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________________ ३६ पपपुराणे ये पुनः कुत्सिते दानं ददते भोगतृष्णया। तेऽपि हस्त्यादितां गत्वा 'भुलते दानजं फलम् ॥६६॥ नितान्तं मृदुनि क्षेत्रे दूरं कृष्टे हलाननैः । क्षिप्तं बीजं यथानन्तगुणं सस्यं प्रयच्छति ॥६॥ यथा चेक्षुषु निक्षिप्तं माधुर्य वारि गच्छति । पीतं च धेनुमिस्तोयं क्षीरत्वेन विवर्तते ॥६॥ एवं साधौ तपोऽगारे व्रतालंकृतविग्रहे । सर्वग्रन्थविनिर्मुक्ते दत्तं दानं महाफलम् ॥६९।। *खिले गतं यथा क्षेत्रे बीजमल्पफलं भवेत् । निम्बेषु च तथा क्षिप्तं कटुत्वं वारि गच्छति ।।७०॥ यथा च पन्नगैः पीतं क्षीरं संजायते विषम् । कुपात्रेषु तथा दत्तं दानं कुफलदं मवेत् ।।७।। एवं दानस्य सदृशो धरेन्द्र फलसंभवः । यद्यदाधीयते वस्तु दर्पणे तस्य दर्शनम् ॥७२।। यथा शुक्लं च कृष्णं च पक्षद्वयमनन्तरम् । उत्सर्पिण्यवसर्पिण्योरेवं क्रमसमुद्भवः ॥७३॥ अर्थ कालान्त्यतो हानि तेषु यातेष्वनुक्रमात् । कल्पपादपखण्डेषु शृणु कौलकरी स्थितिम् ॥७॥ प्रतिश्रुतिरिति ज्ञेय आधः कुलकरो महान् । श्रुत्वा तस्य वचः सर्वाः प्रजाः सौस्थित्यमागताः ।।७५|| जन्मत्रयमतीतं यो जानाति स्म निजं विभुः । शुभचेष्टासमुद्युक्तौ व्यवस्थानां प्रदेशकः ॥७६॥ ततो वर्षसहसाणामतिक्रान्तासु कोटिंषु । बहीषु स मनुः प्राप्तो जन्म सन्मतिसंज्ञितः ॥७७॥ ततः क्षेमकरो जातः क्षेमत्तदनन्तरम् । अभूत् सीमंकरस्तस्मात् सीमध्च्च ततः परम् ॥७॥ चक्षुष्मानपरस्तस्मात्तं गत्वा सभयाः प्रजाः । अपृच्छन्नाथ कावेतौ दृश्येते गगनार्णवे ॥७९॥ ततो जगाद चक्षुष्मान् विदेहे यछुतं जिनात् । युक्तो जन्मान्तरस्मृत्या यथाकालपरिक्षये ॥४०॥ भूमियोंमें उत्तम मनुष्य होते हैं ।।६५।। तथा जो भोर्गोकी तृष्णासे कुपात्रके लिए दान देते हैं वे भी हस्ती आदिकी पर्याय प्राप्त कर दानका फल भोगते हैं ।। ६६ ॥ जिस प्रकार हलकी नोंकसे दूर तक जुते और अत्यन्त कोमल क्षेत्रमें बोया हुआ बीज अनन्तगुणा धान्य प्रदान करता है अथवा जिस प्रकार ईखोंमें दिया हुआ पानी मधुरताको प्राप्त होता है और गायोंके द्वारा पिया हुआ पानी दूध रूपमें परिणत हो जाता है उसी प्रकार तपके भण्डार और व्रतोंसे अलंकृत शरीरके धारक सर्वपरिग्रह रहित मुनिके लिए दिया हुआ दान महाफलको देनेवाला होता है ॥६७-६९॥ जिस प्रकार ऊषर क्षेत्रमें बोया हुआ बीज अल्पफल देता है अथवा नीमके वृक्षोंमें दिया हुआ पानी जिस प्रकार कड़आ हो जाता है और साँपोंके द्वारा पिया हुआ पानी जिस प्रकार विष रूपमें परिणत हो जाता है उसी प्रकार कुपात्रोंमें दिया हुआ दान कुफलको देनेवाला होता है ।। ७०-७१ ॥ गौतमस्वामी कहते हैं कि हे राजन् ! जो जैसा दान देता है उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। दर्पणके सामने जो-जो वस्तु रखी जाती है वही-वही दिखाई देती है ।।७२।। ___ जिस प्रकार शुक्ल और कृष्णके भेदसे दो पक्ष एकके बाद एक प्रकट होते हैं उसी प्रकार उत्सर्पिणी और अवसपिणी ये दो काल क्रमसे प्रकट होते हैं ॥७३॥ अथानन्तर तृतीय कालका अन्त होनेके कारण जब क्रमसे कल्पवृक्षोंका समूह नष्ट होने लगा तब चौदह कुलकर उत्पन्न हुए उस समयकी व्यवस्था कहता हूँ सो हे श्रेणिक! सुन ||७४|| सबसे पहले प्रतिश्रुति नामके प्रथम कुलकर हए। उनके वचन सुनकर प्रजा आनन्दको प्राप्त हई |७५॥ वे अपने तीन जन्म पहलेकी बात जानते थे, शुभचेष्टाओंके चलाने में तत्पर रहते थे और सब प्रकारकी व्यवस्थाओंका निर्देश करनेवाले थे॥७६ ।। उनके बाद अनेक करोड़ हजार वर्ष बीतनेपर सन्मति नामके द्वितीय कुलकर उत्पन्न हुए ॥७७।। उनके बाद क्षेमंकर, फिर क्षेमन्धर, तत्पश्चात् सीमंकर और उनके पीछे सीमन्धर नामके कुलकर उत्पन्न हुए ॥७८॥ उनके बाद चक्षुष्मान् कुलकर हुए। उनके समय प्रजा सूर्य चन्द्रमाको देखकर भयभीत हो उनसे पूछने लगी कि हे स्वामिन् ! आकाशरूपी समुद्रमें ये दो पदार्थ क्या दिख रहे हैं ? ॥७९॥ प्रजाका प्रश्न सुनकर चक्षुष्मान्को अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो आया। १. भुञ्जन्ते म. । २. निवर्तते म. । ३. खले म. । ४. अथो ख. । ५. कालान्तरोत्पत्त्या म. । ६. क्षेमभृत् म.। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001822
Book TitlePadmapuran Part 1
Original Sutra AuthorDravishenacharya
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages604
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size15 MB
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