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________________ पद्मपुराण चालीसवाँ पर्व वंशस्थलपुरके राजा सुरप्रभ द्वारा चरमशरीरी रामका अभिवादन, रामचन्द्र का दण्डक वन प्रस्थान तथा रामगिरिका वर्णन । १६५-१६८ . इकतालीसवाँ पर्व राम-लक्ष्मण तथा सीताका कर्णरवा नदीको प्राप्त कर उसमें अवगाहन तथा सुगुप्ति और गुप्ति नामक दो मुनियोंको आहार दान देनेसे पञ्चाश्चर्यकी प्राप्ति । मुनिराजके दर्शनसे गृध्र पक्षीका पूर्वभव ज्ञान उत्पन्न होना तथा मुनिवन्दनाके कारण दिव्य शरीरकी प्राप्ति, मुनि द्वारा गृध्रके पूर्वभवका कथन, मुनिराज द्वारा अपने पूर्वभवका वर्णन कर अपने स्थानको प्रस्थान, राम द्वारा ग्धका 'जटायु' नाम करण तथा उसका रामके आश्रममें निवास । १६६-२१० बयालीसवाँ पर्व पात्र दानके प्रभावसे राम-लक्ष्मण रत्न तथा सुवर्णादि सम्पदासे सम्पन्न हो गये। तदनन्तर वे मनो रथ रथ पर श्रारूढ हो दण्डक वनमें स्वेच्छानुसार भ्रमण करने लगे। नाना छन्दोमें दण्डक वनका अद्भुत वर्णन । वनके सौन्दर्यसे प्रसन्न हो राम पहले तो लक्ष्मणसे कहते है कि जाओ अपनी माताओंको ले आश्रो फिर कुछ रुक कर कहते हैं कि नहीं अभी वर्षा ऋतु है अतः यातायातमें कष्ट होगा। शरद् ऋतुके सुनहले दिन आने पर मैं स्वयं जाऊँगा । २११-२२१ तैंतालीसवाँ पर्व शरद् ऋतुकी निर्मल चाँदनी आकाशमें छिटकने लगी। एक दिन लक्ष्मण वनमें भ्रमण करते करते दूर निकल गये। उन्हें एक ओरसे अद्भुत गन्ध आई उसी गन्धसे आकृष्ट हो वे उस श्रोर बढ़ते गये। श्रेणिकके पूछने पर गौतम स्वामीने राक्षस वंश तथा लंकाका वर्णन किया । एक बाँसके भिड़ेमें शम्बूक सूर्यहास खड्न सिद्ध कर दिया था। देवोपनीत खड्ग आकाशमें लटक रहा था। उसीकी सुगन्धि सर्वत्र फैल रही थी। लक्ष्मणने लपककर सूर्यहास खङ्ग हाथमें ले लिया और उसकी तीक्ष्णताकी परख करनेके लिए उसे उन्होंने उसो बाँसोंके भिड़े पर चला दिया । चलाते ही बाँसोंका भिड़ा कट गया और साथ ही उसके भीतर स्थित शम्बूक भी कट कर दो टूक हो गया। शम्बूक, रावणकी बहिन चन्द्रनखाका पुत्र था। वह प्रतिदिन पुत्रको भोजन देने के लिए आती थी। उस दिन पुत्रके दो टूक देख उसके दुःस्त्रका पार नहीं रहा। उसका करुण विलाप आकाशमें गूंजने लगा। कुछ समय बाद राम-लक्ष्मण के सौन्दर्यसे उसका मन हरा गया और वह उन्हें प्राप्त करने के लिए छलसे कन्या बन गई। राम-लक्ष्मण उसकी मायासे विचलित नहीं हुए। २२२-२३१ चवालीसवाँ पर्व कामेच्छा पूर्ण न होनेपर चन्द्रनखाको पुत्रशोकने फिर धर दबाया जिससे विलाप करती हुई वह अपने पति खरदूषण के पास गई । खरदूषणने स्वयं आकर पुत्रको मरा देखा। उसका क्रोध उबल पड़ा। वह राम लक्ष्मणके साथ युद्ध करनेके लिए उठ खड़ा हुआ। खरदूषणने रावणको भी इस घटनाकी खबर दी थी। खरदूषणका इधर लक्ष्मणके साथ घमासान युद्ध होता है उधर रावण उसकी सहायताके लिए आता है सो बीचमें सीताको देख मोहित हो उठता है । छलसे सिंहनाद कर रामको लक्ष्मणके पास भेज देता है और सीताको एकाकिनी देख हर ले जाता है । जटायु शक्ति भर प्रयत्न करता है पर सफलता नहीं प्राप्त कर पाता है। रणभमिमें रामको देख लक्ष्मण घटित घटनाकी आशंकासे दुःखी हो उन्हें तत्काल वापिस भेजते हैं। पर राम वापिस आनेपर सीताको नहीं पाते हैं। उसके विना करुण विलाप करते हैं । २३२-२४३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001823
Book TitlePadmapuran Part 2
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages480
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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