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________________ एकाशीतितम पर्व महेन्द्र शिखराभेषु चैत्यगेहेषु सन्तताः । अभिषेकोत्सवा लग्नाः सङ्गीतध्वनिनादिताः ॥११७॥ भ्रमरैरुपगीतानि समानि सजलैर्घनैः । उद्यानानि सपुष्पाणि जातानि सफलानि च ॥११॥ बहिराशास्वशेषासु वनैर्मुदितजन्तुभिः । नन्दनप्रतिमैर्जाता नगरी सुमनोहरा ॥११६॥ नवयोजनविस्तारा द्वादशायामसङ्गता । द्वयधिकानि तु षडनिशत्परिक्षेपेण पूरसौ॥१२०॥ दिनैः षोडशभिश्चारुनभोगोचरशिल्पिभिः । निर्मिता शंसितुं शक्या न सा वर्षशतैरपि ॥१२१॥ वाप्यः काञ्चनसोपाना दीर्घिकाश्च सुरोधसः । पद्मादिभिः समाकीर्णा जाता ग्रीष्मेऽप्यशोषिताः ।।१२२॥ स्नानक्रीडातिसम्भोग्यास्तटस्थितजिनालयाः । दधुस्ताः परमां शोभा वृक्षपालीसमावृताः ॥१२३।। कृतां स्वगपुरीतुल्यां ज्ञात्वा तां नगरी हली । श्वोयानशंसिनी स्थाने घोषणां समदापयत् ।।१२।। वंशस्थवृत्तम् यदैव वार्ता गगनाङ्गणायनो मुनिस्तयोर्मातृसमुद्भवां जगी। ततः प्रभृत्येव हि सीरिचक्रिणौ सदा सविन्यौ हृदयेन बभ्रतुः ॥१२५।। अचिन्तितं कृत्स्नमुपैति चारुतां कृतेन पुण्येन पुराऽसुधारिणाम् । ततो जनः पुण्यपरोऽस्तु सन्ततं न येन चिन्तारवितापमश्नुते ॥१२६।। इत्याचे रविषेणाचार्य प्रोक्त पद्मपुराणे साकेतनगरीवर्णनं नामैकाशीतितम पर्व ॥८॥ आश्चर्यों से परिपूर्ण थी तथा जिसमें निरन्तर महोत्सव होते रहते थे ऐसी वह अयोध्यानगरी लंका आदिको जीतने वाली हो रही थी ॥११६।। महेन्द्र गिरिके शिखरोंके समान आभावाले जिन मन्दिरोंमें निरन्तर संगीतध्वनिके साथ अभिषेकोत्सव होते रहते थे ॥११७॥ जो जेलभृत मेघोंके समान श्यामवर्ण थे तथा जिनपर भ्रमर गुञ्जार करते रहते थे ऐसे बाग-बगीचे उत्तमोत्तम फूलों और फलोंसे युक्त हो गये थे ॥११८॥ बाहरकी समस्त दिशाओं में अर्थात् चारों ओर प्रमुदित जन्तुओंसे युक्त नन्दन वनके समान सुन्दर वनोंसे वह नगरी अत्यन्त मनोहर जान पड़ती थी ॥११६॥ वह नगरी नौ योजन चौड़ी बारह योजन लम्बी और अड़तीस योजन परिधिसे सहित थी ॥१२०|| सोलह दिनों में चतुर विद्याधर कारीगरोंने अयोध्याको ऐसा बना दिया कि सौ वर्षोंमें भी उसकी स्तुति नहीं हो सकती थी ॥१२१।। जिनमें सुवर्णकी सीढ़ियाँ लगी थीं ऐसी वापिकाएँ तथा जिनके सुन्दर-सुन्दर तट थे ऐसी परिखाएँ कमल आदिके फूलोंसे आच्छादित हो गई और उनमें इतना पानी भर गया कि ग्रीष्म ऋतुमें भी नहीं सूख सकती थीं ॥१२२।। जो स्नान सम्बन्धी क्रीड़ासे उपभोग करने योग्य थीं, जिनके तटोंपर उत्तमोत्तम जिनालय स्थित थे तथा जो हरेभरे वृक्षोंकी कतारोंसे सुशोभित थीं ऐसी परिखाएँ उत्तम शोभा धारण करती थीं ॥१२३॥ अयोध्या- पुरीको स्वर्गपुरीके समानकी हुई जानकर हलके धारक श्रीरामने स्थान-स्थान पर आगामी दिन प्रस्थानको सूचित करनेवाली घोषणा दिलवाई ॥१२४॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! आकाशरूपी आँगनमें विहार करनेवाले नारद ऋषिने जबसे माताओं सम्बन्धी समाचार सुनाया था तभीसे राम-लक्ष्मण अपनी-अपनी माताओंको हृदयमें धारण कर रहे थे ॥१२५॥ पूर्वभवमें किये हुए पुण्यकर्मके प्रभावसे प्राणियोंके समस्त अचिन्तित कार्य सुन्दरताको प्राप्त होते हैं इसलिए समस्तलोग सदा पुण्य संचय करनेमें तत्पर रहें जिससे कि उन्हें चिन्ता रूपी सूर्यका संताप न भोगना पड़े ।।१२।। इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मपुराणमें अयोध्याका वर्णन करनेवाला इक्यासीवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥८॥ १. सुपुष्पाणि म० । २. दशयोजन ज०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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