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________________ पद्मपुराणे ततस्तदिङ्गितं ज्ञात्वा सौमित्रिरिदमब्रवीत् । किं शोचसि महाबुद्धे कर्तव्ये दीयतां मनः ॥ २५ ॥ लक्ष्य दीर्घसूत्रत्वं किष्किन्धनगरप्रभोः । कृताह्वानश्च भूयोऽपि सीता भ्राता चिरायति ॥ २६॥ 'दशास्यकस्य नगरीं श्वो गन्तास्म विसंशयम् । नौभिरर्णवमुत्तीर्य बाहुभ्यामेव वा द्रुतम् ॥२७॥ अथोचे सिंहनादाख्यो मधुरो खेचरो महान् । अभिमानिसमं मैवं भाषिष्ठोः कोविदो भवान् ॥ २८ ॥ भवतो या गतिः सैव जातास्माकमिहाधुना । अतो निरूप्य कर्तव्यं सर्वेभ्यो हितमादरात् ॥ २९ ॥ गत्वा पवनपुत्रेण सप्राकाराहि गोपुरा । लङ्का विध्वंसिता तेन सोद्यानोपवनान्विता ॥ ३०॥ अधुना रावणे क्रुद्धे महाविद्याधराधिपे । संघातमृत्युरस्माकं संप्राप्तोऽयं विधेवंशात् ॥३१॥ ऊचे चन्द्रमरीचिश्व परं वचनमूर्जितम् । किं त्वं हरेरिव प्राप्तः संत्रासं मृगवस्परम् ॥३२॥ बिभेति दशवक्त्रा ह्नः" को वासौ किं प्रयोजनम् । अन्यायकारिणस्तस्य वर्तते मृत्युरग्रतः ॥ ३३ ॥ अस्माकं बहवः सन्ति खेचरेन्द्रा महारथाः । विद्याविभवसंपन्नाः कृताश्चर्याः सहस्रशः ॥ ३४ ॥ ख्यातो घनगतिस्तोत्रो भूतनादो गजस्वनः । क्रूरः केली किलो मीमः कुण्डो गोरतिरङ्गदः ॥ ३५॥ नलो नीलो तद्विक्त्रो मन्दरोऽशनिरर्णवः । चन्द्रज्योतिर्मृगेन्द्राह्नो वज्रदंष्ट्रो दिवाकरः ॥ ३६॥ उल्कालाङ्गलदिव्यास्त्रप्रत्यूहोज्झितपौरुषः । हनूमान् सुमहाविद्यः प्रमामण्डलसुन्दरः ॥३७॥ महेन्द्रकेतुरस्युग्रसमीरणपराक्रमः । प्रसन्नकीर्तिरुद्वृत्तः सुतास्तस्य महाबलाः ||३८|| 1 ३४६ गरम सांस भरकर अपने जीवनकी अनेक प्रकारसे अत्यधिक निन्दा करने लगे ||२४|| तदनन्तर उनकी चेष्टा जानकर हनुमान्ने यह कहा कि हे महाबुद्धिमान् ! शोक क्यों करते हो ? कर्तव्य में मन दीजिए ||२५|| किष्किन्ध नगरके राजा सुग्रीवकी दीर्घसूत्रता जान पड़ती है और सीताका भाई भामण्डल बार-बार बुलानेपर भी देर कर रहा है ||२६|| इसलिए हम लोग नौकाओं अथवा भुजाओंसे ही शीघ्र समुद्रको तैरकर कल ही निःसन्देह नीच रावणकी नगरी लंकाको चलेंगे ||२७॥ तदनन्तर सिंहनाद नामक महाबुद्धिमान् विद्याधरने कहा कि इस तरह अभिमानीके समान मत कहो । आप विद्वान् पुरुष हैं ||२८|| आपकी जो दशा लंकामें हुई है वही इस समय यहाँ हम ariat होगी इसलिए आदरपूर्वक सब कुछ निश्चय कर हितकारी कार्य करना चाहिए ||२९|| पवनपुत्र हनुमान्ने कोट, अट्टालिकाएँ तथा गोपुरोंसे सहित एवं बाग-बगीचोंसे सुशोभित लंकापुरीको नष्ट किया है ||३०|| इसलिए महाविद्याधरोंका अधिपति रावण इस समय क्रुद्ध हो रहा है और उसके क्रुद्ध होनेपर दैववश हम सबको यह सामूहिक मृत्यु प्राप्त हुई है ॥ ३१॥ तदनन्तर चन्द्रमरीचि नामक विद्याधरने अत्यन्त ओजपूर्ण वचन कहे कि क्या तुम सिंह से हरिणके समान अत्यन्त भयको प्राप्त हो रहे हो ? ||३२|| भयभीत तो रावणको होना चाहिए अथवा वह कौन है और उससे क्या प्रयोजन है ? उसने अन्याय किया है इसलिए मृत्यु उसके आगे नाच रही है ||३३|| हमारे पास ऐसे बहुत विद्याधर राजा हैं जो महावेगशाली हैं तथा जिन्होंने हजारों बार अपने चमत्कार दिखाये हैं ||३४|| उनके नाम हैं घनगति, तीव्र, भूतनाद, गजस्वन, क्रूर, केलीकिल, भीम, कुण्ड, गोरति, अंगद, नल, नील, तडिद्वक्त्र, मन्दर, अशनि, अर्णव, चन्द्रज्योति, मृगेन्द्र, वज्रदंष्ट, दिवाकर, उल्का और लांगूल नामक दिव्य अस्त्रोंके समूहमें निर्वाध पौरुषको धारण करनेवाला हनुमान्, महाविद्याओंका स्वामी भामण्डल, तीक्ष्ण पवनके समान पराक्रमका धारक महेन्द्रकेतु, अद्भुत पराक्रमी प्रसन्नकीर्ति और उसके महाबलवान् पुत्र । इनके १. 'दशास्य नगरीं श्वो हि गन्तास्मेति विसंशयम्' म. । २. भाषिष्ट म. । ३. सप्ताकाराद्रिगोपुरा म । ४. वक्त्राख्यः ख । ५. गोरविरंगदः ज. | Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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