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________________ पश्चचत्वारिंशत्तमं पर्व २४५ परस्परकृताह्वानैरति संहर्षिभिर्भटैः । संकुलैर्जनिते युद्धे कृत्तान्योन्यमहायुधैः ॥१३॥ रणाजिरे परं तेजो मजमानो नवं नवम् । दिव्यकार्मुकमुद्यम्य शरच्छन्नदिगम्बरः ॥१४॥ खरेण सह संग्रामं चक्रे परमभैरवम् । लक्ष्मीधरः शुनासीरः स्वामिनेव सुरद्विषाम् ॥१५॥ ततः क्रोधपरीतेन खरेण खरनिस्वनम् । अवाचि लक्ष्मणः संख्ये स्फुरल्लोहितचक्षुषा ॥१६॥ ममात्मजमुदासीनं हत्वा परमचापल-। कान्ताकुचौ च संमृश्य पापाद्यापि क गम्यते ॥१७॥ अद्य ते निशितैर्बाणीवितं नाशयाम्यहम् । कृत्वा तथाविधं कर्म फलं तस्यानुभयताम् ॥१८॥ अत्यन्तक्षद्र निर्लज परस्त्रीसंगलोलुप । ममाभिमुखतां गत्वा परलोक बजाधुना ।।१९।। ततस्तैः परुषैर्वाक्यैः समुद्दीपितमानसः । उवाच लक्ष्मणो वाचं पूरयन् सकलं नभः ॥२०॥ किं वृथा गर्जसि क्षुद्र दुःखेचरः शुना समः । अहं नयामि तत्र त्वां यत्र ते तनयो गतः ॥२१॥ इत्युक्त्वावस्थितं व्योम्नि विरथं खरदूषणम् । चकार लक्ष्मणः छिन्नचापकेतं च निःप्रभम् ॥२२॥ ततोऽसौ पतित: क्षोण्यां नमस्तः क्रोधलोहितः । प्रक्षोणेष्विव पुण्येषु ग्रहस्तरलविग्रहः ॥२३॥ खड़गांशुलीढंदेहश्च सौमित्रिं प्रत्यधावत । असिरत्नं समाकृष्य सोऽप्यस्यामिमुखं ययौ ॥२४॥ इत्यासन्नं तयोरासीच्चित्रं युद्धं भयानकम् । मुमुचुः स्वस्थिता देवाः सपुष्पान् साधुनिस्वनान् ॥२५॥ तावच्छिरसि संक्रुद्धो दूषणस्य न्ययातयत् । सूर्यहासं यथार्थाख्यं लक्ष्मणोऽक्षतविग्रहः ॥२६॥ गये ॥१२॥ तदनन्तर जो परस्पर एक दूसरेको बुला रहे थे, जो अत्यन्त हर्षित हो रहे थे, जो अत्यन्त संकुल-व्यग्र थे और जिन्होंने एक दूसरेके बड़े-बड़े शस्त्र काट दिये थे ऐसे योद्धाओंके द्वारा उधर महायुद्ध हो रहा था इधर रणके मैदान में नवीन-नवोन परम तेजको धारण करनेवाला लक्ष्मण, दिव्यधनुष उठाकर बाणोंसे दिशाओं और आकाशको व्याप्त करता हुआ खरके साथ उस तरह अत्यन्त भयंकर युद्ध कर रहा था जिस तरह कि इन्द्र दैत्येन्द्र के साथ करता था ॥१३-१५|| तदनन्तर क्रोधसे व्याप्त एवं चंचल और लाल-लाल नेत्रोंको धारण करनेवाले खरदूषणने कठोर शब्दोंमें लक्ष्मणसे कहा कि हे अतिशय चपल पापी ! मेरे निर्वैर पुत्रको मारकर तथा मेरी स्त्रीके स्तनोंका स्पर्श कर अब तू कहाँ जाता है ? ||१६-१७|| आज तीक्ष्ण बाणोंसे तेरा जीवन नष्ट करता हूँ। तूने जैसा कम किया है वैसा फल भोग ।।१८।। हे अत्यन्त क्षुद्र ! निर्लज्ज ! परस्त्री संगका लोलुप ! अब मेरे सम्मुख आकर परलोकको प्राप्त हो ||१९|| __ तदनन्तर उन कठोर वचनोंसे जिनका मन प्रदीप्त हो रहा था ऐसे लक्ष्मणने समस्त आकाशको गुंजाते हुए निम्नांकित वचन कहे। उन्होंने कहा कि रे क्षुद्र विद्याधर ! तू कुत्तेके समान व्यर्थ ही क्यों गरज रहा है ? मैं जहाँ तेरा पुत्र गया है वहीं तुझे पहुंचाता हूँ ॥२०-२१|| इतना कहकर लक्ष्मणने आकाशमें स्थित खरदूषणको रथरहित कर दिया, उसका धनुष और पताका काट डाली तथा उसे निष्प्रभ कर दिया ॥२२॥ तदनन्तर जिस प्रकार पुण्यके क्षीण होनेपर चंचल शरीरको धारण करनेवाला ग्रह पृथिवीपर आ पड़ता है उसी प्रकार क्रोधसे लाल-लाल दीखनेवाला खरदूषण आकाशसे पृथिवीपर नीचे आ पड़ा ।।२३।। खड्गकी किरणोसे जिसका शरीर व्याप्त हो रहा था ऐसा खरदूषण लक्ष्मणको ओर दौड़ा और लक्ष्मण भी सूर्यहास खड्ग खींचकर उसके सामने जा डटे ॥२४॥ इस प्रकार उन दोनोंमें निकटसे नाना प्रकारका भयंकर युद्ध हुआ तथा स्वर्गमें स्थित देवोंने साधु-साधु-धन्य-धन्य शब्दोंके साथ उनपर पुष्पोंकी वर्षा की ।।२५।। उसी समय अखण्डित शरीरके धारक लक्ष्मणने कुपित हो खरदूषणके सिरपर यथार्थ नामवाला सूर्यहास खड्ग गिराया ॥२६॥ १. रिति म. । २. कृतान्योन्य म. । ३. युद्धे । ४. दुष्टः खेचरः दुःखेचरस्तत्सम्बुद्धी हे दुःखेचर । ५. लीनदेहश्च म. । ६. चित्रयुद्ध म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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