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________________ पद्मपुराणे मानुष्यकमिदं जातं सारमुक्तं मयाधुना । सुराणामपि वार्तेषा किमन्यत्राभिधीयताम् ॥१५७॥ सोऽहं पुनर्भवाद्भीरुस्त्वया संप्रतिबोधितः । तथाविधां मजे चेष्टां यया मुक्तिरवाप्यते ॥ १५८ ॥ इत्युक्त्वा क्षमयित्वा तं परिवर्गसमन्वितम् । गत्वा केसरिविक्रान्तो मुनिं श्रुतिधरश्रुतिम् || १५९|| कराब्जकुड्मलाङ्केन विधाय शिरसा नतिम् । जगाद नाथ वाञ्छामि दीक्षां दैगम्बरीमिति ।। १६० । आचार्येणैवमित्युक्ते परित्यज्यांशुकादिकम् । केशलुञ्चं विधायासौ महाव्रतधरोऽभवत् ।।१६१।। आत्मार्थनिरतस्त्यक्तरागद्वेषपरिग्रहः । विजहार क्षितिं धीरो यत्रास्तमितवास्यसौ ।। १६२ || क्रूरश्वापदयुक्तेषु गहनेषु वनेषु सः । चकार वसतिं निर्भीर्गह्वरेषु च भूभृताम् ॥ १६३ ॥ उपजातिः विमुक्तनिश्शेषपरिग्रहाशं गृहीतचारित्रभरं सुशीलम् । १६६ नानातपः शोषितदेहमुद्धं महामुनिं तं नमतातिवीर्यम् ॥१६४॥ रत्नत्रयापादितचारुभूषं दिगम्बरं साधुगुणावतंसम् । संप्रस्थितं योग्यवरं विमुक्तेर्महामुनि तं नमतातिवीर्यम् ॥१६५॥ इदं परं चेष्टितमातिवीर्यं शृणोति यो यश्च सुधीरधीते । प्राप्नोति वृद्धिं सदसोऽपि मध्ये रविप्रभोऽसौ व्यसनं न लोकः ॥१६६॥ इत्याएँ र विषेणाचार्यप्रोक्ते पद्मचरितेऽतिवीर्यनिष्क्रमणाभिधानं नाम सप्तत्रिंशत्तमं पर्व ॥ ३७ ॥ तो देखो कि जिस प्रकार राहु चन्द्रमाको कान्तिरहित कर देता है उसी प्रकार इसने मुझे कान्तिरहित - निस्तेज कर दिया || १५६ || जिस मनुष्य पर्यायके लिए देव भी चर्चा करते हैं औरोंकी तो ही क्या है उस मनुष्य पर्यायको मैंने अब तक निःसार खोया ॥ १५७॥ अब मैं दूसरा जन्म धारण करने से भयभीत हो चुका हूँ इसलिए आपसे प्रतिबोध पाकर यह चेष्टा करता हूँ कि जिससे मुक्ति प्राप्त होती है ।। १५८।। इस प्रकार कहकर परिजन सहित रामसे क्षमा कराकर सिंहके समान शूरवीरताको धारण करता हुआ अतिवीयं श्रुतिधर मुनिराजके पास गया और अंजलियुक्त शिरसे नमस्कार कर बोला कि हे नाथ ! मैं दैगम्बरी दीक्षा धारण करना चाहता हूँ ॥ १५९-१६० ।। 'एवमस्तु' इस प्रकार आचार्यंके कहते ही वह वस्त्रादि त्यागकर तथा केश लोंचकर महाव्रतका धारी हो गया ॥ १६१॥ आत्माके अर्थ में तत्पर, तथा राग-द्वेष आदि परिग्रहसे रहित होकर वह धीर-वीर पृथिवीमें विहार करने लगा । विहार करते-करते जहाँ सूर्य अस्त हो जाता था वहीं वह ठहर जाता था ॥ १६२॥ सिंह आदि दुष्ट जानवरोंसे युक्त सघन वनों तथा पर्वतोंकी गुफाओं में वह निर्भय होकर निवास करता था ॥ १६३॥ जिसने समस्त परिग्रहकी आशा छोड़ दी थी, जिसने चारित्रका भार धारण किया था, जो उत्तम शीलसे युक्त था, नाना प्रकार के तपसे जिसने अपना शरीर सुखा दिया, तथा जो स्वयं शुभ रूप था उन महामुनि अतिवीर्यको नमस्कार करो ॥१६४॥ सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्ररूपी मनोहर आभूषणोंसे जो सहित थे, दिशाएँ ही जिनके अम्बर -- वस्त्र थे, मुनियोंके अट्ठाईस मूल गुण ही जिनके आभरण थे, जिन्होंने कर्मरूपी शत्रुओं को हरनेके लिए प्रस्थान किया था, और जो मुक्ति के योग्य वर थे उन महामुनि अतिवीर्यको नमस्कार करो ॥१६५॥ | गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! अतिवीर्यं मुनिके इस उत्कृष्ट चरितको जो बुद्धिमान् सुनता है अथवा पढ़ता है वह सभाके बीच बुद्धिको प्राप्त होता है तथा सूर्यके समान प्रभाको धारण करता हुआ कभी कष्ट नहीं पाता ||१६६ || इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य कथित पद्मचरित में राजा अतिवीर्य की दीक्षाका वर्णन करनेवाला सैंतीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ||३७|| Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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