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________________ ६६ पद्मपुराणे अर्हच्छासनदेवीव जृम्भैरावतनामनि । सा तत्र लोचने कृत्वा तस्थौ मग्ना सुखाम्बुधौ ॥१६४॥ मासमात्रमुषित्वातो बन्धुसङ्गममोदिना । पद्मो मामण्डलेनोचे विनयं बिभ्रता परम् ॥१६५॥ वैदेह्याः शरणं देव त्वमेवोत्तमबान्धवः । छन्देऽस्या वर्ततां येन नो यात्युद्वेगमेषका ॥ १६६ ॥ स्वसारं च समालिङ्ग्य स्नेहादेनां सुचेष्टिताम् । उपादिशदसौ भूयो भूयः प्रवरमानसः ॥१६७॥ माताकिङ्गयागदत् सीतां सुते श्वसुरयोः प्रिये । परिवर्गे च तत्कुर्याः श्लाघ्यतां येन गच्छसि ॥ १६८ ॥ सर्वानामन्त्र्य विन्यस्य कनके मिथिलेशिताम् । गृहीत्वा पितरौ यातः स्थानं भामण्डलो निजम् ॥ १६९॥ इन्द्रवज्रा वीक्षस्व माहात्म्यमिदं कृतस्य धर्मस्य पूर्व मगधाधिराज । विद्याधरेन्द्रो यदवापि बन्धुः सीता च पत्नी गुणरूपपूर्णा ॥ १७० ॥ उपजातिः अधिष्ठते देवगणैश्च चापे सकंकटे सीरगदादियुक्ते । लब्धे सुरैरप्यतिदुर्लभे ये पद्मेन लक्ष्मीनिलयश्च भृत्यः ॥१७१॥ उपेन्द्रवज्रा इदं जनो यः सुविशुद्धचेताः शृणोति मामण्डलबन्धुयोगम् । अभीष्टयोगानरुजश्चिराय रविप्रभोऽसौ लभते शुभात्मा ॥ १७२ ॥ इत्यार्षे रविषेणाचार्य प्रोक्ते पद्मचरित भामण्डलसमागमाभिधानं नाम त्रिंशत्तमं पर्व ॥ ३० ॥ वह उत्तम पुत्रका संग पाकर परम आनन्दको प्राप्त हुई || १६३ || जिस प्रकार ऐरावत क्षेत्रमें जृम्भा नामकी जिनशासनकी सेवक देवी रहती है उसी प्रकार वह भामण्डलपर दृष्टि लगाकर अर्थात् उसे देखती हुई सुखरूपी सागर में निमग्न होकर रहने लगी || १६४ || तदनन्तर एक मास तक अयोध्या में रहने के बाद भाई-बन्धुओंके समागमसे प्रसन्न एवं परम विनयको धारण करनेवाले भामण्डल ने श्रीराम से कहा कि || १६५ || हे देव ! सीताके आप ही शरण हो और आप ही इसके सर्वोत्तम बान्धव हो । आप इसके हृदय में इस प्रकार विद्यमान रहे कि जिससे यह उद्वेगको प्राप्त न हो ॥१६६॥ उत्कृष्ट हृदयके धारक भामण्डलने उत्तम चेष्टाओंसे सुशोभित बहनका स्नेहवश आलिंगन कर उसे बार-बार उपदेश दिया || १६७ || माता विदेहाने भी सीताका आलिंगन कर कहा कि बेटी ! तू अपने सास-ससुरको प्रिय हो, तथा परिजनके साथ ऐसा व्यवहार कर कि जिससे प्रशंसाको प्राप्त हो । १६८ ।। तदनन्तर भामण्डल सब लोगोंसे पूछकर तथा मिथिलाका राज्य कनकलिए सौंपकर माता-पिताको साथ ले अपने स्थानपर चला गया || १६९|| गौतमस्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे मगधेश्वर ! पूर्वं भवमें किये हुए धर्मका यह माहात्म्य देखो । धर्मके माहात्म्यसे ही रामने विद्याधरोंका राजा भामण्डल - जैसा बन्धु प्राप्त किया, गुण तथा रूपसे परिपूर्ण सीता जैसी पत्नी प्राप्त की तथा देवोंके समूहसे अधिष्ठित कवच, हल, गदा आदिसे युक्त एवं देवोंके द्वारा दुर्लभ धनुष प्राप्त किये। लक्ष्मीका भाण्डार लक्ष्मण जैसा सेवक प्राप्त किया ॥ १७० - १७१ ॥ जो मनुष्य अत्यन्त विशुद्ध हृदयसे भामण्डलके इस इष्ट समागमको सुनता है सूर्यके समान प्रभाको धारण करनेवाला वह शुभात्मा मनुष्य चिरकाल तक इष्टजनोंके साथ समागम और आरोग्यको प्राप्त होता है ॥ १७२ ॥ इस प्रकार आनाम से प्रसिद्ध रविषेणाचार्य द्वारा कथित पद्मचरित में भामण्डलके समागमका वर्णन करनेवाला तीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ||३०|| 0 १. बिभ्रतं म । २. सुचेष्टितं म । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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