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________________ २३६ पद्मपुराणे 3 अयमस्य महान् लाभो निघ्नतस्तस्य तानभूत् । 'यदूर्ध्वगैः शरैर्योधान् विव्याध सहवाहनान् ॥५८॥ अत्रान्तरे प्रतिप्राप्तः पुष्पकस्थो दशाननः । क्रुद्धः कृताशयो हन्तुं शम्ब कवधकारिणम् ||५९|| अपश्यच्च महामोहसंप्रवेशनकारिणीम् । रत्यरत्योः समुद्धर्त्री साक्षालक्ष्मीमिव स्थिताम् ||६०| चन्द्रमःकान्तवदनां बन्धूकाभवराधराम् । तनूदरीं च लक्ष्मीं च जलजच्छद लोचनाम् ॥ ६१॥ नहेभकुम्भशिखरप्रोत्तुङ्गविपुलस्तनीम् । यौवनोदयसंपन्नां सर्वस्वीगुणसद्गताम् ॥ ६२ ॥ संहितामिव कामेन कान्तिज्यां दृष्टिसायकाम् । निजां चापलतां हन्तुं सुखेनैव यथेप्सितम् || ६३॥ सर्वस्मृतिमहाचारी रूपातिशयवर्तिनीम् । सीतां मनोभवोदारज्वरग्रहणकारिणीम् ॥ ६४॥ तस्यामीक्षितमात्रायां क्रोधोऽस्य प्रलयं गतः । अजायतापरो भावश्चित्रा हि मनसो गतिः ॥ ६५॥ अचिन्तयच्च किं नाम जीवितं मेऽनया विना । अयुक्तस्यानया का वा श्रीमंदीयस्य वेश्मनः ॥ ६६ ॥ इमामप्रतिमाकारां ललितां नवयौवनाम् । हराम्यद्यैव यावन्नो कचिज्ज्ञानात्युपागतम् ॥६७॥ आरब्धुं प्रसमं कार्यं न मे शक्तिर्न विद्यते । किन्त्विदमीदृशं वस्तु यत्कौपीनत्वमर्हति || ६८ || निवेदयन् गुणांस्तावल्लोकेऽलं याति लाघवम् । ईदृशान् किं पुनर्दोषान् ख्यापयन्नो प्रियो भवेत् ॥ ६९ ॥ वितत्य सकलं लोकं शशाङ्ककरनिर्मला । कीर्तिर्व्यवस्थिता माभूत् सैवं सति मलीमसा ॥७०॥ तस्मादकीर्तिसंभूतिमकुर्वन् स्वार्थं तत्परः । रहःप्रयत्नमारेभे लोको हि परमो गुरुः ||११|| बड़े-बड़े हाथी-घोड़ों के साथ-साथ नीचे गिरने लगे तथा ओठोंको डँसनेवाले बड़े-बड़े योद्धा भयंकर शब्द करने लगे ||५७|| उन सबको मारते हुए लक्ष्मणको यह बड़ा लाभ हुआ कि वे ऊपरकी ओर जानेवाले बाणोंसे योद्धाओंको उनके वाहनोंके साथ ही छेद देते थे अर्थात् एक ही प्रहार में वाहन और उनके ऊपर स्थित योद्धाओंको नष्ट कर देते थे || ५८ ॥ तदनन्तर इसी बीचमें शम्बूकके वधकर्ताको मारनेके लिए विचार करनेवाला, क्रोधसे भरा रावण पुष्पक विमानमें बैठकर वहां आया || ५९ || आते ही उसने महामोहमें प्रवेश करानेवाली तथा रति और अरतिको धारण करनेवाली साक्षात् लक्ष्मीके समान स्थित सीताको देखा || ६०|| उस सीताका मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर था, वह बन्धूक पुष्पके समान उत्तम ओष्ठोंको धारण करनेवाली थी, कृशांगी थी, लक्ष्मी के समान थी, कमलदलके समान उसके नेत्र थे || ६१ || किसी बड़े हाथीके गण्डस्थलके अग्रभाग के समान उन्नत तथा स्थूल स्तन थे, वह यौवन के उदयसे सम्पन्न तथा समस्त स्त्री गुणोंसे सहित थी ||६२|| वह ऐसी जान पड़ती थी मानो इच्छित पुरुषको अनायास ही मारनेके लिए कामदेव के द्वारा धारण की हुई अपनी धनुषरूपी लता ही हो । कान्ति ही उस धनुषरूपी लताकी डोरी थी और नेत्र हो उसपर चढ़ाये हुए बाण थे || ६३ || वह सबकी स्मृतिको चुरानेवाली थी, अत्यन्त रूपवती थी और कामरूपी महाज्वरको उत्पन्न करनेवाली थी ||६४ || उसे देखते ही रावणका क्रोध नष्ट हो गया और दूसरा ही भाव उत्पन्न हो गया सो ठीक ही है क्योंकि मनकी गति विचित्र है || ६५ || वह विचार करने लगा कि इसके बिना मेरा जीवन क्या है ? और इसके विना मेरे घर की शोभा क्या है ? ||६६ || इसलिए जबतक कोई मेरा आना नहीं जान लेता है तबतक आज ही मैं इस अनुपम, नवयौवना सुन्दरीका अपहरण करता हूँ || ६७॥ यद्यपि इस कार्यको बलपूर्वक सिद्ध करने की शक्ति मुझमें विद्यमान है किन्तु यह कार्य ही ऐसा है कि छिपानेके योग्य है || ६८ || लोकमें अपने गुणोंको प्रकट करनेवाला मनुष्य भी अत्यधिक लघुताको प्राप्त होता है फिर जो इस प्रकार के दोषोंको प्रकट करनेवाला है वह प्रिय कैसे हो सकता है ? || ६९ || मेरी चन्द्रमाको किरणोंके समान निर्मल कीर्ति समस्त संसार में व्याप्त होकर स्थित है सो वह ऐसा काम करनेपर मलिन न हो जाये ॥७०॥ इसलिए अकीर्तिकी उत्पत्तिको बचाता हुआ वह स्वार्थंसिद्ध करनेमें १. यदर्धर्गः म. । २. योद्धान् म. । ३. समुद्धात्रीं म । ४. घराघरां म । ५. जलदच्छद- म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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