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________________ पद्मपुराणे कथं वा मुच्यते पापैश्चतुःसंज्ञापरायणः । एतदिच्छामि विज्ञातुं प्रसीद व्याकुरुष्व मे ॥१३॥ गुरुः प्रोवाच वचनं धर्मः प्राणिदया स्मृता । मुच्यन्ते देहिनः पापैरात्मनिन्दाविगर्हणः॥६॥ हिंसायाः कारणं घोरं शुक्रशोणितसंभवम् । पिशितं मा भक्षय त्वं शुद्धं चेद्धर्ममिच्छसि ॥६५॥ प्राणिनां मृत्युभीरूणां मांसैश्चर्मप्रसेविकाम् । पूरयित्वा ध्रुवं याति नरकं पापमानवः ॥६६।। शिरसो मुण्डनैः स्नानैर्विलिङ्गग्रहणादिमिः । नास्ति संधारणं जन्तोमांसभक्षणकारिणः ॥६॥ तीर्थस्नानानि दानानि सोपवासानि देहिनः । नरकान्न परित्राणं कुर्वन्ति पिशिताशिनः ॥६८॥ सर्वजातिगता जीवा बान्धवाः पूर्वजन्मसु । स्युरमी मक्षितास्तेन मांसभक्षणकारिणा ॥६९।। पक्षिमत्स्यगान् हन्ति परिपन्थं च तिष्ठति । यो नरोऽस्मादपि क्ररां मधुमासाद गतिं व्रजेत् ॥७॥ न वृक्षाज्जायते मांसं नोद्भिद्य धरणीतलम् । नाम्मसः पद्मवन्नापि सवव्येभ्यो यथौषधम् ॥७१॥ पक्षिमस्यमृमान् हत्वा वराकान् प्रियजीवितान् । करैरुत्पाद्यते मांसं तन्नाश्नन्ति दयापराः ॥७२॥ स्तन्येन वर्धितं यस्या शरीरं तां मृतां सतीम् । महिषी मातरं कष्टं भक्षयन्ति नराधमाः ॥७३॥ माता पिता च पुत्रश्च मित्राणि च सहोदराः। भक्षितास्तेन यो मांसं मक्षयत्यधमो नरः ॥७॥ इतः क्षमापटलं मेरोरधस्तात् सप्तकं स्मृतम् । तत्र रत्नप्रभामिख्ये देवा भवनवासिनः ॥७५॥ सकषायं तपः कृत्वा जायन्ते तत्र देहिनः । देवानामधमास्ते तु दुष्टकर्मसमन्विताः ॥७६॥ परिग्रही मनुष्य के लिए क्या कोई धर्म नहीं है ? ||६२।। अथवा चारों संज्ञाओंमें तत्पर रहनेवाला गृहस्थ पापोंसे किस प्रकार छूट सकता है ? मैं यह जानना चाहता हूँ सो आप प्रसन्न होकर मेरे लिए यह सब बताइए ॥६३|| तदनन्तर मुनिराजने निम्नांकित वचन कहे कि जीवदया धर्म है तथा अपनी निन्दा गर्दा आदि करनेसे मनुष्य पापोंसे छूट जाते हैं ॥६४|| यदि तू शुद्ध अर्थात् निर्दोष धर्म धारण करना चाहता है तो हिंसाका भयंकर कारण तथा शुक्र और शोणितसे उत्पन्न मांसका कभी भक्षण नहीं कर ॥६५|| जो पापी पुरुष मृत्युसे डरनेवाले प्राणियोंके मांससे अपना पेट भरता है वह अवश्य हो नरक जाता है ।।६६|| शिर मुंडाना, स्नान करना तथा नाना प्रकारके वेष धारण करना आदि कार्योंसे मांसभक्षी मनुष्यकी रक्षा नहीं हो सकती ॥६७। तीर्थक्षेत्रोंमें स्नान करना, दान देना तथा उपवास करना आदि कार्य मांसभोजी मनुष्यको नरकसे बचाने में समर्थ नहीं हैं ॥६८॥ समस्त जातियोंके जीव इस प्राणीके पूर्वभवोंमें बन्धु रह चुके हैं। अतः मांसभक्षण करनेवाला मनुष्य अपने इन्हीं भाई-बन्धुओंको खाता है यह समझना चाहिए ॥६९।। जो मनुष्य पक्षी, मत्स्य और मगोंको मारता है तथा इनके विरुद्ध आचरण करता है वह मधु-मांसभक्षी मनुष्य इन पक्षी आदिसे भी अधिक क्रूर गतिको प्राप्त होता है ।।७०॥ मांस न वृक्षसे उत्पन्न होता है, न पृथिवीतलको भेदन कर निकलता है, न कमलकी तरह पानीसे उत्पन्न होता है और न औषधिके समान किन्हों उत्तम द्रव्योंसे उत्पन्न होता है। किन्तु जिन्हें अपना जीवन प्यारा है ऐसे पक्षी, मत्स्य, मृग आदि दीनहीन प्राणियोंको मारकर दुष्ट मनुष्य मांस उत्पन्न करते हैं। इसलिए दयालु मनुष्य उसे कभी नहीं खाते ॥७१-७२।। जिसके दूधसे शरीर पुष्ट होता है तथा जो माताके समान है ऐसी भैसके मरनेपर नीच मनुष्य उसे खा जाता है यह कितने कष्टकी बात है ? ||७३|| जो नीच मनुष्य मांस खाता है उसने माता, पिता, पुत्र, मित्र और भाइयोंका ही भक्षण किया है ।।७४|| यहाँसे मेरु पर्वतके नीचे सात पृथिवियाँ हैं उनमें-से रत्नप्रभानामक पृथिवीमें भवनवासी देव रहते हैं। जो मनुष्य कषायसहित तप करते हैं वे उनमें उत्पन्न होते हैं। भवनवासो देव सब देवोंमें नीच देव १. -मृच्छसि म.। २. उदरदरोम् । ३. विविधलिङ्गधारणः। ४. अमार्ग प्रतिकूल प्रवृत्तिमिति यावत् । ५. क्रूरान् म.। ६. शून्येन म.। ७. यस्यां म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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