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________________ चत्वारिंशत्तमं पर्व 1 ६ श्रुत्वा केवलिनः पद्ममन्त्येविग्रहधारिणम् । स्तुत्वा सजयनिस्वानं प्रणेमुः सर्वपार्थिवाः ॥१॥ वंशस्थलपुरेशन महाचित्तः सुरप्रभः । सलक्ष्मणं सपत्नीकं पद्मनाभमपूजयत् ||२|| प्रासादशिखरच्छायाधवलीकृत पुष्करम् । नावृणोन्नगरं गन्तुं रामो राज्ञापि याचितः ॥३॥ वंशाद्विशिखरे रम्ये हिमवच्छिखरोपमे । समविस्तीर्णसद्वर्णरमणीय शिलातले ||४|| नानावृक्षलताकीर्णे नानाशकुनिनादिते । सुगन्धानिलसंपूर्ण नानापुष्पफलाकुले ||५|| पद्मोत्पलवनाढ्यामिर्वापीभिरतिशोभिते । सर्वर्तुसहितोद्युक्तवसन्तकृत सेवने ॥६॥ 'सज्जिता परमा भूमिः शुद्धादर्शतलोपमा । दशार्धवर्णरजसा कल्पितानेकमक्तिका ||७|| कुन्दातिमुक्तकलता वकुलाः कमलानि च । यूथिका मल्लिका नागा अशोकाश्चारुपल्लवाः ॥८॥ एते चान्ये च भूयांसश्चारुभासः सुगन्धयः । भावारम्यविलासाभिः प्रमदाभिः प्रकल्पिताः ॥९॥ बद्ध्वा परिकरं पुग्भिः सुविदग्धैः सुसंभ्रमैः । मङ्गलालापसंपन्नैः स्वामिभक्तिपरायणैः ॥१०॥ मेघकाण्डानि वस्त्राणि नानाचित्रधराणि च । प्रसारितानि रुद्राणि वैजयन्तीशतानि च ॥११॥ किङ्किणीजालयुक्तानि मुक्तादामशतानि च । चामराणि विचित्राणि लम्बूषमणिपट्टिका ॥१२॥ दर्पणा बुदबुदावल्यो विस्कुरद्भास्करांशवः । न्यस्तान्येतानि तुङ्गेषु तोरणेषु ध्वजेषु च ॥१३॥ अवनौ पूर्णकलशाः स्थापिता विधिसंयुताः । हंसा इव निविष्टास्ते विरेजुर्नलिनीवने ||१४|| अथानन्तर केवली भगवान् के मुखसे रामको चरमशरीरी जानकर समस्त राजाओंने जयध्वनि के साथ स्तुति कर उन्हें नमस्कार किया || १|| और उदार चित्तके धारक वंशस्थलपुर नगरके राजा सुरप्रभने लक्ष्मण तथा सीता सहित रामकी भक्ति की || २ || जो महलोंके शिखरों की कान्तिसे आकाशको धवल कर रहा था ऐसे नगर में चलनेके लिए राजाने रामसे बहुत याचना की परन्तु उन्होंने स्वीकृत नहीं किया ||३|| तब जो अतिशय रमणीय था, हिमगिरिके शिखरके समान था, जहाँ एक समान लम्बे-चौड़े अच्छे रंगके मनोहर शिलातल थे, जो नाना वृक्षों और लताओंसे व्याप्त था, नाना पक्षी जहाँ शब्द कर रहे थे, जो सुगन्धित वायुसे पूर्ण था, नाना प्रकारके पुष्पों और फलोंसे युक्त था, कमल और उत्पलके वनोंसे युक्त वापिकाओंसे जो अत्यन्त शोभित था, तथा सव ऋतुओंके साथ आकर वसन्त ऋतु जिसकी सेवा कर रही थी, ऐसे वंशधर पर्वतके शिखर पर शुद्ध दर्पणतलके समान उत्कृष्ट भूमि तैयार की गयी । उस भूमिपर पाँच वर्णकी धूलिसे अनेक चित्राम बनाये गये थे ||४-७॥ अनेक प्रकारके भावोंसे रमणीय चेष्टाओंको धारण करनेवाली स्त्रियोंने वहाँ उसी पंचवर्णकी परागसे कुन्द, अतिमुक्तकलता, मौलश्री, कमल, जुही, मालती, नागकेशर और सुन्दर पल्लवोंसे युक्त अशोक वृक्ष, तथा इनके सिवाय सुन्दर कान्ति और सुगन्धिको धारण करनेवाले बहुत-से अन्य वृक्ष बनाये ॥ ८-९ ॥ चतुर, उत्तम चेष्टाओंके धारक, मंगलमय वार्तालाप में तत्पर और स्वामिभक्ति में निपुण मनुष्योंने बड़ी तैयारीके साथ नाना चित्रोंको धारण करनेवाले बादली रंगके वस्त्र फैलाये, सैकड़ों सघन पताकाएँ फहरायीं ॥१०-११ ॥ छोटी-छोटी घण्टियोंसे युक्त सैकड़ों मोतियोंकी मालाएँ, चित्र-विचित्र चमर, मणिमय फानूस, दर्पण, तथा जिनपर सूर्य की किरणें प्रकाशमान हो रही थीं ऐसे अनेक छोटे-छोटे गोले ये सब ऊँचे-ऊँचे तोरणों तथा ध्वजाओं में लगाये ॥ १२-१३ ॥ पृथिवीपर जहां-तहां विधिपूर्वक पूर्ण कलश रखे गये १. चरमशरीरिणम् । २. गगनम् । ३. आवृणोन्नगरं ख. । ४. हिमवच्छिशिरोपमे म. । ५. द्युक्ते म. । ६. सर्जिता म । ७. सघनानि रुद्राणि म. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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