त्रविनिस्ततस्तुष्टैः सन्दिष्टोऽत्यन्तशोभनः । द्रुतं गीकृतो दूतः सामन्तो नयकोविदः ॥१२॥ तं निमेषेजिताकृतपरिबोधविचक्षणम् । रावणः संज्ञया स्वस्मै रुचितं दागजिग्रहत् ॥१३॥ दूतस्य मन्त्रिसन्दिष्टं नितान्तमपि सुन्दरम् । महौषधं विषेणेव रावणार्थन दूषितम् ॥१४॥ अथ शुक्रसमो बुद्धया महौजस्कः प्रतापवान् । कृतवाक्यो नृ तिपेशलभाषणः ॥१५॥ प्रणम्य स्वामिनं तुष्टः सामन्तो गन्तुमुद्यतः। बुद्धयवष्टम्भतः पश्यन् लोक गोष्पदसम्मितम् ॥१६॥ गच्छतोऽस्य बलं भीमं नानाशस्त्रसमुज्ज्वलम् । बुद्धयव निर्मितं तस्य बभूव भयवर्जितम् ॥१७॥ तस्य तूर्यरवं श्रुत्वा क्षुब्धा वानरसैनिकाः । खमीक्षाञ्चक्रिरे भीता रावणागमशङ्किनः ॥१८॥ तस्मिन्नासन्नतां प्राप्ते पुरुषान्तरवेदिते । विश्रब्धतां पुनर्भेजे बलं प्लवगलक्षणम् ॥१६॥ दृतः प्राप्तो विदेहाजप्रतीहारनिवेदितः । आप्तैः कतिपयैः साकं बाह्यावासितसैनिकः ॥२०॥ दृष्ट्वा पदुमं प्रणम्यासौ कृतदूतोचितक्रियः । जगौ क्षणमिव स्थित्वा वचनं क्रमसङ्गतम् ॥२१॥ पन ! मद्वचनैः स्वामी भवन्तमिति भाषते । श्रोत्रावधानदानेन प्रयत्नः क्रियतां क्षणम् ॥२२॥ यथा किल न युद्धेन किञ्चिदत्र प्रयोजनम् । बहवो हि क्षयं प्राप्ता नरा युद्धाभिमानिनः ॥२३॥ करते हैं। यथार्थमें जिस प्रकार समुद्र रत्नोंकी उत्पत्तिका कारण है उसी प्रकार आप धर्मोकी उत्पत्तिके कारण हैं ॥१०॥ इतना कह वृद्ध मन्त्रीजनोंने शिरपर अञ्जलि बाँधकर रावणको नमस्कार किया और रावणने शीघ्रतासे उन्हें उठाकर कहा कि आप लोग जैसा कहते हैं वैसा ही करूँगा। ।११।। तदनन्तर मन्त्रके जाननेवाले मन्त्रियोंने सन्तुष्ट होकर अत्यन्त शोभायमान एवं नीतिनिपुण सामन्तको सन्देश देकर शीघ्र ही दूतके रूपमें भेजनेका निश्चय किया ॥१२॥ वह दूत दृष्टिके संकेतसे अभिप्रायके समझने में निपुण था इसलिए रावणने उसे संकेत द्वारा अपना रुचिकर सन्देश शीघ्र ही ग्रहण करा दिया-अपना सब भाव समझा दिया ॥१३॥ मन्त्रियोंने इतके लिए जो सन्देश दिया था वह यद्यपि बहुत सुन्दर था तथापि रावणके अभिप्रायने उसे इस प्रकार दूषित कर दिया जिस प्रकार कि विष किसी महौषधिको दूषित कर देता है ॥१४॥ तदनन्तर जो बुद्धिके द्वारा शुक्राचार्यके समान था, महा ओजस्वी था, प्रतापी था, राजा लोग जिसकी बात मानते थे और जो कर्णप्रिय भाषण करनेमें निपुण था, ऐसा सामन्त सन्तुष्ट हो स्वामीको प्रणाम कर जानेके लिए उद्यत हुआ। वह सामन्त अपनी बुद्धिके बलसे समस्त लोकको गोष्पदके समान तुच्छ देखता था ॥१५-१६॥ जब वह जाने लगा तब नाना शस्त्रोंसे देदीप्यमान एक भयङ्कर सेना जो उसको बुद्धिसे ही मानो निर्मित थी, निर्मय हो उसके साथ हो गई ॥१७॥ तदनन्तर दूतकी तुरहीका शब्द सुनकर वानर पक्षके सैनिक क्षुभित हो गये और रावणके आनेकी शङ्का करते हुए भयभीत हो आकाशकी ओर देखने लगे ।।१८।। तदनन्तर वह दूत जब निकट आ गया और यह रावण नहीं किन्तु दसरा पुरुष है, इसप्रकार समझमें आ गया तब वानरोंकी सेना पुनः निश्चिन्तताको प्राप्त हुई ॥१॥ तदनन्तर भामण्डलरूपी द्वारपालने जिसकी खबर दी थी तथा डेरेके बाहर जिसने अपने सैनिक ठहरा दिये थे, ऐसा वह दूत कुछ आप्तजनोंके साथ भीतर पहुँचा ।।२०। वहाँ उसने रामके दर्शनकर उन्हें प्रणाम किया । दूतके योग्य सब कार्य किये । तदनन्तर क्षणभर ठहर कर क्रमपूर्ण निम्नाङ्कित वचन कहे ।।२१।। उसने कहा कि हे पद्म ! मेरे वचनों द्वारा स्वामी रावण, आपसे इस प्रकार कहते हैं सो आप कोंको एकाग्रकर क्षणभर श्रवण करनेका प्रयत्न कीजिए ॥२२।। वे कहते हैं कि मुझे इस विषयमें युद्धसे कुछ भी प्रयोजन १. विदेहाजः म०, ज० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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