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________________ पद्मपुराणे ततो वातगतिःचोणों पश्यन् दुर्लक्ष्यपर्वताम् । लङ्क प्रतिकृताशको नारदश्चकितं ययौ ॥४॥ समीपीभूय लङ्कायाश्चिन्तामेवमुपागतः । कथं वार्तापरिज्ञानं करोमि निरुपायकम् ॥४५॥ पनलचमणवार्तायाः प्रश्ने दोषोऽभिलच्यते । पृच्छतो दशवक्त्रं तु स्फीतमार्गो न दृश्यते ॥४६॥ अनेनैवानुपूर्येण वातां ज्ञास्ये मनीषिताम् । इति ध्यात्वा सुविश्रब्धो गतः पनसरो यतः ॥१७॥ तस्यां च तत्र वेलायामन्तःपुरसमन्वितः । तारायास्तनयः क्रीडां कुरुते चारुविभ्रमः ॥४८॥ तटस्थं पुरुषं तस्य कृतपूर्वप्रियोदितः । कुशलं रावणस्येति पप्रच्छावस्थितः क्षणम् ||४६॥ श्रुत्वा तद्वचनं क्रुद्धाः किकराः स्फुरिताधराः । जगदुः कथमेव त्वं दुष्टं तापस भाषसे ॥५०॥ . कुतो रावणवर्गीणो मुनिखेटस्त्वमागतः । इत्युक्त्वा परिवार्यासावङ्गदस्यान्तिकीकृतः ॥५१॥ कुशलं रावणस्यायं पृच्छतीत्युदिते भटः । न कार्य दशवक्त्रेण ममेति मुनिरभ्यधात् ॥५२॥ तैरुक्तं यद्यदः सत्यं तस्य कस्मात्प्रमोदवान् । कुशलोदन्तसम्प्रश्ने वर्तसे परमादरः ॥५३॥ ततोऽङ्गदः प्रहस्योचे व्रजतैनं कुतापसम् । दुरीहं पद्मनाभाय मूढं दर्शयत द्रुतम् ॥५४॥ पृष्ठतः प्रेर्यमाणोऽसौ बाह्नाकर्षणतत्परैः । सुकष्टं नीयमानस्तैरिति चिन्तामुपागतः ॥५५॥ बहवः पद्मनाभाख्याः सन्त्या वसुधातले । न जाने कतमः स स्यात्रीये यस्याहमन्तिकम् ॥५६॥ भहच्छासनवात्सल्या देवता मम तायनम् । काचित् कुर्वीत किं नाम पतितोऽस्यतिसंशये ॥५७।। तदनन्तर वायुके समान तीव्र गतिसे जाते और दुर्लक्ष्य पर्वतोंसे युक्त पृथिवीको देखते हुए नारद लंकाकी ओर चले। उस समय उनके मनमें कुछ शङ्का तथा कुछ आश्चर्य-दोनों ही उत्पन्न हो रहे थे ॥४४॥ चलते-चलते नारद जब लंकाके समीप पहुँचे तब ऐसा विचार करने लगे कि में उपायके बिना राम-लक्ष्मणका समाचार किस प्रकार ज्ञात करूं? ॥४५॥ यदि साक्षात् रावणसे राम-लक्ष्मणकी वार्ता पछता हूँ तो इसमें दोष दिखायी देता है। क्या करूँ ? कुछ स्पष्ट मार्ग दिखायी नहीं देता ॥४६।। अथवा मैं इसी क्रमसे इच्छित वार्ताको जानूँगा। इस प्रकार मनमें ध्यान कर निश्चिन्त हो पद्मसरोवरकी ओर गये ॥४७॥ उस समय उस पद्मसरोवरमें उत्तम शोभाको धारण करनेवाला अङ्गद अपने अन्तःपुरके साथ क्रोड़ा कर रहा था ॥४८॥ वहाँ जाकर नारद मधुर वार्ता द्वारा तटपर स्थित किसी पुरुषसे रावणकी कुशलता पूछते हुए क्षणभर खड़े रहे ॥४६॥। उनके वचन सुन, जिनके ओंठ काँप रहे थे ऐसे सेवक कुपित हो बोले कि रे तापस ! तू इस तरह दुष्टतापूर्ण वार्ता क्यों कर रहा है ? ।।५०।। 'रावणके वर्गका तू दुष्ट तापस यहाँ कहाँसे आ गया ?' इस प्रकार कहकर तथा घेरकर किङ्कर लोग उन्हें अङ्गदके समीप ले गये ॥५१॥ 'यह तापस रावणकी कुशल पूछता है' इस प्रकार जब किङ्करोंने अंगदसे कहा तब नारदने उत्तर दिया कि मुझे रावणसे कार्य नहीं है ॥५२॥ तब किङ्करोंने कहा कि यदि यह सत्य है तो फिर तू हर्षित हो रावणका कुशल पूछनेमें परमआदरसे युक्त क्यों है ? ॥५३।। तदनन्तर अङ्गदने हँसकर कहा कि जाओ इस खोटी चेष्टाके धारक मूर्ख तापसको शीघ्र ही पद्मनाभके दर्शन कराभो अर्थात् उनके पास ले जाओ ॥५४॥ अङ्गन्दके इतना कहते ही कितने ही किङ्कर नारदकी भुजा खींचकर आगे ले जाने लगे और कितने ही पीछेसे प्रेरणा देने लगे। इस प्रकार किङ्करों द्वारा कष्टपूर्वक ले जाये गये नारदने मनमें विचार किया कि इस पृथ्वीतलपर पद्मनाम नामको धारण करनेवाले बहुतसे पुरुष हैं । न जाने वह पद्मनाभ कौन है जिसके कि पास मैं ले जाया जा रहा हूँ ? ॥५५-५६।। जिनशासनसे स्नेह रखनेवाली कोई देवी मेरी रक्षा करे, मैं अत्यन्त संशयमें पड़ गया हूँ ॥५७।। १. संप्रश्नो म। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001824
Book TitlePadmapuran Part 3
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2004
Total Pages492
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size13 MB
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