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________________ ३१६ पद्मपुराणे साधु साध्विति संस्मित्य ततो मारुतिरब्रवीत् । 'मवतीनां श्रमः इलाध्यः फलयुक्तश्च निश्चयः ।।४२।। अहो वो विमला बुद्धिरहो स्थाने मनोरथः । अहो भव्यत्वमुत्तङ्गं येन विद्या प्रसाधिता ॥४३॥ आख्यातं च क्रमात् सर्व यथावृत्तं सविस्तरम् । पद्मागमादिकं यावदारमागमनकारणम् ॥४४॥ तत्तश्च श्रुतवृत्तान्तो गन्धवोऽमरया सह । समागतो महातेजास्तमुद्देशं सहानुगः ॥४५॥ नभश्चरसमायोगे देवागमनसंनिभे । क्षणेन तदनं जातं सर्व नन्दनसुन्दरम् ॥४६॥ किष्किन्धं च पुरं गत्वा भूत्या दुहितृभिः समम् । शासने पद्मनामस्य गन्धर्वो रतिमाश्रयत् ॥४७॥ ताश्च निस्सीमसौमाग्या विभूत्या परयान्विताः। उपनिन्ये पराः कन्या रामायाक्लिष्टकर्मणे ॥४८॥ एताभिरपराभिश्च सेव्यमानो विभूतिभिः । अपश्यन् जानकी पद्मो मेने शून्या दिशो दश ॥४९।। अतिरुचिरावृत्तम् गुणान्वितैर्भवति जनरलंकृता समस्तभूः शमललितैः ससन्दरैः । विना जनं मनसि कृतास्पदं सदा व्रजत्यसौ गहनवनेन तुल्यताम् ।।५।। पुरातादतिलिचितात् समुत्कटाजनः परां रतिमनुयाति कर्मणः । ततो जगत्सकलमिदं स्वगोचरे प्रवर्तते विधिरविणा प्रकाशते ॥५१॥ इत्याचे रविषेणाचार्यप्रोक्त पद्मपुराणे पद्मस्य गन्धर्वकन्यालाभाभिधानं नाम एकपञ्चाशत्तमं पर्व ।।५१.। तदनन्तर हनुमान्ने 'ठीक है' 'ठोक है' इस तरह मन्दहास पूर्वक कहा कि आप लोगोंका श्रम प्रशंसनीय है तथा निश्चित हो फलसे युक्त है ।।४२।। अहो ! तुम सबको बुद्धि निर्मल है । अहो! तुम सबका मनोरथ योग्य स्थानमें लगा। अहो ! तुम्हारी उत्तम होनहार थी जिससे यह विद्या सिद्ध की ।।४३।। तत्पश्चात् हनुमान्ने रामके आगमनको आदि लेकर अपने यहाँ आने तकका समस्त वृत्तान्त ज्योंका त्यों विस्तारके साथ क्रमपूर्वक कहा ॥४४॥ तदनन्तर समाचार सुनकर महातेजस्वी गन्धर्व राजा अपनी अमरा नामकी रानी और अनुचरोंके साथ वहाँ आ पहुँचा ॥४५॥ इस प्रकार क्षण-भरमें वह समस्त वन देवागमनके समान विद्याधरोंका समागम होनेसे नन्दन वनके समान हो गया ॥४६॥ तदनन्तर राजा गन्धर्व पुत्रियोंको साथ ले बड़े वैभवसे किष्किन्धपुर गया और वहाँ रामकी आज्ञामें रहकर प्रीतिको प्राप्त हुआ ।।४७।। उसने असीम सौभाग्यकी धारक तथा परम विभूतिसे युक्त तीनों उत्कृष्ट कन्याएँ शान्त चेष्टाके धारक रामके लिए समर्पित कीं ॥४८॥ सो राम इन कन्याओंसे तथा अन्य विभतियोंसे यद्यपि सेव्यमान रहते थे तथापि सीताको न देखते हुए वे दशों दिशाओंको शून्य मानते ॥४९।। गौतम स्वामी कहते हैं कि यद्यपि समस्त भूमि गुणोंसे सहित, शुभ चेष्टाओंके धारक तथा अतिशय सुन्दर मनुष्योंसे अलंकृत रहे तो भी मनमें वास करनेवाले मनुष्यके बिना वह भूमि गहन वन की तुल्यता धारण करती है ।।५०|| पूर्वोपार्जित तथा तीव्र रूपसे बन्धको प्राप्त हुए उत्कट कर्मसे यह जीव परम रतिको प्राप्त होता है और उस रतिके कारण यह समस्त संसार अपने अधीन रहता है तथा कर्मरूपी सूर्यसे प्रकाशमान होता है॥५१॥ इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणा वार्यकथित पद्मपुराणमें रामको गन्धर्व कन्याओंकी प्राप्तिका वर्णन करनेवाला इक्यावनवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥५॥ १. 'भवतीनां श्रमः' इत्यारभ्य 'अहो वो विमला बुद्धिरहो स्थाने मनोरथः' इत्यन्तः पाठः ख. पुस्तके नास्ति । २. जनैः म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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