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________________ ३१८ पद्मपुराणे तं दृष्ट्वा मारुतिर्दध्यावहो नाथेन रक्षसाम् । दाक्षिण्यमुज्झितं पूर्व मायाप्राकारकारिणा ॥१५॥ उन्मूलयन्निदं यन्त्र विद्याबलसमूर्जितम् । मानमुन्मूलयाम्यस्य ध्यानी मोहमलं यथा ॥१६॥ युद्धे च मानसं कृत्वा तत्सैन्यं स्वं महास्वनम् । गगने सागराकारं समयेऽतिष्ठिपत् सुधीः ॥१७॥ विद्याकवचयुक्तं च कृत्वात्मानं गदाकरः । विवेश सालिकावक्त्रं राहुवक्त्रं रविर्यथा ॥१८॥ ततः कुक्षिगुहां तस्याः परीतकैकसावृताम् । विद्यानखैरलं तीक्ष्णः केसरीव व्यपाटयत् ॥१९॥ निर्दयैश्च गदाघातै|रघोषैरचूर्णयत् । घातिकर्मस्थितिं यद्वयानी भावैः सुनिर्मलैः ॥२०॥ अथाशालिकविद्याया यात्या भेदं भयावहम् । समो नीलाम्बुवाहानामभूच्चटचटाध्वनिः ॥२१॥ तेन संभाव्यमानोऽसौ शालो नष्टोऽतिचञ्चलः । स्तोत्रेणेव जिनेन्द्राणां कलुषः कर्मसंचयः ॥२२॥ ततस्तन्निनदं श्रुत्वा युगान्तजलदोन्नतम् । दृष्ट्वा विशीयमाणं च यन्त्रप्राकारमण्डलम् ॥२३॥ 'राजन् वज्रमुखः ऋद्धः शालरक्षाधिकारवान् । त्वरितं रथमारुह्य सिंहो दावमिवाभ्यगात् ॥२४॥ ततोऽभिमुखमेतस्य वीक्ष्य मारुतनन्दनम् । नानायानयुधा योधाः प्रचण्डा यो मुद्यताः ॥२५॥ बलं वाज्रमुखं दृष्ट्वा प्रबलं योद्धमुद्यतम् । परमं क्षोभमायातं हनूमत्सैन्यमुत्थितम् ॥२६॥ किमत्र बहुनोक्तेन प्रवृत्तं तत्तथा रणम् । यथा स्वामिकते पूर्व सन्माननविमानने ॥२७॥ लंकाके कोटका घेरा सूर्यके मार्ग तक ऊँचा है, दुर्लध्य है, दुनिरीक्ष्य है, सब दिशाओंमें फैला है, प्रलयकालीन मेघसमूहकी गर्जनाके समान तीक्ष्ण गर्जनासे भयंकर है, तथा हिंसामय शास्त्रके समान अत्यन्त पापकर्मा जनोंके द्वारा निर्मित है ।।१३-१४॥ उसे देखकर हनुमान्ने विचार किया कि अहो ! मायामयी कोटका निर्माण करनेवाले रावणने अपनी पहलेकी सरलता छोड़ दी है|१५|| मैं विद्याबलसे बलिष्ठ इस यन्त्रको उखाडता हआ इसके मानको उस तरह उखाड दूंगा. जिस तर कि ध्यानी मनुष्य मोहको उखाड़ देता है ।।१६।। तदनन्तर बुद्धिमान् हनुमानने युद्ध में मन लगाकर अर्थात् युद्धका विचार कर अपनी गरजती हुई समुद्राकार सेनाको तो संकेत देकर आकाशमें खड़ा कर दिया और अपने स्वयं विद्यामय कवच धारण कर तथा गदा हाथमें ले पुतलीके मुख में उस तरह घुस गया जिस तरह कि राहुके मुख में सूर्य प्रवेश करता है ॥१७-१८॥ तत्पश्चात् चारों ओरसे हड्डियोंसे आवृत उस पुतलीकी उदररूपी गुहाको उसने सिंहकी भांति विद्यामयी तीक्ष्ण नखोंसे अच्छी तरह चीर डाला ॥१९॥ और भयंकर शब्द करनेवाले गदाके निर्दय प्रहारोंसे उसे उस प्रकार चूर-चूर कर डाला जिस प्रकार कि ध्यानी मनुष्य अपने अतिशय निर्मल भावोंसे घातिया कर्मोंकी स्थितिको चूर-चूर कर डालता है ।।२०।। तदनन्तर भंगको प्राप्त होती हुई आशालिक विद्याका नील मेघोंके समान भयंकर चट-चट शब्द हुआ ।।२१। उस शब्दसे यह अतिशय चंचल मायामय कोट इस प्रकार नष्ट हो गया जिस प्रकार कि जिनेन्द्र भगवानकी स्तुतिसे पापकर्मोका समह नष्ट हो जाता है ॥२२॥ __ तदनन्तर प्रलयकालके मेघोंके समान उन्नत उस शब्दको सुनकर तथा यन्त्रमय कोटको नष्ट होता देख, कोटकी रक्षाका अधिकारी वज्रमुख नामका राजा कुपित हो शीघ्र ही रथ पर आरूढ़ हो हनुमान्के सन्मुख उस प्रकार आया जिस प्रकार कि सिंह दावानलके सम्मुख जाता है ।।२३-२४।। तदनन्तर हनुमान्को उसके सन्मुख देख, नाना प्रकारके वाहनों और शस्त्रोंसे सहित प्रचण्ड योधा युद्ध करनेके लिए उद्यत हुए ॥२५।। इधर वज्रमुखकी प्रबल सेनाको युद्ध के लिए उद्यत देख परम क्षोभको प्राप्त हुई हनुमान्को सेना भी युद्ध के लिए उठी ।।२६।। आचार्य कहते हैं कि इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या? उन दोनों सेनाओमें उस तरह युद्ध हुआ जिस तरह कि पहले १. -मूर्जितं म.। २. -कारिणां म.। ३. मोहबलं म., ख.। ४. सुमहास्वन म.। ५. कृत्वा मानं म. । ६. राजा म. । ७. वज्रमुखं म. । ८. सस्मावन म., ब.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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