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________________ पद्मपुराणे शिवयन्तं नृपं देवीमेवं श्रीनन्दिवर्द्धनम् । श्रुत्वा मृदुमतिर्बोधं निर्मलां समुपाश्रितः ॥१३६॥ संसारभावसंविग्नः साधोश्चन्द्रमुखश्रुतेः । पादमूलेऽभजद्दीचां सर्वग्रन्थविमोचितम् ॥ १३७ ॥ अतपत् स तपो घोरं विधिं शास्त्रोक्तमाचरन् । भिक्षां' स्यात् प्राप्नुवन्किञ्चित् प्रासुकां सत्क्षमान्वितः १३८ १४६ दुर्गगिरेर्मूद्धिं नाम्ना गुणनिधिर्मुनिः । चकार चतुरो मासान्वाषु काननमुक्तिदान् ॥१३६॥ सुरासुरस्तुतो धीरः समाप्त नियमोऽभवत् । उत्पपात मुनिः क्वापि विधिना गगनायनः ॥ १४० ॥ भथो मृदुमतिर्भिक्षाकरणार्थं सुचेष्टितः । आलोकनगरं प्राप्तो युगमात्राहितेक्षणः ॥ १४१ ॥ ददर्श सम्भ्रमेणैतं पौरलोकः सपार्थिवः । शैलाग्रेऽवस्थितः सोऽयमिति ज्ञात्वा सुभक्तिकः ॥१४२॥ भच्यैर्ब्रहुप्रकारैस्तं तर्पयन्ति स्म पूजितम् । जिह्वेन्द्रियरतो मायां स च भेजे कुकर्मतः ॥ १४३ ॥ सत्वं यः पर्वतस्याग्रे यतिनाथो व्यवस्थितः । वन्दितस्त्रिदशैरेवमुक्तः सोऽनमयच्छिरः ॥ १४४ ॥ अज्ञानादभिमानेन दुःख बीजमुपार्जितम् । स्वादगौरवसक्तेन तेनेदं स्वस्य वञ्चनम् ॥ १४५॥ एतसेन गुरोरग्रे न मायाशल्यमुद्धृतम् । दुःखभाजनतां येन सम्प्राप्तः परमामिमाम् ॥ १४६ ॥ ततो मृदुमतिः कालं कृत्वा तं कल्पमाश्रितः । अभिरामोऽमरो यत्र वर्तते महिमान्वितः ॥ १४७ ॥ पूर्वकर्मानुभावेन तयोरति निरन्तरा । त्रिविष्टपेऽभवत् प्रीतिः परमर्द्धिसमेतयोः ॥ १४८ ॥ देवीजनसमाकीर्णौ सुखसागरवर्त्तिनौ । बहून ब्धिसँमांस्तत्र रेमाते तौ स्वपुण्यतः ॥ १४६॥ इसलिए मैं दीक्षा धारण करता हूँ तुम शोक करने के योग्य नहीं हो ॥ १३५ ॥ इस प्रकार शिक्षा देते हुए श्री नन्दिवर्धन राजाको सुनकर वह मृदुमति अत्यन्त निर्मल बोधिको प्राप्त हुआ || १३६|| संसारकी दशासे विरक्त हो उसने शशाङ्कमुख नामा गुरुके पादमूल में सर्व परिग्रह का त्याग करानेवाली जिनदीक्षा धारण कर ली || १३७॥ अत्र वह शास्त्रोक्त विधिका आचरण करता तथा जब कभी प्रासुक भिक्षा प्राप्त करता हुआ क्षमाधर्मसे युक्त हो घोर तप करने लगा ॥१३८॥ अथानन्तर गुणनिधि नामक एक उत्तम मुनिराजने दुर्गगिरि नामक पर्वत के शिखर पर आहारका परित्याग कर चार माहके लिए वर्षायोग धारण किया। ॥ १३६ ॥ सुर और असुरोंने जिसकी स्तुति की तथा जो चारण ऋद्धिके धारक थे ऐसे वे धीर वीर मुनिराज चार माहका नियम समाप्त कर कहीं विधिपूर्वक आकाशमार्ग से उड़ गये --विहार कर गये || १४० ॥ तदनन्तर उत्तम चेष्टाओंके धारक एवं युगमात्र पृथिवी पर दृष्टि डालनेवाले मृदुमति नामक मुनिराज भिक्षा के लिए आलोकनामा नगर में आये || १४१ ॥ सो राजा सहित नगरवासी लोगोंने यह जानकर कि ये वे ही महामुनि हैं जो पर्वतके अग्रभाग पर स्थित थे उन्हें आते देख बड़े संभ्रम से भक्ति सहित उनके दर्शन किये || १४२|| तथा उनकी पूजा कर उन्हें नाना प्रकारके आहारोंसे संतुष्ट किया । और जिह्वा इन्द्रियमें आसक्त हुए उन मुनिने पाप कर्मके उदयसे माया धारण की || १४३॥ नगरवासी लोगोंने कहा कि तुम वही मुनिराज हो जो पर्वतके अग्रभागपर स्थित थे तथा देवोंने जिनकी बन्दना की थी । इस प्रकार कहने पर उन्होंने अपना सिर नीचा कर लिया किन्तु यह नहीं कहा कि मैं वह नहीं हूँ || १४४ || इस प्रकार भोजन के स्वादमें लीन मृदुमति मुनिने अज्ञान अथवा अभिमान के कारण दुःखके बोजस्वरूप इस आत्मवञ्चनाका उपार्जन किया अर्थात् माया की ।। १४५ ।। यतश्च उन्होंने गुरुके आगे अपनी यह माया शल्य नहीं निकाली इसलिए वे इस परम दुःखकी पात्रताको प्राप्त हुए || १४६ || तदनन्तर मृदुमति मुनि मरण कर उसी स्वर्ग में पहुँचे जहाँ कि ऋद्धियों सहित अभिराम नामका देव रहता था ॥ १४७ ॥ पूर्व कर्मके प्रभाव से परम ऋद्धिको धारण करनेवाले उन दोनों देवोंकी स्वर्ग में अत्यन्त प्रीति थी । | १४८ || देवियों के समूह से १. भिक्षां प्राप्नुवन् किञ्चित्प्रासुकां स क्षमान्त्रितः म० । २. नत्र म० । न्ननु प० । ३. तेनैदं म० । ४. समास्तत्र ज० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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