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________________ पञ्चविंशत्तम पर्व १४३ ऊचे च कुन्दसंकाशः सर्वकामगुणान्वितैः । राजते भवनैर्यस्य पुरीयं स्वर्गसन्निभा ॥१३॥ तस्यैतद्भवनं भद्रे प्रान्तप्रासादवेष्टितम् । अभिरामस्य रामस्य पुर्या मध्ये विराजते ॥१४४॥ ब्रुवन्निति महाहृष्टः स विवेश च तद्गृहम् । दृष्ट्वा च लक्ष्मणं दूराभृशमाकुलतां गतः ।।१४५|| दध्यौ संजातकम्पश्च सोऽयमिन्दीवरप्रमः । व्यथितो दुर्विदग्धोऽहं चित्रयेन तदावधैः ॥१४६॥ कर्णयोरतिदुःखानि भाषितानि महाखले । तानि कृत्वा तदा पापे जिद्धे निस्सर साम्प्रतम् ॥१४॥ किं करोमि व गच्छामि विवरं प्रविशामि किम् । अस्मिन् शरणहीनस्य भवेच्छरणमद्य कः ॥१४॥ अवस्थितोऽयमत्रेति यदि मे विदितो भवेत् । समुल्लङ्घयोत्तरामाशां देशत्यागः कृतो मवेत् ।।१४९॥ एवमुद्वेगमापन्नो विहाय ब्राह्मणी द्विजः । प्रपलायितुमुद्युक्तो लक्ष्मणेन विलोकितः ॥१५०॥ स्मित्वा च स जगादायं कुतो विप्रः समागतः। वनसंवर्धितालेव किमित्याकुलतामितः ॥१५॥ समाश्वासमिमं नीत्वा द्रुतमानय तं द्विजम् । पश्यामस्तावदेतस्य चेष्टितं किमयं वदेत् ॥१५२।। न भेत्तव्यं न भेत्तव्यं निवर्तस्वेति चोदितः । अधिगम्य समाश्यासं निवृत्तः स्खलितक्रमः ॥१५३॥ उपसृत्य मयं त्यक्त्वा प्रसृतो धवलाम्बरः । पुष्पाञ्जलिस्तयोरग्रे स्थित्वा स्वस्तीत्यशब्दयत् ।।१५४॥ ततो लब्धासनासीनो निकटस्थाङ्गनो द्विजः । ऋग्भिः स्तवनदक्षामिरस्तौषीद रामलक्ष्मणौ ॥१५५।। ततः पद्मो जगादेवं तां नः कृत्वा विमानताम् । वद साम्प्रतमागत्य कस्मात् पूजयसि द्विजः ॥१५६॥ सोऽब्रवीन्न मया ज्ञातं त्वं प्रच्छन्नमहेश्वरः । मोहाद्विमानितस्तेन भस्मच्छन्न इवानिलः ॥१५७॥ महल मिलते थे उहें अपनी स्त्रीके लिए दिखाता जाता था ॥१४२।। उसने स्त्रीसे कहा कि हे भद्रे ! कुन्दके समान उज्ज्वल तथा सर्व मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले गुणोंसे सहित, भवनोंसे जिनकी यह स्वर्ग तुल्य नगरी सुशोभित हो रही है उन मनोहर रामका यह भवन समीपवर्ती. अन्य महलोंसे घिरा कैसा सुन्दर जान पड़ता है ? ||१४३-१४४।। इस प्रकार कहते हुए उस अतिशय हर्षित ब्राह्मणने रामके भवनमें प्रवेश किया। वहाँ वह दूरसे ही लक्ष्मणको देखकर अत्यन्त आकुलताको प्राप्त हुआ ॥१४५।। उसके शरीरमें कैंपकंपी छूटने लगी। वह विचार करने लगा कि नील कमलसे समान प्रभावाला यह वही पुरुष है जिसने उस समय मुझ मूर्खको नाना प्रकारके वधसे दुखी किया था ॥१४६|| उसकी बोलती बन्द हो गयी। वह मन ही मन अपनी कहने लगा हे महादुष्टे ! हे पापे ! उस समय तो तूने कानोंके लिए अत्यन्त दुःखदायी वचन कहे अब चुप क्यों है ? बाहर निकल ॥१४७।। वह मन ही मन विचार करने लगा कि क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? किस बिलमें घुस जाऊँ ? आज मुझ शरणहीनका यहाँ कौन शरण होगा? ॥१४८॥ यदि मुझे मालूम होता कि यह यहां ठहरा है तो मैं उत्तर दिशाको लांघकर देश त्याग ही कर देता ॥१४९॥ इस प्रकार उद्वेगको प्राप्त हुआ वह ब्राह्मण, ब्राह्मणीको छोड़ भागनेके लिए तैयार हुआ ही था कि लक्ष्मणने उसे देख लिया ॥१५०।। हँसकर लक्ष्मणने कहा कि यह ब्राह्मण कहाँसे आया है ? जान पड़ता है कि इसका पोषण वनमें हो हुआ है, यह इस तरह आकुलताको क्यों प्राप्त हुआ है ? ॥१५१।। सान्त्वना देकर उस ब्राह्मणको शीघ्र ही लाओ हम इसकी चेष्टाको देखेंगे तथा सुनेंगे कि यह क्या कहता है ? ॥१५२॥ 'नहीं डरना चाहिए, नहीं डरना चाहिए, लौटो', इस प्रकार कहनेपर वह सान्त्वनाको प्राप्त कर लड़खड़ाते पैरों वापस लौटा ॥१५३।।। तदनन्तर श्वेत वस्त्रको धारण करनेवाला वह ब्राह्मण पास जाकर निर्भय हो राम-लक्ष्मणके सम्मुख गया तथा अंजलिमें पुष्प रखकर उनके सामने खड़ा हो 'स्वस्ति' शब्दका उच्चारण करने लगा ॥१५४॥ तदनन्तर जो प्राप्त हुए आसनपर बैठा था और पास ही जिसकी स्त्री बैठी थी ऐसा वह ब्राह्मण स्तवन करने में समर्थ ऋचाओंके द्वारा राम-लक्ष्मणकी स्तुति करने लगा ॥१५५॥ स्तुतिके बाद रामने कहा कि हे ब्राह्मण ! उस समय हमलोगोंका वैसा तिरस्कार कर अब इस समय आकर पूजा क्यों कर रहे हो सो तो बताओ ॥१५६॥ ब्राह्मणने कहा, हे देव ! Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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