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________________ ३३ अष्टाविंशतितमं पर्व धनगोरत्नसंपूर्णा मदीया मिथिलापुरी । अर्द्धवर्वरकैम्लेंच्छैरवाध्यत सुदारुणः ॥१२७॥ अपीडयन्त प्रजाः सर्वाः स्वह्रियन्त धनोत्कराः । धर्मयज्ञा न्यवर्तन्त श्रावकाणां महात्मनाम् ॥१२८॥ ततो महाहवे जाते रक्षित्वा मां सहानुजम् । 'पद्मेन विजिता म्लेच्छा ये सुरैरपि दुर्जयाः ॥१२९॥ लक्ष्मणशानुजस्तस्य शक्रोपमपराक्रमः । कुरुते शासनं नित्यं महाविनयसंयुतः ॥१३॥ यदि नाम न तत्सैन्यं ताभ्यां स्याद् विजितं द्विषा । म्लेच्छलोकेन संपूर्णा ततः स्यादखिला मही ॥१३१॥ विवेकरहितास्ते हि लोकपीडामया इव । महोत्पाता इवात्यन्तभीषणा विषदारुणाः ॥३२॥ प्राप्य तौ गुणसंपूर्णी सुपुत्रौ लोकवत्सलो। इन्द्रवद्भवने राज्यं सुखं दशरथोऽमजत् ॥१३३॥ तस्य राज्येऽधुना जाते नयशीय विलासिनः । वातोऽपि नाहरत् किंचित् प्रजानां पुरुसंपदाम् ॥१३४॥ ततः प्रत्युपकारं कं करोमीति समाकुलः । न रात्रौ न दिवा निद्रा संप्राप्तोऽस्मि विचिन्तयन् ॥१३५॥ रक्षिता येन मे प्राणास्तस्य रामस्य नो समः । कश्चित् प्रत्युपकारोऽस्ति किमुताधिक्यगोचरः ॥१३६॥ हतं महोपकारेण प्रतीकारविवर्जितम् । मन्ये तणमिवात्मानं भोगप्रीतिपराङ्मुखः ॥१३७॥ नवयौवनसंपूर्णां दृष्ट्वा दुहितरं शुमाम् । गतो विरलतां शोकः शोकस्थानेऽपि मे ततः ॥१३८॥ तया कल्पितया तस्य रामस्य पुरुतेजसः । नावेव शोकजलधेस्तारितोऽहं सुजातया ॥१३९॥ ततो नभश्चरा ऊचूरन्धकारीकृताननाः । अहो मानुषमात्रस्य बुद्धिस्तव न शोभना ॥१४॥ अर्ध-राक्षसोंके समान अत्यन्त दुष्ट म्लेच्छोंने मेरी धन, धान्य, गाय, भैंस तथा अनेक रत्नसे परिपूर्ण मिथिला नगरीको बाधा पहुँचाना शुरू किया ॥१२७।। समस्त प्रजा पीड़ित होने लगी, धन-धान्यके समूह चुराये जाने लगे, और महानुभाव श्रावकोंके धार्मिक पूजा-विधान आदि अनुष्ठान नष्ट किये जाने लगे ॥१२८।। तदनन्तर उनके साथ मेरा महायुद्ध हुआ। सो उस महायुद्ध में रामने मेरो तथा मेरे छोटे भाईकी रक्षा कर देवोंसे भी दुर्जेय उन समस्त म्लेच्छोंको पराजित किया ॥१२९।। रामका छोटा भाई लक्ष्मण भी इन्द्रके समान महापराक्रमी तथा महा विनयसे सहित है। वह सदा रामकी आज्ञाका पालन करता है ।।१३०।। यदि उन दोनों भाइयोंके द्वारा म्लेच्छोंकी वह सेना नहीं जीती जाती तो निश्चित था कि यह समस्त पृथिवी म्लेच्छोंसे भर जाती ॥१३॥ वे म्लेच्छ विवेकसे रहित तथा लोगोंको पीडा पहुँचानेके लिए रोगोंके समान थे अथवा महा उत्पातके समान अत्यन्त भयंकर और विषके समान दारुण थे ॥१३२॥ गुणोंसे सम्पूर्ण तथा लोगोंसे स्नेह करनेवाले उन दोनों पुत्रोंको पाकर राजा दशरथ अपने भवनमें इन्द्र के समान राज्यसुखका उपभोग करते हैं ।।१३३।। नय और शूरवीरतासे सुशोभित राजा दशरथके राज्यमें इस समय हवा भी सम्पत्तिशाली प्रजाका कुछ हरण नहीं कर पाती है फिर अन्य मनुष्योंकी तो बात ही क्या है ? ॥१३४॥ __इस उपकारके बदले मैं उनका क्या उपकार करूँ इसी बातकी आकुलतासे चिन्ता करते हुए मुझे न रातमें नोंद है न दिनमें ही ।।१३५।। रामने मेरे प्राणोंकी जो रक्षा की है उस समान भी कोई प्रत्युपकार नहीं है फिर अधिककी तो चर्चा ही क्या है ? ||१३६।। जो महान् उपकारसे दबा हुआ है तथा स्वयं कुछ भी प्रत्युपकार करनेमें असमर्थ है, ऐसे अपने आपको मैं तृणके समान तुच्छ समझता हूँ। मैं केवल भोगोंके भवसे पराङ्मुख हो रहा हूँ ॥१३७॥ तदनन्तर जब मेरी दृष्टि नवयौवनसे सम्पूर्ण अपनी शुभ पुत्री पर पड़ी तब शोकके स्थानमें भी मेरा शोक विरलताको प्राप्त हो गया ॥१३८॥ मैंने अतिशय प्रतापी रामचन्द्रजीके लिए उसको देना संकल्पित कर लिया और नावकी भांति इस पुत्रीने मुझे शोकरूपी सागरसे पार कर दिया ॥१३९।। तदनन्तर जिनके मुखोंपर अन्धकार छा रहा था ऐसे विद्याधर बोले कि अहो ! तुम एक १. रामेण । २. पुरसम्पदाम् ख.। ३. भोगभीति म.। २-५ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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