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________________ १४६ पद्मपुराणे यदग्रीष्मातपतप्ताङ्गौ समं देव्या विनिर्गतौ । तन्मे प्रतिष्ठितं शल्यं हृदये प्रचलत् सदा ॥१८५।। तावन्मे नास्ति दुःखस्यछे दो यावदिदं गृहम् । परित्यज्य निरारम्भः प्रव्र जिप्याम्मसंशयम् ॥१८६।। उपलभ्यास्य वैराग्यं बन्धुवर्गः ससंभ्रमः । धारामिरुत्ससर्जास्त्रं दीनः साकं सुशर्मणा ।।१८७।। निरीक्ष्य स्वजनं विप्रो निर्मग्नं शोकसागरे । अपेक्षापेतया बुद्ध्या निर्जगाद शिवोत्सुकः ॥१८८॥ विचित्रस्वजनस्नेहैरत्युत्तुङ्गमनोरथैः । मूढोऽयं दह्यते लोकः किं न जानीथ भो जनाः ॥१८९।। इति संवेगमापन्नः प्रियां दुःखेन मूच्छिताम् । विहाय बन्धुलोकं च बहुविक्लवकारिणम् ।।१९।। अष्टादश सहस्राणि धेनूनां सिततेजसाम् । रत्नपूर्ण च भवनं दासीयोषित्समाकुलम् ।।१९१।। सुशर्मायां समारोप्य तनयं द्रविणं तथा । बभूव कपिलः साधुनिरारम्भो निरम्बरः ॥१९२।। सह्यानन्दमतेः शिष्यः सुप्रतीतस्तपोधनः । चकार गुरुतां तस्य गुणशीलमहार्णवः ॥१५३।। वियोगिनीवृत्तम् विजहार महातपास्ततः कपिलश्चारुचरित्रवीवधः । परमार्थनिविष्टमानसः श्रमणश्रीपरिवीतविग्रहः ॥१९॥ य इदं कपिलानुकीर्तनं पठति प्रह्वमतिः शृणोति वा । उपवाससहस्रसंभवं लभतेऽसौ रविभासुरः फलम् ।।१९५॥ इत्यर्पे रविषेणाचार्यप्रोक्त पद्मचरिते कपिलोपाख्यानं नाम पञ्चत्रिशत्तमं पर्व ॥३५॥ घ. खेदकी बात है कि मैंने कमलके समान नेत्रोंके धारक तथा चन्द्रतुल्य मुखसे सुशोभित, घर आये हुए उन दोनों भाइयोंका अपराधके बिना ही तिरस्कार किया ।।१८४॥ ग्रीष्म ऋतुके आतापसे जिनके शरीर सन्तप्त हो रहे थे ऐसे दोनों भाई देवी अर्थात् सीताके साथ घरसे बाहर निकले, वह मेरे हृदयमें सदा शल्यकी तरह गड़ा हुआ चंचल हो उठता है ।।१८५।। निःसन्देह मेरे दुःखका अन्त तबतक नहीं हो सकता है जबतक कि में घर छोड़कर निरारम्भ ही दीक्षा नहीं ले लेता है॥१८६|| तदनन्तर कपिलके वैराग्यका समाचार जानकर इसके घबडाये हए दीन-हीन सुशर्मा ब्राह्मणीके साथ अश्रुधारा बहाने लगे ॥१८७॥ मोक्ष प्राप्त करने में उत्सुक कपिल, अपने परिजनको शोकरूपी सागरमें निमग्न देख निरपेक्ष बुद्धिसे बोला कि हे मानवो! बड़े-बड़े मनोरथोंसे युक्त कुटुम्बी जनोंके विचित्र स्नेहसे मोहित हुआ यह प्राणी निरन्तर जलता रहता है, यह क्या तुम नहीं जानते ? ||१८८-१८९।। इस प्रकार संवेगको प्राप्त हुआ कपिल ब्राह्मण दुःखसे मूच्छित स्त्री तथा बहुत दुःखका अनुभव करनेवाले बन्धुजनोंको छोड़कर, अठारह हजार सफेद गायें, रत्नोंसे परिपूर्ण तथा दास-दासियोंसे युक्त भवन, पुत्र और समस्त धन सुशर्मा ब्राह्मणीके लिए सौंपकर आरम्भ रहित दिगम्बर साधु हो गया ॥१९०-१९२॥ सह्यानन्दमतिके शिष्य तथा गुण और शीलके महासागर अतिशय तपस्वी मुनि, उसके गुरु हुए थे अर्थात् उनके पास उसने दीक्षा ली थी ॥१९३॥ तदनन्तर जो निर्मल चारित्ररूपी काँवरको धारण करते थे, जिनका मन सदा परमार्थमें लगा रहता था, और जिनका शरीर निर्ग्रन्थ व्रत रूपी लक्ष्मीसे आलिंगित था ऐसे महातपस्वी कपिल मुनिराज पृथिवी पर विहार करने लगे ॥१९४॥ गौतम स्वामी कहते हैं कि जो मनुष्य अहंकार राहत हो कपिलकी इस कथाको पढ़ता अथवा सुनता है वह सूर्यके समान देदीप्यमान होता हुआ एक हजार उपवासका फल प्राप्त करता है ।।१९५।। इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, रविषेणाचार्य रचित पद्मचरितमें कपिलका वर्णन करनेवाला पैतीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥३४॥ ..भानाति भो जनः । २. धीरधीः म., ब.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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