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________________ अष्टाशीतितमं पर्व १५७ तस्मिन् महोत्सवे जाते स्नानीयासनवर्तिनौ । विभूत्या परया युक्तौ सङ्गतौ रामलचमणौ ॥२३॥ रुक्मकाञ्चननिर्माण नारत्नमयैस्तथा । कलशैर्युक्तपद्मास्यैरभिषिक्ती यथाविधि ॥३०॥ मुकुटाङ्गन्दकेयूरहारकुण्डलभूषितौ । दिव्यस्रग्वस्त्रसम्पन्नौ वरालेपनचर्चितौ ॥३१॥ सीरपाणिर्जयत्वेषश्चक्री जयतु लचमणः । इति तौ जयशब्देन खेचरैरभिनन्दितौ ॥३२॥ राजेन्द्रयोस्तयोः कृत्वा खेचरेन्द्रा महोत्सवम् । गत्वाऽभिषिषिचुर्देवी स्वामिनी नु विदेहजाम् ॥३३॥ महासौभाग्यसम्पन्ना पूर्वमेव हि साऽभवत् । प्रधाना सर्वदेवीनामभिषेकाद् विशेषतः ॥३४॥ आनन्ध जयशब्देन वैदेहीमभिषेचनम् । ऋद्धया चक्रविशत्यायाश्चक्रिपत्नीविभुत्वकृत् ॥३५॥ स्वामिनी लक्ष्मणस्यापि प्राणदानाद् बभूव या। मर्यादामात्रकं तस्यास्तज्जातमभिषेचनम् ॥३६॥ जय विखण्डनाथस्य लचमणस्याथ सुन्दरि । इति तां जयशब्देन तेऽभिनन्द्य स्थिताः सुखम् ॥३७॥ त्रिकूटशिखरे राज्यं ददौ रामो विभीषणे । सुग्रीवस्य च किष्किन्धे वानरध्वजभभृतः ॥६॥ श्रीपर्वते मरुजस्य गिरौ श्रीनगरे पुरे । विराधितनरेन्द्रस्य गोत्रक्रमनिषेविते ॥३॥ महार्णवोर्मिसन्तानचुम्बिते बहुकौतुके । कैष्किन्धे च पुरे स्फीतं पतित्वं नलनीलयोः ॥४०॥ विजया दक्षिणे स्थाने प्रख्याते रथनपुरे । राज्यं जनकपुत्रस्य प्रणतोग्रनभश्चरम् ॥४॥ दैवोपगीतनगरे कृतो रत्नजटी नृपः । शेषा अपि यथायोग्यं विषयस्वामिनः कृताः ॥४२॥ सुन्दर गीत, और नाना प्रकारके मनोहर नृत्य उत्तम आनन्द प्रदान कर रहे थे ॥२८॥ इस प्रकार उस महोत्सवके होने पर परम विभूतिसे युक्त राम और लक्ष्मण साथ ही साथ अभिषेकके आसन पर आरूढ हुए ॥२६॥ तत्पश्चात् जिनके मुख, कमलोंसे युक्त थे ऐसे चाँदी सुवर्ण तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे निर्मित कलशोंके द्वारा विधिपूर्वक उनका अभिषेक हुआ ॥३०।। दोनों ही भाई मुकुट, अङ्गद, केयूर, हार और कुण्डलोंसे विभूषित किये गये। दोनों ही दिव्य मालाओं और यत्रोंसे सम्पन्न तथा उत्तमोत्तम विलेपनसे चर्चित किये गये ॥३१।। जिनके हाथमें हलायुध विद्यमान है ऐसे श्रीराम और जिनके हाथमें चक्ररत्न विद्यमान है ऐसे लक्ष्मणकी जय हो इस प्रकार जय-जयकारके द्वारा विद्याधरोंने दोनोंका अभिनन्दन किया ॥३२॥ इस प्रकार उन दोनों राजाधिराजोंका महोत्सव कर विद्याधर राजाओंने स्वामिनी सीतादेवीका जाकर अभिषेक किया ॥३३।। वह सीतादेवी पहलेसे ही महा सौभाग्यसे सम्पन्न थी फिर उस समय अभिषेक होनेसे विशेष कर सब देवियों में प्रधान हो गई थी ॥३४॥ तदनन्तर जय-जयकारसे सीताका अभिनन्दन कर उन्होंने बड़े वैभवके साथ विशल्याका अभिषेक किया। उसका वह अभिपेक चक्रवर्तीकी पट्टराज्ञीके विभुत्वको प्रकट करनेवाला था ॥३५॥ जो विशल्या प्राणदान देनेसे लक्ष्मणकी भी स्वामिनी थी उसका अभिषेक केवल मर्यादा मात्रके लिए हुआ था अर्थात् वह स्वामिनी तो पहले से ही थी उसका अभिषेक केवल नियोग मात्र था ॥३६॥ अथानन्तर हे तीन खण्डके अधिपति लक्ष्मणकी सुन्दरि ! तुम्हारी जय हो इस प्रकारके जय-जयकारसे उसका अभिनन्दन कर सब राजा लोग सुखसे स्थित हुए ॥३७॥ तदनन्तर श्री रामने विभीषणके लिए त्रिकूटाचलके शिखरका, वानरवंशियोंके राजा सुग्रीवको किष्किन्ध पर्वतका, हनूमानको श्रीपर्वतका, राजा विराधितके लिए उसकी वंशपरम्परासे से वित श्रीपुर नगरका और नल तथा नीलके लिए महासागरकी तरङ्गोंसे चुम्बित अनेक कौतुकोंको धारण करनेवाले, किष्किन्धपुरका विशाल साम्राज्य दिया।॥३८-४०॥ भामण्डलके लिए विजया पर्वतके दक्षिणमें स्थित रथनूपुर नगर नामक प्रसिद्ध स्थानमें उग्र विद्याधरोंको नम्रीभूत करनेवाला राज्य दिया ॥४१।। रत्नजटीको देवोपगीत नगरका राजा बनाया और शेष लोग भी यथायोग्य देशोंके स्वामी किये गये ॥४२॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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