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________________ पप्रपुराणे १६२ ते चतुर्विशतिर्भक्त्या जिनेन्द्रा भक्तितत्परैः । वन्यन्तेऽस्माभिरित्येवं तेवातेवा ध्वनि पुरः ॥१०॥ कृत्वा पुराणवस्तूनि गातुमुस्फुल्ललोचनाः । गम्मीरभारतीतानासक्ताश्चारणयोषितः ॥१०१॥ ध्वनिमश्रुतपूर्व तं श्रुत्वा तासां नराधिपः । आजगाम गुणाकृष्टः काष्ठभार इवोदके ॥१०२॥ ततो रेचकमादाय ललिताङ्गविवर्तनम् । नृपस्यामिमुखीमावं जगाम वरवर्तनी ॥१०३।। सस्मितालोकितैस्तस्या विगलद्धृसमुद्गमैः । गमकानुगतैः कम्पैस्तनभारस्य हारिणः ॥१०४॥ मन्थरैश्चारुसंचारैर्जघनस्य घनस्य च । तथा बाहुलताहारैः सुलोलकरपल्लवैः ॥१०५।। पादन्यासैलघुस्पृष्टविमुक्तधरणीतलैः । आशु संपादितः स्थानैः केशपाशविवर्तनः ॥१०६॥ त्रिकस्य बलनर्मागगात्रसंदर्शितात्ममिः । कामबाणैरिमर्लोकः सकलः समताड्यत ॥१०७॥ मूर्छनाभिः स्वरैमर्यथास्थानं नियोजितैः । नर्तकी सा जगौ वल्गु परिलीनसखीस्वरम् ॥१०॥ यत्र तत्र समुद्देशे नर्तकी कुरुते स्थितिम् । तत्र तत्र सभा सर्वा नयनानि प्रयच्छति ॥१०९॥ तस्या रूपेण चढूंषि स्वरेण श्रवणेन्द्रियम् । मनांसि तवयेनापि वद्धानि सदसो दृढम् ॥११०॥ उत्फुक्तमुखराजीवा सामन्ता दानतत्परा । बभूवुर्निरलंकारा संव्यानाम्बरधारिणः ॥११॥ 'आतोद्यानुगतं नृत्यं तत्तस्यास्त्रिदशानपि । वशीकुर्वीत कैवास्था सुहरेष्वन्यजन्तुषु ॥११२॥ तदनन्तर जिनके नेत्रकमल विकसित थे तथा जो भारतीकी गम्भीर तान खींचने में आसक्त थीं ऐसी उन नृत्यकारिणी स्त्रियोंने 'भक्तिमें तत्पर रहनेवाली हम सब चौबीस तीर्थंकरोंको भक्तिपूर्वक नमस्कार करती हैं', यह कहकर सब प्रथम 'तेवा-लेवा' यह अव्यक्त ध्वनि की फिर पुराणोंमें प्रतिपादित वस्तुओंका गाना शुरू किया ॥१००-१०१।। उन नृत्यकारिणियोंकी अश्रुतपूर्व ध्वनि सुनकर गुणोंसे खिंचा राजा अतिवीर्य उनके पास इस तरह आ गया जिस तरह कि पानीमें गुण अर्थात् रस्सीसे खिंचा काष्ठका भार खींचनेवालेके पास आता है ॥१०२।। तदनन्तर फिरकी लेकर सुन्दर अंगोंको मोड़ती हुए श्रेष्ठ नतंकी राजाके सम्मुख गयी ॥१०३।। वहां उसका मन्द-मन्द मुसकानके साथ देखना, भौंहोंका चलाना, विज्ञ मनुष्य हो जिसे समझ पाते थे ऐसे सुन्दर स्तनोंका कंपाना, धीमी-धीमी सुन्दर चालसे चलना, स्थूल नितम्बका मटकाना, भुजारूप लताओंका चलाना, उत्तम लीलाके साथ हस्तरूपी पल्लवोंका किराना, जिनमें शीघ्रतासे स्पर्श कर पृथिवीतल छोड़ दिया जाता था ऐसे पैर रखना, शीघ्रतासे नत्यकी अनेक मुद्राओंका बदलना, केशपाशका चलाना, कटिकी अस्थिका हिलाना, तथा नाभि आदि शरीरके अवयवोंका दिखलाना आदि कामके बाणोंसे समस्त मनुष्य ताड़े गये थे॥१०४-१०७।। वह नर्तकी, जिनका यथास्थान प्रयोग किया गया था ऐसी मूच्छनाओं, स्वरों तथा ग्रामों-स्वरोंके समूहसे सखियोंके स्वरको अपने स्वरमें मिलाकर बहुत सुन्दर गा रही थी ॥१०८॥ वह नृत्यकारिणी जिस-जिस स्थानमें ठहरती थी सारी सभा उसी-उसी स्थानमें अपने नेत्र लगा देती थी ॥१०९।। सारी सभाके नेत्र उसके रूपसे, कान मधुर स्वरसे और मन, रूप तथा स्वर दोनोंसे मजबूत बँध गये थे ॥११०॥ जिनके मुखकमल विकसित थे ऐसे सामन्त लोग उन नतंकियोंको पुरस्कार देते-देते अलंकाररहित हो गये थे उनके शरीरपर केवल पहननेके वस्त्र ही बाकी रह गये थे ॥१११॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि हे श्रेणिक ! गायन-वादनसे सहित उस नृत्यकारिणीका वह नृत्य देवोंको भी वश कर सकता था फिर जिनका हरा जाना सरल १. तेवा तेवा इत्यनुकरणशब्दम् । २. नानाशक्त्याश्चारण म.। ३. स्पष्ट म.। ४. विवर्तने म. । ५. इमैः इति छान्दसिकप्रयोगः। ६. च सद्देशे म.। ७. संख्यानां वरधारिणी म.। ८. आताय्यानुगं (?) म. । १. समरेष्वन्य ख. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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