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________________ २२४ पद्मपुराणे पादपानां किमेतेषां स्फुटकुसुमधारिणाम् । अहोस्विन्मम देहस्य कुसुमोस्करशायिनः ॥१४॥ वैदेद्या संगतो रामः किमुतोपरि तिष्ठति । किंवा कश्चित्समायातो भवेदत्र त्रिविष्टपी ॥१५॥ ततो मगधराजेन्द्रः पप्रच्छ श्रमणोत्तमम् । भगवन् कस्य गन्धोऽसौ चक्रे विस्मयनं हरेः ॥१६॥ ततो गणधरोऽवोचजज्ञातलोकविचेष्टितः । संदेहतिमिरादित्यः पापधूलीसमीरणः ॥१७॥ द्वितीयस्य जिनेन्द्रस्य धुनिवाससमागमे । विद्याधराय विग्नाय याताय शरणं विभुम् ॥१८॥ राक्षसानामधीशेन महाभीमेन धीमता । अम्मोदवाहनायासीत्कृपयेत्युदितो वरः ॥१९॥ विपुले राक्षसद्वीपे त्रिकूटं नाम पर्वतम् । मेघवाहनविश्रब्धो गच्छ दक्षिणसागरे ॥२०॥ जम्बूद्वीपस्य जगतीमिमामाश्रित्य दक्षिणम् । लकति नगरी तत्र रक्षोभिर्विनिवेशिता ॥२१॥ रहस्यमिदमेकं च विद्याधर परं शृणु । जम्बूमरतवर्षस्य दक्षिणाशा समाश्रयत् ॥२२॥ आश्रयित्वोत्तरं तीरं लवणस्य महोदधेः । वसुन्धरोदरस्थानस्वभावार्पितमायतम् ॥२३॥ योजनस्याष्टमं मागं दण्डकादौ गुहाश्रयम् । अधोगत्वा महाद्वारं प्रविश्य मणितोरणम् ॥२४॥ अलंकारोदयं नाम स्थितं पुरमनुत्तमम् । स्थानीयशतधर्मस्थं दिव्यदेशं निरीक्ष्यते ॥२५॥ नानाप्रकाररत्नांशुसंतानपरिराजितम् । विस्मयोत्पादने शक्तमपि त्रिदिवसझनाम् ॥२६॥ अप्रतक्यं गगनगैढुंग विद्याविवर्जितैः। सर्वकामगुणोपेतं विचित्रालयसंकुलम् ॥२७॥ परचक्रसमाक्रान्तो यद्यापत्सु कदाचन । मवेदुर्ग समासृत्य तिस्त्वं निर्भयस्ततः ॥२८॥ इत्युक्तस्तेन यातोऽसौ यो विद्याधरबालकः । लङ्कापुरीमभूत्तस्मात् संतानोऽनेकपुंगवः ॥२९॥ क्या यह गन्ध विकसित फूलोंको धारण करनेवाले इन वृक्षोंकी है अथवा पुष्पसमूहपर शयन करने वाले मेरे शरीरकी है ? ॥१४॥ अथवा ऊपर सीताके साथ श्रीराम विराजमान हैं ? या कोई देव यहां आया है ? ||१५।। तदनन्तर मगधदेशके सम्राट राजा श्रेणिकने गौतम स्वामीसे पूछा कि हे भगवन् ! वह किसकी गन्ध थी जिसने लक्ष्मणको आश्चर्य उत्पन्न किया था ॥१६॥ तदनन्तर लोगोंकी चेष्टाओंको जाननेवाले, सन्देहरूपी अन्धकारको नष्ट करनेके लिए सूर्य एवं पापरूपी धूलिको उड़ानेके लिए वायुस्वरूप गणधर भगवान् बोले ॥१७॥ कि द्वितीय जिनेन्द्र श्री अजितनाथके समवसरणमें मेघवाहन नामका विद्याधर भयभीत होकर प्रभुकी शरणमें आया था। उस समय राक्षसोंके अधिपति बद्धिमान महाभीमने करुणावश मेघवाहनके लिए इस प्रकार वर दिया था ॥१८-१९।। कि हे मेघवाहन ! दक्षिण समुद्रमें एक विशाल राक्षस द्वाप है उसी द्वीपमें त्रिकूट नामका पर्वत है सो तू निश्चिन्त होकर उसी त्रिकूट पर्वतपर चला जा। वहां जम्बूद्वीपकी जगती (वेदिका) का आश्रय कर दक्षिण दिशामें राक्षसोंने एक लंका नामकी नगरी बसायी है। वहाँ ही तूं निवास कर। हे विद्याधर ! इसके साथ ही एक रहस्य-गुप्त वार्ता और सुन । जम्बूद्वीप सम्बन्धी भरत क्षेत्रकी दक्षिण दिशामें लवण समुद्रके उत्तर तटका आश्रय कर पृथिवीके भीतर एक लम्बा-चौड़ा स्वाभाविक स्थान है जो योजनके आठवें भाग विस्तृत है। दण्डक पर्वतके गुफाद्वारसे नीचे जानेपर मणिमय तोरणोंसे देदीप्यमान एक महाद्वार मिलता है उसमें प्रवेश करनेपर अलंकारोदय नामका एक उत्कृष्ट सुन्दर नगर दिखाई देता है ॥२०-२५॥ वह नगर नाना प्रकारके रत्नोंकी किरणोंके समूहसे सुशोभित है तथा देवोंको भी आश्चर्य उत्पन्न करने में समर्थ है। आकाशमें गमन करनेवाले विद्याधर उसका विचार ही नहीं कर सकते तथा विद्यासे रहित मनुष्योंके लिए वह अत्यन्त दुर्गम है। वह सब प्रकारके मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले गुणोंसे सहित है तथा विविध प्रकारके भवनोंसे व्याप्त है ॥२६-२७॥ यदि कदाचित् तू आपत्तिके समय परचक्रके द्वारा आक्रान्त हो तो उस दुर्गका आश्रय कर निर्भय निवास करना ॥२८॥ इस प्रकार महाभीम १. देवः । २. लक्ष्मणस्य । ३. भीताय । ४. मेघवाहनाय । ५. दुःखेन गन्तुं शक्यम् । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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