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________________ १६० पद्मपुराणे एवमास्थां समारूढे तस्मिन्नुत्तमतेजसि । विस्मयं परमं प्राप्ता विद्याधरमहेश्वराः ॥१४॥ ततस्तमुद्यतं गन्तुं समुसार्य हलायुधः । जगाद दक्षिणामेकां धीर मे यच्छ याचितः ॥१५॥ तमरिघ्नोऽब्रवीद्दाता त्वमनन्यसमो विभुः । याचसे किं त्वतः श्लाघ्यं परं मेऽन्यद् भविष्यति ॥१६॥ असूनामपि नाथस्त्वं का कथाऽन्यत्र वस्तुनि । युद्धविन विमुच्य अहि किं करवाणि वः ॥१७॥ ध्यात्वा जगाद पद्माभो वत्सकासौ त्वया मधुः । रहितः शूलरत्नेन क्षोभ्यः छिद्रे मदर्थनात् ॥१८॥ यथाऽज्ञापयसीत्युक्त्वा सिद्धान्नत्दा समय॑ च । भुङ्क्त्वा मातरमागत्य नत्वाऽपृच्छत् सुखस्थिताम्॥१६॥ समीक्ष्य तनयं देवी स्नेहादाघ्राय मस्तके । जगाद जय वत्स त्वं शरैः शत्रुगणं शितैः ॥२०॥ व समर्वासने कृत्वा वीर सूरगदत् पुनः । वीर दर्शयितव्यं ते पृष्ठं संयति न द्विषाम् ॥२१॥ प्रत्यागतं कृतार्थ त्वां वीच्य जातक संयुगात् । पूजां परां करिष्यामि जिनानां हेमपङ्कजैः ।।२२।। त्रैलोक्यमङ्गलात्मानः सुरासुरनमस्कृताः । मङ्गलं तव यच्छन्तु जितरागादयो जिनाः ॥२३॥ संसारभवो मोहो यर्जितोऽत्यन्त दुर्जयः । अर्हन्तो भगवन्तस्ते भवन्तु तव मङ्गलम् ॥२४॥ चतुर्गतिविधानं ये देशयन्ति त्रिकालगम् । ददतां ते स्वयम्बुद्धास्तव बुद्धि रिपोजये ॥२५॥ करस्थामलकं यवल्लोलालोकं स्वतेजसा । पश्यन्तः केवलालोका भवन्तु तव मङ्गलम् ॥२६॥ कर्मणाऽकारेण मुक्तास्त्रैलोक्यमूर्द्धगाः । सिद्धाः सिद्धिकरा वस भवन्तु तव मङ्गलम् ।।२।। कमलादित्यचन्द्रमामन्दराब्धिवियत् समाः । आचार्याः परमाधारा भवन्तु तब मङ्गलम् ।।२।। तब विद्याधर राजा परम आश्चर्य को प्राप्त हुए ॥१४॥ तदनन्तर वहाँ जानेके लिए उद्यत शत्रुघ्नको सागनेसे दूर हटाकर श्रीरामने कहा कि हे धीर ! मैं तुझसे याचना करता हूँ तू मुझे एक दक्षिणा दे ॥१५॥ यह सुन शत्रुघ्नने कहा कि असाधारण दाता तो आप ही हैं सो आप ही जब याचना कर रहे हैं तब मेरे लिए इससे बढ़कर अन्य प्रशंसनीय क्या होगा ? ॥१६॥ आप तो मेरे प्राणोंके भी स्वामी हैं फिर अन्य वस्तुकी क्या कथा है ? एक युद्धके विघ्नको छोड़कर कहिये कि मैं आपकी क्या करूँ ? आपकी क्या सेवा करूँ ? ॥१७॥ तदनन्तर रामने कुछ ध्यान कर उससे कहा कि हे वत्स ! मेरे कहनेसे तू एक बात मान ले । वह यह कि जब मधु शूल रत्नसे रहित हो तभी तू अवसर पाकर उसे क्षोभित करना अन्य समय नहीं ॥१८॥ तत्पश्चात् 'जैसी आपकी आज्ञा हो' यह कहकर तथा सिद्ध परमेष्ठियोंको नमस्कार और उनकी पूजा कर भोजनोपरान्त शत्रुघ्न सुखसे बैठी हुई माताके पास आकर तथा प्रणाम कर पूछने लगा ॥१६॥ रानी सुप्रजाने पुत्रको देखकर उसका मस्तक सूंघा और उसके बाद कहा कि हे पुत्र ! तू तीक्ष्ण बाणोंके द्वारा शत्र समूहको जीते ॥२०॥ वीरप्रसविनी माताने पुत्रको अर्धासन पर बैठाकर पुनः कहा कि हे वीर ! तुझे युद्ध में शत्रुओंको पीठ नहीं दिखाना चाहिए ॥२१॥ हे पुत्र ! तुझे युद्धसे विजयी हो लौटा देखकर मैं सुवर्ण कमलों से जिनेन्द्र भगवानकी परम पूजा करूँगी ।।२२।। जो तीनों लोकोंके लिए मङ्गल स्वरूप हैं, तथा सुर और असुर जिन्हें नमस्कार करते हैं ऐसे वीतराग जिनेन्द्र तेरे लिए मङ्गल प्रदान करें ॥२३॥ जिन्होंने संसारके कारण अत्यन्त दुर्जय मोहको जीत लिया है ऐसे अर्हन्त भगवान् तेरे लिए मङ्गल स्वरूप हों ॥२४॥ जो तीन काल सम्बन्धी चतुर्गतिके विधानका निरूपण करते हैं ऐसे स्वयम्बुद्ध जिनेन्द्र भगवान तेरे लिए शके जीतने में बुद्धि प्रदान करें ॥२५॥ जो अपने तेजसे समस्त लोकालोकको हाथ पर रक्खे हुए आमलकके समान देखते हैं ऐसे केवलज्ञानी तुम्हारे लिए मङ्गल स्वरूप हों ॥२६॥ जो आठ प्रकारके कर्मोंसे रहित हो त्रिलोक शिखर पर विद्यमान हैं ऐसे सिद्धिके करनेवाले सिद्ध परमेष्ठी, हे वत्स ! तेरे लिए मङ्गल स्वरूप हो ॥२७॥ जो कमलके समान निर्लिप्त, सूर्यके १. भक्त्वा म० । २. तीक्ष्णः । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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