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________________ ३७२ पद्मपुराणे ततस्तिर्यक्षु सुचिरं भ्रान्त्वा विविधयोनिषु । कृच्छ्रान्मनुष्यतां प्राप्ती तापसत्वमुपागती ।।१४।। बृहजटौ बृहत्कायो फलपर्णादिभोजिनौ । तपोभिः कर्शितौ तीवैः कुज्ञाने द्वौ मृतौ च तौ ॥१५॥ क्रमादरिंजरे जातावशिन्याः कुक्षिसंभवौ । पुत्रौ वह्निकुमारस्य विजयाद्धस्य दक्षिणे ॥१६॥ आशुकारासुराकाराविमौ जगति विश्रुतौ । हस्तग्रहस्तनामानौ सचिवौ रक्षसां विभोः ॥१७॥ पूर्वी तु प्रच्युतौ नाकात् सुमनुष्यत्वमागतौ । गृहाश्रमे तपः कृत्वा पुनर्जातौ सुरोत्तमौ ॥१८॥ पुण्यक्षयात् परिभ्रष्टौ स्वर्गादिन्धकपल्लवौ । किकुसंज्ञे पुरे जाती नलनीली महाबलौ ॥१९॥ यत्तद्धस्तप्रहस्ताभ्यां नलनीलो भवान्तरे । निहती फलमेतस्य परावृत्य तदागतम् ॥२०॥ हतवान् हन्यते पूर्व पालकः पाल्यतेऽधुना। औदासीन्यमुदासीने जायते प्राणधारिणाम् ॥२१॥ यं वीक्ष्य जायते कोपो दृष्टकारणवर्जितः । निःसंदिग्धं परिज्ञेयः स रिपुः पारलौकिकः ॥२२॥ यं वीक्ष्य जायते चित्तं प्रह्लादि सह चक्षुषा । असंदिग्धं सुविज्ञेयो मित्रमन्यत्र जन्मनि ॥२३॥ क्षुब्धोर्मिणि जले सिन्धोः शीर्णपोतं झपादयः । स्थले म्लेच्छाश्च बाधन्ते यत्तद्दुःकृतजं फलम् ॥२४॥ मत्तैर्गिरिनिर्भननिर्योधैर्बहुविधायुधः । सुवेगैर्वाजिभिप्तभृत्यैश्च कवचावृतैः ॥२५।। विग्रहेविग्रहे वापि नि:प्रमादस्य संततम् । जन्तोः स्वपुण्यहीनस्य रक्षा नैवोपजायते ॥२६॥ निरस्तमपि नियन्तं यत्र तत्र स्थितं परम् । तपोदानानि रक्षन्ति न देवा न च बान्धवः ॥२७॥ करनेवाले पापी प्राणियों की ऐसी ही गति होती है ।।१३॥ तदनन्तर तिर्यंचोंकी नाना योनियोंमें चिरकाल तक भ्रमण कर दोनों बड़ी कठिनतासे मनुष्य पर्याय प्राप्त कर तापस हुए ॥१४॥ वहाँ वे बड़ी-बड़ी जटाएँ रखाये हुए थे, डील-डौलके विशाल थे, फल तथा पत्ते आदिका भोजन करते थे और तीव्र तपस्यासे दुर्बल हो रहे थे। मिथ्याज्ञानके समय ही दोनोंकी मृत्यु हुई ॥१५॥ दोनों ही मरकर विजया, पर्वतके दक्षिणमें वह्निकुमार विद्याधरकी अश्विनी नामा स्त्रीको कुक्षिसे दो पुत्र हुए ।।१६।। ये दोनों ही शीघ्रतासे कार्य करनेवाले असुरोंके समान आकारके धारक थे, जगत्में अतिशय प्रसिद्ध थे तथा आगे चलकर रावणके इस्त, प्रहस्त नामक मन्त्री हुए थे ॥१७॥ पहले जिनका कथन कर आये हैं ऐसे इन्धक और पल्लवक स्वर्गसे च्युत होकर उत्तम मनुष्य पर्यायको प्राप्त हुए । तदनन्तर गृहस्थाश्रममें ही तपकर दोनों उत्तम देव हुए ।।१८। फिर पुण्यका क्षय होनेसे स्वर्गसे च्युत हो किष्कु नामक नगरमें महाबलके धारक नल और नोल हुए ।।१९।। हस्त और प्रहस्तने भवान्तरमें जो नल और नीलको मारा था इसका फल लौटकर इस भवमें उन्हींको प्राप्त हुआ अर्थात् उनके द्वारा वे मारे गये ॥२०॥ पूर्वभवमें जो जिसे मारता है वह इस भवमें उसके द्वारा मारा जाता है, पूर्वभवमें जो जिसकी रक्षा करता है वह इस भवमें उसके द्वारा रक्षित होता है तथा पूर्वभवमें जो जिसके प्रति उदासीन रहता है वह इस भवमें उसके प्रति उदासीन रहता है ।।२१।। जिसे देखकर अकारण क्रोध उत्पन्न होता है उसे निःसन्देह परलोक सम्बन्धी शत्रु जानना चाहिए ॥२२।। और जिसे देखकर नेत्रोंके साथ-साथ मन आह्लादित हो जाता है उसे निःसन्देह पूर्वभवका मित्र जानना चाहिए ॥२३।। समुद्रके लहराते जलमें जर्जर नाववाले मनुष्यको जो मगर, मच्छ आदि बाधा पहुँचाते हैं तथा स्थलमें म्लेच्छ पीड़ा पहुंचाते हैं वह सब पापकर्मका फल है ॥२४॥ पर्वतोंके समान मदोन्मत्त हाथियों, नाना प्रकारके शस्त्र धारण करनेवाले योद्धाओं, तीव वेगके धारक घोड़ों एवं कवच धारण करनेवाले अहंकारी भृत्योंके साथ युद्ध हो अथवा नहीं हो और आप स्वयं सदा प्रमादरहित सावधान रहे तो भी पुण्यहीन मनुष्यकी रक्षा नहीं होती ॥२५-२६।। इसके विपरीत पुण्यात्मा मनुष्य जहाँसे हटता है, जहाँसे बाहर निकलता है १. आशुकारशराकाशै ज. ख., आशुकारशुराकारो क. । २. उदासीन- म. । ३. चक्षुषाम् म.। ४. शीर्णे पोतं म. 1 ५. नियतं म. । ६. स्थिरं म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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